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ब्लॉगः पाकिस्तान में मेहतर भर्ती के लिए हिंदू क्यों चाहिए?
- Author, जावेद सुमरो
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता
पाकिस्तान के ख़ैबर पख्तूनख्वाह सूबे की बन्नू नगरपालिका के इन दो बेचारे कर्मचारियों को समझ में ही नहीं आ रहा होगा कि उन्होंने ऐसी क्या ग़लती कर दी कि उन्हें निलंबित कर दिया गया?
आखिर उन्होंने सफ़ाई कर्मचारियों की भर्ती के लिए एक विज्ञापन ही तो दिया था. भला बताइए कि कभी आपने पाकिस्तान में कोई मेहतर देखा है जो ईसाई या हिंदू न हो.
इस विज्ञापन में भी अगर सरकारी अधिकारियों ने अपनी क्रिएटिविटी का इस्तेमाल करते हुए विज्ञापन में 'शिया' लफ्ज न जोड़ा होता तो सोशल मीडिया पर इतना हंगामा न होता और राज्य सरकार कोई कदम न उठाती.
प्यारे वतन पाकिस्तान में जिस तेज़ी के साथ विभिन्न धर्मों, जातियों और अलग विचारधारा वाले समाज के हिस्सों को ग़ैर-मुसलमानों की लिस्ट में डाला जा रहा है, वो दिन दूर नहीं जब मुल्क के एक बड़े तबके के लिए केवल मेहतर की ही नौकरी बची रह जाएगी.
सोशल मीडिया
सवाल ये नहीं है कि इस विज्ञापन में 'शियाओं' को क्यों डाल दिया गया बल्कि सवाल ये है कि किसी भी नौकरी के लिए धर्म या संप्रदाय का बॉक्स होना ही क्यों जरूरी है. क्या मेहतर होना छोटा काम है?
कम-से-कम आम तौर पर हम सभी समझते तो यही हैं चाहे ये जाहिर करें या नहीं. पिछले दिनों मैंने एक बड़े मौलवी का सोशल मीडिया पर एक बयान देखा.
वैसे उनके अनुयायी बड़ी तादाद में हैं लेकिन उन्होंने अपने ताजा बयान से पाकिस्तान के करोड़ों लोगों का दिल जीत लिया होगा.
शांति का सबक
वे फ़रमाते हैं कि यहूदी, ईसाई, सिख और हिंदू कौम के लोग मुसलमानों से कोई संबंध नहीं रख सकते.
जनाब पहले भी कह चुके हैं कि इस्लाम शांति का सबक नहीं देता बल्कि फ़ासला रखना सिखाता है. उनके अनुसार जो लोग कहते हैं कि कुरान अमन का संदेश देता है, उन्होंने इस पाक किताब को समझा ही नहीं.
हजारों शिया और ख़ासकर हज़ारा लोगों को चुन-चुन कर मारा गया. लेकिन हम सीरिया और फ़लस्तीनी इलाक़ों में मुसलमानों के नरसंहार के खिलाफ जुलूस निकालते हैं.
अहमदियों की इबादतगाह जलाई जाती है और अमरीकियों के खिलाफ ईसाई समुदाय के गिरिजाघरों पर हमले होते हैं लेकिन हम जोर देते हैं भारत में मुसलमानों की दुर्दशा पर.
राजनीति और राज्य
हमें अपने घर में जारी अत्याचार नज़र नहीं आता और अगर आता है तो भी हमारी भावनाएं ऐसे नहीं उमड़तीं जैसे हजारों मील दूर की घटनाओं पर उमड़ आती हैं.
ये हमारे अंदर के पूर्वाग्रहों हैं जो दशकों में परवान चढ़े हैं या ये कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि दशकों से परवान चढ़ाए गए हैं.
और अब ये पूर्वाग्रह हमारी राजनीति और राज्य की आधारशिला बन गए हैं.
प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने हाल में बयान देकर मौलवी हज़रात से धर्म की कोई वैकल्पिक परिभाषा देने के लिए कहा है.
ईशनिंदा की परिभाषा
लेकिन दूसरे ही दिन वे उन लोगों और वेबसाइटों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश देते हैं जो कथित तौर पर अल्लाह की बेअदबी करते रहे हैं.
लेकिन ईशनिंदा की परिभाषा क्या है और वह कौन तय करेगा?
इस पर सब चुप हैं. सवाल ये है कि अगर आप स्थापित मान्यताओं से हटकर बोल और लिख नहीं सकते तो प्रधानमंत्री धर्म की वैकल्पिक परिभाषा कहां से लाएंगे.
अगर राजनेताओं ने वास्तव में नई परिभाषा की ख्वाहिश जताई है तो अच्छा न हो कि वही लोग एक वैकल्पिक परिभाषा भी दे दें और स्थापित मान्यताओं से अलग या विरोध में बात करने वालों को काफ़िर, दोहरिया (इस्लाम छोड़ देने वाला), उदार, इस्लाम का दुश्मन और पाकिस्तान का दुश्मन जैसे भारी भरकम इलाजामों के खिताब से न नवाजें.
सरकार और राजनीतिक दल अगर चाहें तो अपने या अपने सहयोगी मौलवियों से इसकी शुरुआत करा सकती हैं.
बाकी कोहाट नगरपालिका के दो कर्मचारियों का निलंबन या बर्खास्तगी हमारे अंदर के पूर्वाग्रहों को कम नहीं कर सकती.
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