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पाकिस्तान: हिंदुओं से अचानक इतना लाड़ क्यों?
- Author, हारून रशीद
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता, इस्लामाबाद
पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों ख़ासकर ग़ैर-मुस्लिम आबादी को उनका हक़ दिलाने की बातें तो सब करते चले आ रहे हैं लेकिन इस तरफ़ सचमुच में कोई ठोस क़दम उठाया गया हो ऐसा कम ही देखने को मिलता है.
अक्सर सरकार इस बात से डरती है कि अल्पसंख्यकों को उनका हक़ दिलाने के चक्कर में कहीं वो अपनी लोकप्रियता न खो दें. लेकिन पिछले तीन-चार महीने में हालात कुछ बदले-बदले नज़र आ रहे.
हालांकि समय के गुज़रने के साथ-साथ ये साफ़ होने लगा है कि शायद वो एक इत्तेफ़ाक़ था. ज़मीनी सतह पर देखें तो इन बदलावों से कोई ख़ास असर नहीं पड़ा है.
हिंदू मैरेज बिल के बाद नोबेल पुरस्कार जीतने वाले पहले पाकिस्तानी वैज्ञानिक डॉक्टर अब्दुस्सलाम (जो क़ादियानी समुदाय के थे और जिन्हें पाकिस्तान में इस्लाम से ख़ारिज कर दिया गया है) के नाम पर इस्लामाबाद की यूनिवर्सिटी के एक विभाग का नाम रखा गया.
इसके बाद जबरन धर्म परिवर्तन को रोकने से संबंधित सिंध में एक क़ानून बनाने की कोशिश करना (हालांकि अब उसे वापस ले लिया गया है), फिर प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की जानिब से ग़ैर-मुस्लिमों के बारे में सकारात्मक बयान दिए जाने ने उम्मीद बढ़ाई है कि शायद केंद्रीय और प्रांतीय सरकारों को 70 सालों से जारी पुरानी ग़लतियों को सही करने का ख़्याल आ गया है.
नवाज़ शरीफ़ ने हाल के दिनों में कई ऐसे बयान दिए हैं जिनका उद्देश्य अल्पसंख्यकों को यक़ीन दिलाना है कि उनके अधिकारों की हिफाज़त की जाएगी.
पिछले सप्ताह ही कटास राज मंदिर परिसर में वाटर फ़िल्ट्रेशन प्लांट का उदघाटन करते हुए नवाज़ शरीफ़ ने कहा था, "मैं सिर्फ़ मुसलमान पाकिस्तानियों का नहीं अल्पसंख्यकों का भी प्रधानमंत्री हूं. बहुत जल्द पाकिस्तान को अल्पसंख्यकों के दोस्त के तौर पर देखा जाएगा.''
साल 1998 की जनगणना के अनुसार पाकिस्तान में 95 फ़ीसदी आबादी मुसलमानों की है और ग़ैर-मुस्लिम केवल पांच फ़ीसदी हैं जिनमें हिंदू, सिख, ईसाई, बौद्ध, पारसी वग़ैरह शामिल हैं.
पाकिस्तान में सबसे ज़्यादा अल्पसंख्यक सिंध प्रांत में रहते हैं इसलिए सबसे ज़्यादा बदलाव भी वहीं देखे जा रहे हैं.
ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए सिंध विधानसभा में पारित बिल अब तक क़ानून तो नहीं बन सका और किसी अनदेखे दबाव के कारण सूबे की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने अपने क़दम पीछे खींच लिए हैं.
धार्मिक संगठनों के दबाव के चलते अब इस बिल में कुछ बदलाव करने पर विचार किया जा रहा है. इस बिल ने एक तरफ़ जहां सरकार की अच्छी मंशा को उजागर किया वहीं दूसरी तरफ़ ये भी स्पष्ट कर दिया कि सरकार और सत्तारूढ़ पार्टियां अपने सिद्धांतों पर डटे रहने के मामले में कमज़ोर हैं.
पाकिस्तानी सियासत का एक पहलू ये भी है कि मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां ज़ाहिरी तौर पर उदारवादी और प्रगतिशील होती हैं और दिल से भी शायद हों लेकिन व्यवहारिक राजनीति उन्हें अपनी विचारधारा को अमली जामा पहनाने से रोकती हैं.
नवाज़ शरीफ़ पूर्व सेनाध्यक्ष और राष्ट्रपति जनरल ज़िया-उल-हक़ के प्रभाव में राजनीति के शुरुआती दौर में एक रूढ़िवादी नेता के तौर पर देखे जाते थे लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो की मौत के बाद उनकी सोच में बदलाव नज़र आता है.
अब वो ख़ुद को अल्पसंख्यकों का दोस्त साबित करने की कोशिश कर रहे हैं. सवाल उठ रहे हैं कि इस बदलाव की आख़िर वजह क्या है.
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ये सब कुछ पेशावर में आर्मी पब्लिक स्कूल पर हुए चरमपंथी हमले के बाद पाकिस्तानी सरकार की नीतियों में आए बदलाव के कारण हो रहा है. वो मानते हैं कि इसकी एक वजह चरमपंथी कार्रवाइयों पर रोकथाम के लिए तैयार नेशनल एक्शन प्लान भी है.
कुछ समीक्षक इसे अंतरराष्ट्रीय जगत ख़ासतौर पर संयुक्त राष्ट्र के दबाव में उठाया गया क़दम क़रार दे रहे हैं.
अंतरराष्ट्रीय वित्तीय मदद और एक सभ्य देश के तौर पर मुल्क की पहचान बनाए रखने के लिए चाहते या न चाहते हुए भी उसे कुछ क़ानून बनाने पड़ते हैं.
कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसके पीछे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दबाव भी मानते हैं.
लेकिन पाकिस्तान हिंदू काउंसिल के अध्यक्ष और अल्पसंख्यकों के लिए सुरक्षित सीट से मुस्लिम लीग (नवाज़ गुट) के सांसद डॉक्टर रमेश वानक्वानी की राय इन सबसे अलग है.
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "इस बदलाव का जो मतलब भारत में लिया जा रहा है वो ग़लत है कि ये सब कुछ मोदी या अमरीका के नव-निर्वाचित राष्टपति ट्रंप की वजह से हो रहा है. ये बातें सरकार में आने से पहले से पार्टी के घोषणापत्र में थीं और नवाज़ शरीफ़ उनको अमली जामा पहना रहे हैं.''
उन्होंने कहा कि सिंध में धर्म परिवर्तन बिल की वापसी से वे तत्व मज़बूत हुए हैं जो इन बदलावों के विरोधी हैं. उनके अनुसार सरकार को ये पहले से देख लेना चाहिए कि वो जो क़दम उठाएं उन्हें वापस नहीं लेना पड़े.
ख़ुद डॉक्टर रमेश हिंदू मैरेज बिल को बड़ी मुश्किल से तीन साल की कोशिशों के बाद संसद से पास करवाने में कामयाब हुए.
बीबीसी से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा, "मैंने तीन साल हिंदू बिल के लिए मेहनत की हालांकि ये सिर्फ़ तीन दिन का काम था. मेरे ख़्याल में तमाम सियासी पार्टियों को मिलकर इसके लिए कोशिश करनी चाहिए.''
उनका कहना था कि सकारात्मक बदलाव की तरफ़ अब तक केवल ज़ुबानी जमाख़र्च ही की गई है लेकिन अगर उन वादों पर अमल होगा तो वास्तव में बदलाव आएगा. उनके अनुसार धर्म परिवर्तन बिल की वापसी से ये साबित हो गया कि सियासी पार्टियां धार्मिक संगठनों के दबाव में रहती हैं.
सियासी पार्टियां वोट को देखते हुए अपने फ़ैसले करती हैं. पाकिस्तान में एक साल के अंदर आम चुनाव होने वाले हैं. ये चुनाव ऐसे समय में होंगे जब अल्पसंख्यक वोटरों की तादाद तीस लाख से ज़्यादा हो चुकी है.
एक रिपोर्ट के अनुसार सिंध के 13 और पंजाब के दो ज़िले में उनकी तादाद इतनी हो गई है कि वो चुनावी नतीजे को प्रभावित कर सकते हैं.
ताज़ा क़दम शायद उन वोटरों का समर्थन हासिल करने की कोशिश भी हो सकती है.
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