अमरीका अब दो-राष्ट्र समाधान से बंधा नहीं हैं

राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने इसराइल-फ़लस्तीनी संघर्ष के समाधान के लिए अमरीका की दशकों से जारी दो-राष्ट्र समाधान नीति को छोड़ दिया है.

व्हाइट हाउस में इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के साथ साझा संवाददाता सम्मेलन में अमरीकी राष्ट्रपति ने एक 'ग्रेट' शांति समझौता कराने का वादा तो किया, लेकिन साथ में ये भी कहा कि इसके लिए दोनों पक्षों को मन मारना होगा.

इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच साल 2014 से कोई ठोस शांति वार्ता नहीं हुई है.

संवाददाता सम्मेलन में ट्रंप ने इसराइली प्रधानमंत्री से विवादित क्षेत्र में नई इमारतें बनाने का काम 'कुछ समय के लिए बंद' करने के लिए भी कहा है.

पिछले महीने ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद इसराइल ने पश्चिमी किनारे और पूर्वी यरुशलम में हज़ारों नए घर बनाने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी थी.

दो राष्ट्र सिद्धांत क्या है

इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच दशकों से जारी संघर्ष के समाधान के लिए दोनों पक्ष के नेताओं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने दो-राष्ट्र सिद्धांत को अपना घोषित लक्ष्य बताया है.

इसके तहत पश्चिमी किनारे, गज़ा पट्टी और पूर्वी यरुशलम में वर्ष 1967 की संघर्षविराम रेखा से पहले के क्षेत्र में एक स्वतंत्र फ़लस्तीनी राष्ट्र का निर्माण होना है जिसे इसराइल के साथ शांति से रहना होगा.

संयुक्त राष्ट्र, अरब लीग, यूरोपीय यूनियन, रूस और अमरीका इसके लिए अपनी प्रतिबद्धता बार-बार दोहराते रहे हैं.

लेकिन अब राष्ट्रपति ट्रंप ने इससे अलग बात कही है.

राष्ट्रपति ट्रंप का कहना है, ''मैं दो राष्ट्र और एक राष्ट्र की ओर देख रहा हूं. लेकिन मुझे वो एक पसंद है जिसे दोनों पक्ष पसंद करें.''

उन्होंने कहा, ''मैं किसी एक के साथ रह सकता हूं. यदि इसराइल और फ़लस्तीनी ख़ुश हैं तो मैं भी उस एक के साथ ख़ुश हूं जिसे वो दोनों सबसे अधिक पसंद करते हैं.''

ट्रंप ने ये भी कहा कि शांति समझौते पर आख़िरकार दोनों पक्षों को ही पहुंचना है.

दूतावास का मुद्दा

इसराइली सरकार की पिछले आठ वर्षों से ओबामा प्रशासन के साथ बन नहीं रही थी. लेकिन ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद इसराइल को दोनों देशों के बीच बेहतर संबंधों की उम्मीद है.

ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने से पहले चुनाव प्रचार के दौरान अमरीकी दूतावास को तेल अवीव से यरुशलम ले जाने का वादा किया था.

इस वादे के बारे में ट्रंप ने कहा, ''जहां तक दूतावास को यरुशलम ले जाने की बात है, मैं ऐसा होता देखना चाहूंगा. यकीन मानिए हम बड़ी सावधानी से इस ओर देख रहे हैं.''

लेकिन जब ट्रंप से दो-राष्ट्र सिद्धांत के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वो किसी ठोस काम पर फोकस करना चाहेंगे, ना कि इस पर कि उसे क्या नाम दिया गया है.

लेकिन इसराइली प्रधानमंत्री का कहना है, ''शांति के लिए दो पूर्व शर्ते हैं. पहली ये कि फ़लस्तीनी यहूदी राष्ट्र को मान लें और दूसरी ये कि शांति समझौते में होना ये चाहिए कि जॉर्डन नदी के पूरे पश्चिमी इलाके की सुरक्षा का ज़िम्मा इसराइल के पास ही रहे.''

फ़लस्तीनियों की चेतावनी

राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप की जीत के बाद ये पहला मौका है जब इसराइली प्रधानमंत्री के साथ उनकी आमने-सामने मुलाक़ात हुई है.

दो-राष्ट्र सिद्धांत से ट्रंप के पीछे हटने का मतलब है कि अमरीका अपनी उस नीति को बदल रहा है जिसे रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों ही प्रशासन दशकों से मानते आए हैं.

मंगलवार को व्हाइट हाउस के एक आला अधिकारी ने नीति में संभावित बदलाव का ये कहते हुए संकेत दिया था कि शांति के लिए फ़लस्तीन को राष्ट्र का दर्जा देना अनिवार्य नहीं है.

इस रिपोर्ट के आने के बाद फ़लस्तीनी सतर्क हो गए और उन्होंने व्हाइट हाउस से कहा कि अमरीका स्वतंत्र फ़लस्तीनी राष्ट्र के लक्ष्य को इस तरह ना छोड़े.

पेलेस्टाइन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन की एक वरिष्ठ सदस्य हनान अशरावी ने कहा, ''यदि ट्रंप प्रशासन इस नीति को खारिज करता है, तो इससे शांति की संभावनाओं को नुकसान पहुंचेगा और इससे विदेशों में भी अमरीकी रुख़ और उसके हित प्रभावित होंगे.''

उन्होंने कहा, ''इसराइल में सबसे ग़ैर-ज़िम्मेदार तत्वों से संबंध रखना और उन्हें व्हाइट हाउस बुलाना, ज़िम्मेदार विदेश नीति बनाने का तरीक़ा नहीं है.''

वर्ष 1967 में पश्चिमी किनारे और पूर्वी यरुशलम पर इसराइल के कब्जे के बाद बनाई गई लगभग 140 बस्तियों में करीब छह लाख यहूदी रहते हैं. इसी ज़मीन पर फ़लस्तीनी भावी राष्ट्र का दावा करते हैं.

अंतराष्ट्रीय क़ानून के मुताबिक इन बस्तियों को अवैध माना जाता है लेकिन इसराइल ऐसा नहीं मानता.

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