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रविवार, 10 मई, 2009 को 18:56 GMT तक के समाचार
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'वर्ष 2004 वाला समीकरण फिर बनेगा'


पंजाब का लुधियाना शहर भारत का मैनचेस्टर कहलाता है. कहते हैं कि इस औद्योगिक शहर में आपको नई से नई और महँगी सी महँगी कार देश में सबसे पहले यहाँ दौड़ती मिलेगी.

लुधियाना से लोकसभा चुनाव में मुख्य मुक़ाबला कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनीष तिवारी और अकाली दल के गुरचरण सिंह गालिब के बीच है.

पिछली बार मनीष तिवारी यहाँ से चुनाव हार गए थे. राहुल गांधी ने पंजाब में युवाओं को चुनावों में काफ़ी तरजीह दी है.

मनीष युवा कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके हैं. उनके प्रतिद्वंद्वी गुरचरण सिंह गालिब कांग्रेस के पुराने नेता रहे हैं और अब अकाली दल में शामिल हो गए हैं.

चुनाव से पहले मनीष तिवारी ने अपनी उम्मीदवारी और चुनाव बाद के गठबंधन के बारे में बीबीसी से बात की.

चुनाव प्रचार अपने चरम पर हैं. क्या उम्मीद है पार्टी को और आपको.

 भारतीय राजनीति में बुनायदी तौर पर ध्रुवीकरण सांप्रदायिक ताक़तों और धर्मनिरपेक्ष ताक़तों के बीच में है. ये सच है कि कुछ जगह सीटों को लेकर हमारा तालमेल नहीं हो पाया है. इस कारण दिक्कत भी हुई है

जीत सुनिश्चित है. इस विश्वास का आधार है कि पहले तो लोग चाहते हैं कि मनमोहन सिंह जी प्रधानमंत्री बने रहें. दूसरा ये कि पंजाब की जनता बादल सरकार से परेशान है. और तीसरा ये कि लुधियाना की जनता दल-बदलुओं को पसंद नहीं करती.

आपके विरोधी आरोप लगाते हैं कि आप लुधियाना के लिए बाहरी व्यक्ति हैं, यहाँ की समस्याओं के बारे में समझ नहीं है आपको?

ऐसा कुछ नहीं है. पंजाबियत को हमारे परिवार ने ख़ून से सींचा है. मेरे पिताजी ने क़ुर्बानी दी है पंजाब में आतंकवाद के दौरान. जब चुनावों का नतीजा आएगा तो लोगों को जवाब ख़ुद-ब-ख़ुद मिल जाएगा.

चुनाव के बाद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की क्या दशा होगी, क्या शक्ल होगी. कई पार्टियाँ तो अलग हो रही हैं?

देखिए भारतीय राजनीति में बुनायदी तौर पर ध्रुवीकरण सांप्रदायिक ताक़तों और धर्मनिरपेक्ष ताक़तों के बीच में है. ये सच है कि कुछ जगह सीटों को लेकर हमारा तालमेल नहीं हो पाया है. इस कारण दिक्कत भी हुई है.

लेकिन अभी आप प्रकाश करात का ताज़ा बयान देख लीजिए. मैं तो यही कहूँगा कि नतीजों के बाद वही समीकरण बनेगा जो 2004 में बना था.

लेकिन तेलंगाना राष्ट्रीय समीति के अध्यक्ष ने तो एनडीए में जाना का फ़ैसला किया है.

 जीत सुनिश्चित है. इस विश्वास का आधार है कि पहले तो लोग चाहते हैं कि मनमोहन सिंह जी प्रधानमंत्री बने रहें. दूसरा ये कि पंजाब की जनता बादल सरकार से परेशान है. और तीसरा ये कि लुधियाना की जनता दल-बदलुओं को पसंद नहीं करती

जहाँ तक टीआरएस की बात है तो उनका जनाधार तो राजशेखर रेड्डी ने ध्वस्त कर दिया है. वहाँ हुए उपचुनाव के नतीजे यही बताते हैं. फ़िक्र की कोई बात नहीं है. ये लोग रूटलेस वांडरर्स हैं यानी कोई जड़ नहीं है.

बिहार में लालू प्रसाद हैं, पासवान है ये सब भी तो नाराज़ हैं?

मैं पहले ही कह चुका हूं कि 16 मई को नतीजों के बाद बुनियादी तौर पर वही गुणा भाग बैठेगा जो 2004 के बाद हुआ था.

अगर कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन करती भी है और दूसरे दल समर्थन देते हैं तो क्या मनमोहन सिंह के नाम पर वे सहमत होंगे?

क्यों नहीं होंगे. मनमोहन सिंह जी ही प्रधानमंत्री बनेंगे. जो भी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी, उसी का प्रधानमंत्री होगा.

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