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मंगलवार, 28 अप्रैल, 2009 को 14:09 GMT तक के समाचार
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'कभी लगता है कि ज़िंदा लाश हैं हम'

मेराज़ अहमद जलालुद्दीन
मेराज़ अहमद जलालुद्दीन कहते हैं कि दंगों में उन्हें घर-बार छोड़ कर भागना पड़ा
गुजरात में लोकसभा चुनाव की सरगर्मियाँ तेज़ है लेकिन वर्ष 2002 में गुजरात में हुए दंगों के पीड़ित मुसलमानों का कहना है कि उन्हें राजनीतिक दलों ने बेसहारा छोड़ दिया है.

27 फरवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस में लगी आग के कारण 59 लोगों की मौत हो गई थी जिसके बाद गुजरात में दंगे भड़क उठे थे.

सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक इन दंगों में 1392 लोग मारे गए थे जबकि गै़र सरकारी संस्थानों का कहना है कि दंगों में क़रीब दो हज़ार लोगों की मौत हुई थी. मारे गए ज़्यादातर लोग मुसलमान थे.

इन दंगों में एक लाख 40 हज़ार लोगों को बेघर होना पड़ा था. उन्हें सरकारी कैंपों में रखा गया और सरकारी सहायता राशि के रूप में ढाई-ढाई हज़ार रुपए मिले थे.

दंगों के ज़्यादातर शिकार लोग अहमदाबाद शहर के थे. 36 वर्षीय मेराज़ जलालुद्दीन अंसारी उन्हीं में से एक हैं. दंगों में उनका कोई रिश्तेदार हताहत तो नहीं हुआ था लेकिन उन्हें चमनपुरा इलाक़े में स्थित अपना घर-बार सबकुछ छोड़ कर जाना पड़ा. उनका काम धंधा चौपट हो गया.

वह कहते हैं, "दंगों से पहले मैं कढ़ाई का काम करता था और मेरी आमदनी हर महीने 15-20 हज़ार रुपए थी. मैंने इस काम के लिए 15 सिलाई मशीन रखी थी और दस बारह लोग मेरे साथ काम करते थे."

दंगों के बाद उन्हें अपना घर अपने हिंदू पड़ोसी को सिर्फ़ दो लाख 75 हज़ार में बेचना पड़ा और बॉम्बे होटल में आकर रहने लगे.

 पहले मैं काफ़ी अच्छी स्थिति में था. काम तो अब ज़्यादा करता हूँ लेकिन बस गुज़ारा चल जाता है. ज़िदगी रुक नहीं सकती लेकिन कभी-कभी लगता है कि हम ज़िदा लाश हैं
मेराज़ जलालुद्दीन अंसारी

दंगों के बाद यह बॉम्बे होटल कई विस्थापितों का घर है. सड़क किनारे बने ढाबे के नाम पर इसका नाम रखा गया है.

दंगों के बाद अंसारी का रहन-सहन अब ख़स्ताहाल है. जिस बाज़ार में वे अपना माल बेचते थे वह अब बॉम्बे होटल से 10-12 किलोमीटर दूर है.

जलालुद्दीन अंसारी कहते हैं कि उनके बच्चे पास के जिस म्यूनिसिपल स्कूल में पढ़ने जाते हैं अब वह भी नहीं बचेगा क्योंकि वहाँ एक बस सड़का बनाने की योजना है.

अंसारी ने फिर से एक नया घर बनाया है और पाँच सिलाई मशीन ख़रीद कर अपना काम शुरु किया है लेकिन अब वे इस स्थिति में नहीं है कि किसी को काम पर रख सकें.

वह कहते हैं कि सरकार ने चमनपुरा में उनके घर के बदले राहत स्वरूप 300 रुपए दिए थे.

जलालुद्दीन अंसारी कहते हैं, "पहले मैं काफ़ी अच्छी स्थिति में था. काम तो अब ज़्यादा करता हूँ लेकिन बस गुज़ारा चल जाता है. ज़िदगी रुक नहीं सकती लेकिन कभी-कभी लगता है कि हम ज़िदा लाश हैं."

दंगा चुनावी मुद्दा नहीं

गुजरात के चुनाव में इस बार 2002 के दंगे कोई मुद्दा नहीं है. दंगों के सात वर्ष बाद कांग्रेस और राज्य में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी दोनों ही दंगा पीड़ितों के राहत की बात और उन्हें न्याय दिलवाने में हुई देरी के मामले में चुप्पी साधे हुए हैं.

बॉम्बे होटल
दंगों के बाद बॉम्बे होटल मुस्लिम विस्थापितों का घर है

अंसारी कहते हैं, "हम बीजेपी को वोट नहीं दे सकते और कांग्रेस मु्स्लिम वोट को अपना जमा पूँजी समझती है. हमें दैत्य और दानव में से ही चुनना है."

बॉम्बे होटल में चुनाव के बारे में कोई बातचीत नहीं हो रही है. जब हम कुछ बात करने की कोशिश करते हैं तो लोग घृणा से मुँह फेर लेते हैं.

यहाँ पर मिठाई की दुकान चलाने वाले 32 वर्षीय शाबित अली अंसारी कहते हैं, "वर्ष 2002 के दंगों से पहले यहाँ बहुत कम घर थे लेकिन अब क़रीब 15 हज़ार घर बन गए हैं. यहाँ चारों तरफ़ से मुसलमानों ने आकर बसना शुरू कर दिया है. वे ख़ुद को यहाँ अपेक्षाकृत सुरक्षित महसूस करते हैं."

शाबित अली कहते हैं, "लेकिन कोई भी राजनीतिक दल मुसलमानों के लिए कुछ भी नहीं करता. सरकारी तंत्र तब तक कुछ नहीं करता जब तक हम हल्ला न मचाएँ."

दंगा पीड़ित 45 वर्षीय नूर बानो और उनके पति आशिक अली बदर अली भी दंगों में सारसपुर में अपने घर पर हमलों के बाद यहाँ आ गए थे. दो वक़्त की रोटी के लिए उन्हें अब संघर्ष करना पड़ रहा है.

 हम बीजेपी को वोट नहीं दे सकते और कांग्रेस मु्स्लिम वोट को अपना जमा पूँजी समझती है. हमें दैत्य और दानव में से ही चुनना है
आशिक अली बदर अली

आशिक अली पहले ऑटो ड्राइवर थे और 150 रुपए हर दिन कमाते थे लेकिन अब वे एक सुरक्षा गार्ड के रुप में काम करते हैं और एक हज़ार आठ सौ रुपए ही हर महीने कमा पाते हैं.

बगल के घर में रहने वाली ज़रीन असलमभाई घांची राजनीतिक दलों के बैनरों की सिलाई का काम करती हैं लेकिन एक बैनर की कटाई और सिलाई करने पर उन्हें मुश्किल से 45 पैसे की आमदनी हो पाती है.

ज़रीन का कहना है, "राजनीतिक पार्टियाँ भी काम देने पर हमारा शोषण करती हैं. यहाँ यही हाल है."

आशिक अली बदर अली कहते हैं, "बीजेपी तो खुले तौर पर मुसलमानों की दुश्मन है और कांग्रेस छुपी हुई दुश्मन है. मैं भाजपा को वोट दूँगा ताकि सुरक्षा के लिए उनके पास तो जा सकूँ."

गुजरात में मुसलमानों की आबादी महज़ 10 प्रतिशत है.

राजनीतिक विश्लेषक अच्युत याज्ञनिक कहते हैं, "दंगों और सुर्खियों में बनी खबरों के बावजूद राजनीतिक पार्टियों को यहाँ लगता है कि वे मुसलमानों की उपेक्षा कर सकते हैं क्योंकि मुसलमान उनके लिए निर्णायक वोट बैंक नहीं हैं."

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