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गुजरात में मोदी केंद्रित दिखता है चुनाव | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गुजरात की बहुचर्चित गांधीनगर लोकसभा सीट के लिए उम्मीदवारों का चुनाव प्रचार यहां के समाज के बारे में बहुत कुछ बता जाता है. गांधीनगर से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी मैदान में हैं जिनके मुक़ाबले कांग्रेस के सुरेश पटेल और निर्दलीय उम्मीदवार मल्लिका साराभाई चर्चित उम्मीदवारों में गिने जा रहे हैं. मल्लिका साराभाई छोटी-छोटी सभाएं कर रही हैं और घर-घर जाकर अभियान चला रही हैं. वो जाति के नाम पर वोट नहीं मांगती हैं बल्कि उनके कार्यकर्ता कहते हैं कि वो स्थानीय उम्मीदवार हैं और ज़रुरत पड़ने पर उपलब्ध हैं जो बात आडवाणी पर लागू नहीं होती. मल्लिका मीडिया की चहेती हैं क्योंकि वो अच्छी बाइट्स देती हैं और इंटरव्यू से परहेज़ नहीं करती हैं. हालांकि उनकी जनसभाओं में भीड़ नहीं होती है. अहमदाबाद में एक ऐसी ही जनसभा में वो लगभग समय पर पहुंचती हैं और भीड़ के नाम पर पचास से अधिक लोग नहीं होते. इनमें से अधिकतर झुग्गियों के बच्चे हैं जिन्हें नाच गाना पसंद है. अलग तरीके मल्लिका का चुनाव चिन्ह हारमोनियम है और प्रचार में नृत्य संगीत और नुक्कड़ नाटकों की प्रमुखता है. इन्हें देखने या तो बिल्कुल ग़रीब लोग आते हैं या फिर बहुत धनी लोग जिन्हें गुजरात के आम लोग घर बैठने वाले बुद्धिजीवी कहते हैं.
थोड़ी भीड़ मल्लिका को देखने भी जुटती है और या फिर उनके साथ आए फ़िल्म स्टारों को. दूसरी तरफ आडवाणी को भीड़ जुटाने की ज़रुरत नहीं पड़ती. वो लेट आते हैं लेकिन जनता उनका इंतज़ार करती है. इंतज़ार करने वाले लोग बार-बार पूछते हैं क्या नरेंद्र भाई नहीं आए. मोदी जी नहीं आते हैं तो कई लोग आडवाणी का भाषण आधे में छोड़कर चले जाते हैं. भाषण के दौरान आडवाणी जब कभी मोदी का ज़िक्र करते हैं तो तालियां बजती हैं. रैली में जब मैंने लोगों से पूछा कि क्या इस बार आडवाणी जीतेंगे तो उत्तर कुछ यूं था, जीतेंगे लेकिन मतों का अंतर कम हो सकता है. लेकिन क्यों, एक सज्जन कहते हैं, ‘‘मैं तो भाजपा को ही वोट दूंगा लेकिन इस बार कांग्रेस के सुरेश पटेल को भी वोट मिलेंगे क्योंकि कांग्रेस का प्रचार अच्छा है. वो घर घर जाकर वोट मांग रहे हैं और इस बार उनका प्रदर्शन पहले से अच्छा रहेगा. हां लेकिन विधानसभा में तो कांग्रेस का पत्ता साफ होगा फिर. ’’ मोदी केंद्रित चुनाव गुजरात में बात चाहे जो भी हो घूम फिरकर मोदी पर ज़रुर आती है. लोगों को ये पसंद नहीं कि मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की बात हो. मैंने जितने भी लोगों से पूछा सबका यही कहना था कि मोदी गुजरात में रहेंगे वो दिल्ली नहीं जाएंगे.
मोदी क्या चाहते हैं ये तो वो ही जानें. लेकिन एक बात साफ़ थी. गुजरात में मोदी का सिक्का चलता है. गुजरात के लोग बीजेपी को नहीं अब मोदी के नाम पर वोट देते हैं और मध्य वर्ग मोदी की गिरफ़्त में हैं. गुजरात के मध्य वर्ग के बारे में कहा जाता है कि यह तबका अन्य राज्यों की तुलना में वोट देने ज़्यादा बाहर निकलता है. शायद यही कारण है कि विधानसभा चुनावों में मोदी को ज़बर्दस्त जीत मिलती है और इससे पहले हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस राज्य की 26 में से 12 सीट जीत ले जाती है. लोकसभा चुनावों में मोदी का जादू कम चलता है क्योंकि मोदी अभी गुजरात के हैं और पूरे भारत का होने के लिए उनके पास कम से कम पांच साल तो है हीं. |
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