'हथियार मत उठाना, मैंने ये ज़हर पिया है...'

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"भूल से भी हथियार मत उठाना मेरे बच्चों, मैं ये ज़हर पी चुका हूँ." ये सलाह दी थी पूर्व चरमपंथी सैफुल्लाह खान ने उन कश्मीरी युवाओं को, जो आज़ादी के नाम पर जिहाद के लिए मचल रहे थे. सैफुल्लाह ने मुझे यह बात बताई थी इस साल मार्च में, जब मैं उनसे मिला था.
उस समय बुरहान वानी की चर्चा दक्षिण कश्मीर में खूब हो रही थी. पुलवामा के कुछ युवाओं ने मुझसे कहा था कि बुरहान उनका हीरो है. बुरहान की तरह वो भी हथियार उठाने की सोच रहे थे. कुछ ने उठाया भी था. उनमें से एक उमैस अहमद की मुड़भेड़ में मौत हो गई थी. उनकी मां ने मुझसे बताया था कि उनके चेहरे पर लगे ख़ून उन्होंने ख़ुद पोंछे थे क्योंकि वो 'शहीद' हो गए थे.
बुरहान टेक्नोलॉजी में माहिर माने जाते थे. वो सोशल मीडिया का इस्तेमाल भी खूब करते थे. उनका जैसा अंत हुआ, उसी का डर सैफुल्लाह को था. हथियार न उठाने की सलाह के पीछे उनका तर्क था, "तुम हथियार उठाओगे तो मारे जाओगे और तुम्हारी ज़िन्दगी ख़त्म हो जाएगी."

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सैफुल्लाह के मुताबिक़ अगर बुरहान कश्मीरी युवाओं का हीरो थे तो, उन्हें उनकी मौत से सबक लेना चाहिए. हिंसा से कुछ हासिल नहीं होता है.
दूसरी तरफ कश्मीर के युवाओं का एक अलग सा हीरो है, जो आज एक ज़िम्मेदार सरकारी अधिकारी की ज़िन्दगी बसर कर रहा है. उनका नाम शाह फ़ैसल है. उन्होंने 2009 में सिविल सर्विस परीक्षा टॉप की थी. उनकी इस सफलता से कश्मीर के युवाओं को बहुत गर्व हुआ. सिविल सर्विस परीक्षा टॉप करने वाल वो पहले कश्मीरी थे. यहाँ तक कि उस समय के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी उन्हें बधाई दी थी. आज उनका जीवन सकारात्मक कामों में लगा है.

उधर, एक और कश्मीरी युवा है, जिन्हें 10 साल पहले दिल्ली में चरमपंथी होने का झूठा इलज़ाम लगाकर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. उन्हें दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सबकी नज़रों के सामने एक आतंकवादी की तरह घसीट कर बाहर ले जाया गया था.
अगले दिन उनकी तस्वीरे अख़बारों में छपीं. सुर्ख़ियों में कहा गया कि पुलिस ने एक "खतरनाक आतंकवादी" को गिरफ्तार किया है. कुछ महीने बाद उन्हें बाइज़्ज़त रिहा कर दिया गया. उनकी ग़लती केवल ये थी कि वो एक कश्मीरी युवा थे.
तारिक़ अहमद डार अब एक कामयाब व्यपारी हैं. उनकी गिरफ़्तारी और बेइज़्ज़ती से तो उन्हें भारत विरोधी हो जाना चाहए था? या फिर चरमपंथ की तरफ चले जाना चाहिए था? लेकिन ऐसा हुआ नहीं. आज वो शांति का सबक देने वालों में सबसे आगे हैं. वो भारतीय समाज की मुख्यधारा में शामिल हैं. लेकिन पिछले दिनों कश्मीर में हुई मौतों से उनके दिल में भी दर्द हुआ है.
इन तीनों कश्मीरी युवाओं की दास्तान वादी की युवा पीढ़ी का इन दिनों जो हाल है, उसकी एक झलक भर है. इस साल मार्च में जब मैं वहां था तो इन तीनों युवाओं की तरह के युवा मुझे मिले.

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जो युवा बुरहान की तरह हीरो बनना चाहते थे, उनकी संख्या कम थी. लेकिन उनका आत्मविश्वास पुख्ता था. वो सरकारी नौकरी नहीं चाहते थे. वो केवल आज़ादी की बात कर रहे थे.
मैं शाह फ़ैसल की तरह ऐसे दर्जनों युवाओं से मिला जो भारत के दूसरे युवाओं की तरह अपना करियर बनाने का सपना देख रहे थे. उनकी शिकायत ये ज़रूर थी कि दिल्ली और भारत के दूसरे शहरों में उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता थी. वो कश्मीरियों के खिलाफ भेदभाव की भी शिकायत कर रहे थे.
तारिक़ अहमद डार की तरह के युवा भी मिले जिन्हें पुलिस ने मनगढंत मुक़दमों में फंसा कर जेल भेजा था. लेकिन जेल से वापस आने के बाद उनमें सिस्टम के खिलाफ कोई नाराजगी या गुस्सा नहीं था. वो चरमपंथी नहीं थे इसलिए अपनी ज़िन्दगी दोबारा से जीना सीख लिया.

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कश्मीर के पूर्व चरमपंथी सैफुल्लाह ख़ान से लेकर बुद्धिजीवी प्रोफेसर गुल मोहम्मद वानी तक सभी ने मुझसे कहा था कि घाटी मिलिटेंसी की तरफ लौटने के कगार पर है. युवाओं का ब्रेनवाश किया जा रहा है. नौकरियां नहीं हैं.
उनकी वार्निंग सही साबित हुई. घाटी एक बार फिर हिंसा की लपेट में है. दक्षिण कश्मीर में लश्कर-ए-तैयबा की सरगर्मियां बढ़ी हैं. हिजबुल मुजाहिदीन में भी युवाओं की भर्ती बढ़ने की आशंका है.
ऐसे में बुरहान वानी की सोच वाले युवाओं को हिंसा से दूर रखा जा सकता है? और ऐसी स्तिथि में तारिक़ डार और शाह फ़ैसल जैसे युवा कहाँ जाएँ? हिंसा के कारण घाटी के युवाओं के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह ज़रूर लगा है. कुछ तो निजी फ़ैसले होंगे लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि राज्य और केंद्र सरकारों की भी इन्हें मार्गदर्शन देने के लिए सक्रीय होना पड़ेगा.
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