पाकिस्तान, चीन, नेपाल में कितने हिट मोदी

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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
दो साल पहले जब नरेंद्र दामोदरदास मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे, तो उसमें दूसरे लोगों के अलावा पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़, अफ़गानी राष्ट्रपति हामिद करज़ई, नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोईराला और मॉरिशस के प्रधानमंत्री नवीन रामगुलाम भी मौजूद थे.
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री काल की शुरुआत में ही इन नेताओं को दिल्ली आने की दावत दिए जाने को दक्षिण एशियाई राजनीति में एक नई पहल के तौर पर देखा गया था.
लेकिन दो साल पहले पाकिस्तान, नेपाल और चीन में जो उम्मीदें जगीं, वो अब तक कितनी खरी उतरी हैं?

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भारत के पूर्व राजनयिक विवेक काटजू कहते हैं, "मोदी सरकार की पाकिस्तान नीति में थोड़ा भ्रम रहा है. एक तरफ़ तो इच्छा है कि पाकिस्तान से रिश्ते सुधारे जाएं. दूसरी ओर पाकिस्तान में सेना के जनरल साहबान का रवैया भारत के प्रति नकारात्मक है."
उनके अनुसार, बॉर्डर पर तो हमने एकदम ठीक नीति अपनाई है कि पाकिस्तान कुछ हरकत करता है तो उसकी जवाबी कार्रवाई सेना करती है.
काटजू के मुताबिक़, "लेकिन हुर्रियत को लेकर एक लाल रेखा जो मोदी जी ने खींची थी, उस लाल रेखा से हम दूर हटे जो ग़लत है. कोई भी सरकार पूरी तरह आतंकी घटनाओं को नहीं रोक सकती, सवाल ये है कि समस्या की जड़ के ख़िलाफ़ क्या कदम उठाए गए."

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पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद मोहम्मद कसूरी के अनुसार,"मोदी जी को लेकर अलग-अलग सोच है. उनको उनके काम के आधार पर आंका जाएगा. गुजरात के वाक़ये लोगों के दिमाग़ में हिंदुस्तान में भी हैं, पाकिस्तान में भी."
उनका कहना है कि मोदी जी के आने के बाद कुछ सकारात्मक बातें नज़र आई हैं. पठानकोट में हुई घटना के बाद दोनों देशों ने एक दूसरे पर आरोप नहीं लगाए. दोनों देशों की प्रतिक्रिया सुलझी हुई थी. पाकिस्तान की टीम भी वहां गई थी. लखवी के मामले में भी यहां प्रगति हो रही है.
भारत और पाकिस्तान के जो हालात हैं, उसे देखते हुए ये सारे मामले धीरे-धीरे चलेंगे.

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भारत के पूर्व राजनयिक राजीव डोगरा का कहना है, "पाकिस्तान को लेकर अगर आप मोदी सरकार को नंबर देना चाहें तो आप 90 या 100 प्रतिशत दे सकते हैं, लेकिन जहां तक नतीजों की बात है तो निराशा है."
उनके अनुसार, पाकिस्तान की ओर से आतंक कम नहीं हुआ. पठानकोट सबसे बड़ी मिसाल है. भारतीय नौसेना के एक अफ़सर का जो हाल उन्होंने किया है, उन्होंने भारत को काउंसिलर ऐक्सस तक नहीं दी. बल्कि कहा ये जा रहा है कि उसे ईरान से अग़वा करके लाया गया. न ही आम लोगों के बीच संपर्क में बढ़ोत्तरी हुई है.
वो कहते हैं, "लोगों ने कहना शुरू कर दिया है कि हुर्रियत को लेकर हमारी बदलती नीति कितनी फायदेमंद है. अगर हमने हुर्रियत को लेकर लाल रेखा खींची थी, उसे हमने मिटा क्यों दिया?
इसका मतलब है कि भविष्य में हम जो लाल रेखा खींचेंगे, उसे कोई गंभीरता से नहीं लेगा. और अगर हम हुर्रियत को चरमपंथी संगठन बताते हैं और हम पाकिस्तान से उनकी मुलाक़ात होने देते हैं तो ये भारत के हित में तो नहीं है."
वो कहते हैं, "जनता में हुर्रियत को लेकर नीति पर हैरानी है. पाकिस्तान को लेकर भारत को चौकन्ना रहना चाहिए. अगले तीन साल मोदी सरकार के लिए महत्वपूर्ण होंगे."

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भारत के पूर्व विदेश सचिव सलमान हैदर का कहना है कि भारत के चीन, पाकिस्तान से संबंधों पर कोई ख़ास असर नहीं हुआ है. विदेश नीति में मोदी जी ने जोश दिखाया है. उन्होंने भारत का नाम बुलंद किया है. लोग उन्हें पहचानते हैं.
वो कहते हैं, "उन्होंने इशारे तो बहुत दिए हैं लेकिन अब तक नतीजे कम हैं. भारत और अमरीका के अच्छे संबंध चीन के खिलाफ़ नहीं हैं."
उनके मुताबिक़, "भारत की विदेश नीति पहले भी स्वतंत्र थी और अब भी स्वतंत्र है. उनके लिए चुनौती ये है कि जो काम उन्होंने करने की बात कही है, वो उन्हें करके दिखाना होगा. जैसे उन्होंने ईरान में चाबहार में बड़े निवेश की बात कही है जिसका कूटनीतिक असर ईरान और अफ़ग़ानिस्तान पर भी होगा औऱ इससे सबको फ़ायदा होगा, उन्हें ये अब करके दिखाना चाहिए."

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नेपाल के पूर्व विदेश मंत्री भेष बहादुर थापा कहते हैं, "मोदी सरकार की शुरुआत सकारात्मकता के साथ शुरू हुई थी. पड़ोस के देशों को प्राथमिकता देने की नीति की काफ़ी प्रशंसा हुई थी. वो नेपाल की यात्रा पर आए. उन्होंने नेपाल के प्रधानमंत्री को भारत आने का निमंत्रण दिया."
उनका कहना है, "लेकिन संविधान की घोषणा के बाद जैसे कुछ हो गया. कुछ अल्पसंख्यक लोगों ने इस मामले पर असंतोष जताया. इस पर एक दूसरे की मदद करने की बजाए, भारत के क़दमों से नेपाल के लोगों को निराशा हुई."

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उनके मुताबिक़, वो भावना अभी भी जारी है. स्थिति को वापस पटरी पर लाने के लिए नए क़दमों की ज़रूरत है.
नेपाल के भीतर सामान की आपूर्ति नहीं होने से लोग परेशान हुए. और ये भूकंप के बाद हुआ जिससे भारी तबाही हुई थी. इस कारण नेपाल सरकार ने दुनिया के विभिन्न देशों का रुख़ किया. लेकिन जो कुछ भी हुआ, अब स्थिति सामान्य हो रही है.
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