वाराणसी के नाविकों की सूरत बदलेगी?

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    • Author, रोशन जायसवाल
    • पदनाम, बनारस से, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वाराणसी यात्रा के बीच एक बार फिर से वाराणसी और गंगा की चर्चा छिड़ गई है.

और जब गंगा की बात होती है तो इसमें चलने वाले नाव और नाविकों की ओर भी ध्यान जाता है.

कहते हैं कि वाराणसी में गंगा नदी के किनारे नाव और नाविक के बिना कोई रीति रिवाज और कर्मकांड पूरा नहीं होते. मौजूदा केंद्र सरकार को दो साल बाद ही सही लेकिन गंगा पर निर्भर ग़रीब नाविकों की याद आई है.

यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने संसदीय क्षेत्र के दौरे के दौरान नाविकों के बीच 11 ई-बोट बांटने वाले हैं.

पिछले चार पीढ़ी से नाविक के पेशे से जुड़े भुमे निषाद नौका चालक हैं और ख़ाली वक़्त में आए पर्यटकों का गाकर मनोरंजन भी करते हैं.

वे मैली होती गंगा से काफ़ी नाराज़ हैं.

निषाद बताते हैं कि सफ़ाई सिर्फ़ गंगा घाट पर हो रही है, लेकिन जब तक गंगा में गिरते नाले बंद नहीं होंगे तब तक गंगा का पानी पीने लायक़ नहीं होगा.

नौका से पर्यटकों को घुमाने के दौरान वाराणसी के नाविक पक्के घाटों और उसके इतिहास के बारे में भी सैलानियों को बताते हैं.

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श्यामसुंदर साहनी भी अपनी रोज़ी-रोटी के लिए पिछली चार पीढ़ियों से गंगा पर आश्रित हैं और कम पढ़े-लिखे होने के बावजूद रोज़ाना दर्जनों लोगों को बनारस और गंगा घाट के इतिहास से परिचय करवाते हैं.

साहनी नौका विहार के लिए 25 से 50 रुपए प्रति घंटा किराया लेते हैं. कड़ी मेहनत के बावजूद वे अपने घर की ज़रूरतें पूरी नहीं कर पाते. रही सही कसर महंगाई पूरी कर देती है.

श्यामसुंदर सरकार से नाख़ुश हैं. वे कहते हैं कि 11 ई-बोट में से एक भी बोट किसी ग़रीब को नहीं मिलेगी.

यूं तो गंगा में मछली पकड़ना मना है, लेकिन कई पीढ़ियों से इस कारोबार में जुड़े वाराणसी के रामनगर क्षेत्र के ग़रीब मछुआरों के पास रोज़ी-रोटी का कोई दूसरा ज़रिया नहीं है.

एक पैर से विकलांग मछुआरे अवधेश ने बीबीसी हिंदी को बताया कि पूरे दिन खटने और रोक-टोक से बचने के बाद वे 100 से 150 रुपए ही बचा पाते हैं.

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सात लोगों के परिवार में रहने वाले विकलांग अवधेश अपने बूढ़े पिता के साथ ही रहते हैं. हालांकि अवधेश को मौजूदा मोदी सरकार से काफ़ी उम्मीदें हैं.

अवधेश के बड़े भाई रामनाथ ने बताया कि नाविकों और मछुआरों की हालत काफ़ी ख़राब है. मछली पकड़ने पर प्रतिबंध के बावजूद वो इस काम को बंद नहीं कर सकते क्योंकि उन्हें कुछ और नहीं आता. पूरे दिन मेहनत के बाद कभी 50 रुपए तो कभी 100 रुपए भी मिल जाता है.

ख़ुद तीन पीढ़ी से नाविक और नाविकों के हक़ की बात करने वाले वाराणसी में नौका धारक समाज के सदस्य विनोद निषाद ने बीबीसी हिंदी को बताया कि वाराणसी में लगभग 14 हज़ार नाव मालिक और नाविक हैं और इनके परिवार की संख्या मिला दी जाए तो 50 से 60 हजार लोग हैं.

विनोद निषाद कहते हैं, “इनके काम में नौका चलाना, मछली पकड़ना, पर्यटकों को घुमाना, गोता लगाकर गंगा से पैसा निकालना और गंगा पार खेती करना भी शामिल है. जान पर खेलकर डूबते लोगों को बचाना और हर वक़्त पुलिस की मदद करने का काम नाविक करते आ रहे हैं. लेकिन 1979 से लगातार नाविक समाज का शोषण होता आ रहा है.”

निषाद कहते हैं कि पीएम मोदी बनारस ई-बोट बांटने आ रहे हैं, लेकिन ज़रूरी है कि यह तकनीक सभी नाव में लगे और नाव की रफ़्तार भी ठीक रहे तभी पीएम मोदी का सपना पूरा हो पाएगा.

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उन्होंने इस बात की भी आशंका जताई कि बारिश में ई-बोट कम पावर के चलते कारगर साबित नहीं होगा तो नाविकों के रोज़ी-रोटी छिनने का ख़तरा उत्पन्न हो जाएगा.

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