बांग्लादेशी 'घुसपैठियों का बोरिया-बिस्तर नहीं बंधा'

    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, असम से

लोअर असम में अवैध घुसपैठ बड़ा चुनावी मुद्दा है. यह कहा जाता रहा है कि बांग्लादेश से बड़े पैमाने पर घुसपैठ की वजह से इस इलाक़े में बहुत से मुसलमान ऐसे हैं, जो अवैध तरीक़े से रहते आ रहे हैं.

असमिया लोगों की मांग है कि ऐसे लोगों को चिन्हित कर उन्हें वापस बांग्लादेश भेज देना चाहिए.

हालांकि यहां के कई बांग्लाभाषी मुसलमान ऐसे हैं जिनका कहना है कि वो कई पुश्तों से रह रहे हैं और उनके नाम 1951 के नेशनलिटी रजिस्ट्रेशन सर्टिफ़िकेट (एनआरसी) के रजिस्टर में हैं.

लोअर असम में विधानसभा का चुनावी प्रचार ऊपरी असम की तुलना में थोड़ा हटकर है. यहां वो सब मुद्दे नहीं जिन्हें लेकर राजनीतिक दल प्रचार करते रहे थे.

दूसरे चरण की 61 सीटों के लिए होने वाले प्रचार में बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा सबसे ऊपर है.

पिछले लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि अगर उनकी पार्टी की सरकार बनी तो फिर 'एक महीने के अंदर बांग्लादेशी घुसपैठिए अपनी सामान बाँध लें.'

भाजपा ने लोकसभा की सात सीटें अपने नाम कर लीं पर किसी का सामान नहीं बंधा.

स्थानीय असमिया लोगों का आरोप है कि बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ बदस्तूर जारी है और यह इस इलाक़े के लिए एक बड़ी समस्या बन चुकी है.

मगर इस चुनावी क़वायद के बीच कई ऐसे बांग्लाभाषी मुसलमान हैं जिनका दावा है कि उनके नाम एनआरसी रजिस्टर में 1951 से हैं फिर भी उनकी नागरिकता पर शक किया जा रहा है.

इनमें से कई के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए. अब प्रशासन को इनकी नागरिकता पर शक है.

आमिर ख़ान की पत्नी के नाम शक वाले मतदाताओं की सूची में है.
इमेज कैप्शन, आमिर ख़ान की पत्नी के नाम शक वाले मतदाताओं की सूची में है.

ऐसे वोटरों को डी-वोटर यानी डाउटफुल वोटर की सूची में शामिल किया गया है. इनमें एक हैं आमिर ख़ान, जिनके दादा और पिता का नाम 1951 की एनआरसी में है पर उनकी पत्नी को एक दिन अचानक नोटिस मिला कि उनकी नागरिकता पर शक है.

जिनकी नागरिकता पर शक है वो ज़्यादातर बांग्लाभाषी ही हैं जिनका आरोप है कि बेवजह उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है.

लोअर असम के बारपेटा में कई ऐसे मामले आए हैं जब परिवार के सारे सदस्यों के नाम मतदाता सूची में शामिल हों और उनमे से किसी एक को अचानक डी-वोटर की सूची में शामिल कर दिया गया हो.

बारपेटा के ही ऐनुल हक़ हैं जिनके पूरे परिवार का नाम मतदाता सूची में है मगर उनकी माँ मनीकजान का नाम डी-वोटर सूची में डाल दिया गया.

ऐनुल हक़ की मां का नाम भी मतदाता सूची से ग़ायब.
इमेज कैप्शन, ऐनुल हक़ की मां का नाम भी मतदाता सूची से ग़ायब.

सामाजिक कार्यकर्ता हिलालुद्दीन कहते हैं कि किसी को नहीं पता कि नाम डी-वोटर सूची में शामिल करने का मापदंड क्या है.

वहीं इसी इलाक़े के मोतिउर्रहमान कहते हैं कि उनके पिता, माँ और सभी भाई-बहनों का नाम मतदाता सूची में है, मगर उन्हें उस सूची से बिना कोई कारण बताए हटा दिया गया. उनका नाम एनआरसी में भी है.

दूसरी तरफ़, असमिया लोगों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन यानी आसू के भृगुदेव असमिया कहते हैं कि बांग्लादेश से घुसपैठ बड़ी समस्या बन गई है, ख़ासकर लोअर असम में.

उनका आरोप है कि घुसपैठ की वजह से असम की संस्कृति ख़त्म हो रही है.

उन्ही के संगठन के अंचल दास कहते हैं कि उनका संगठन इसके लिए प्रतिबद्ध है कि मार्च 1971 के बाद बांग्लादेश से आकर असम में बसने वालों को वापस जाना ही होगा, चाहे वो हिंदू हों या मुसलमान.

आसू का आरोप है कि घुसपैठ के चलते लोअर असम में बांग्लाभाषी मुसलमानों की आबादी में बड़ी वृद्धि हुई है.

इस चुनावी मुद्दे को अपने फ़ायदे के लिए सभी भुना रहे हैं और ध्रुवीकरण की कोशिश भी कर रहे हैं.

हालांकि आम लोगों का कहना है कि अच्छा होगा कि इस समस्या का स्थायी हल निकाला जाए और नए सिरे से सर्वे हो ताकि जो वाक़ई यहाँ के मूलवासी हैं उन्हें भाषा के नाम पर तंग न किया जाए- चाहे बांग्लाभाषी हिंदू हों या बांग्लाभाषी मुसलमान.

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