उर्दू लिखाड़ियों से सफ़ाई मांगने में ग़लत क्या?

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- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, इस्लामाबाद से, बीबीसी हिंदी के लिए
आख़िर इसमें कौन सी आपत्ति है, अगर नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज ने माली सहायता उपलब्ध करने वाले तमाम उर्दू लिखाड़ियों और मैगज़ीन एडिटर्स को दो गवाहों की मौजूदगी में यह शपथ पत्र भरने को कहा है कि मेरी पुस्तक या मैगज़ीन में ऐसा कुछ नहीं जो भारत सरकार की नीतियों या राष्ट्रीय हित के ख़िलाफ़ हो या जिससे समाज के अन्य वर्गों में नफ़रत फैलती हो.
मुझे वाकई में समझ में नहीं आ रहा है कि उर्दू वाले और उनके हिमायती दूसरी भाषाओं के लिखाड़ी इतनी ज़रा सी बात पर क्यों शोर मचा रहे हैं?
ये काम तो स्मृति ईरानी के मंत्रालय ने राष्ट्रीय विचारधारा की एकता के लिए किया है. वैसे भी अगर आप किसी से पैसे ले रहे हैं या अपनी पुस्तकें उसे बेच रहे हैं तो फिर आप उसके आदेश का पालन क्यों नहीं करेंगे?
ये कोई आपके पैसे तो नहीं हैं. सरकार अपनी जेब से दे रही है ना.

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हमारे पाकिस्तान के संविधान के मुताबिक़ पार्लियामेंट के हर सदस्य को भले वो मुसलमान हो या ना हो, ये शपथ लेनी पड़ती है कि मैं क़ुरान, भगवत गीता या बाइबिल या ग्रंथ साहिब पर हाथ रखकर क़सम उठाता हूं कि इस्लामिक विचारधारा की बुनियाद पर बनाए गए देश के संविधान का पालन और इसकी रक्षा करूंगा, अल्लाह मेरा हामी हो, नासिर हो.
मैंने तो आजतक किसी पाकिस्तानी मेंबर ऑफ पार्लियामेंट को इसपर नाक भौं चढ़ाते नहीं देखा.
मगर शपथ ग्रहण करने का फॉर्म सिर्फ़ उर्दू लिखाड़ियों और एडिटरों के लिए है या हर भारतीय भाषा के विकास के लिए स्थापित हर उस सरकारी संस्था के लिए है जो लिखाड़ियों की मदद करती है.
हो सकता है कि किसी सरकारी जांच कमिशन ने खोज कर ली हो कि सरकार की आलोचना और राष्ट्रीय हितों के ख़िलाफ़ बातें सिर्फ उर्दू की किताबों और पत्रिकाओं में ही होती है.

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अगर सिर्फ उर्दू में ही होती है तो वेरी बैड. हो सकता है कि भारतीय भाषाओं और बोलियों के विकास के लिए ये कोई नया सरकारी पायलट प्रोजेक्ट हो जो अगर उर्दू लिखाड़ियों को नकेल डालने में सफल हो गया तो फिर हिंदी, कन्नड़, मैथिली और बांग्ला समेत हर भाषा के लिखाड़ी से कहा जा सकेगा कि आप भी उर्दू लिखाड़ियों की तरह आराम से अच्छे बच्चों की तरह गला घुटवा लें.
मतलब ये कि रौनक़ मेला लगा रहना चाहिए भले वो लव जिहाद की शक्ल में हो, कि गौ हत्या रोकने की योजना हो, कि जेएनयू के 'देशद्रोहियों' को मज़ा चखाने के रूप में, कि उर्दू लिखाड़ियों को सरकार विरोधी लेख ना छपवाने की सूरत में.
यूं भी दुनिया भर में सरकारें ऐसे छुटपुट मामलें तभी सुलटाती हैं जब बड़े-बड़े मामलें सुलझाए जा चुके हों.
अब क्या बाक़ी चार साल हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहें. परेशान ना हों सीमा पार नवाज़ शरीफ़ सरकार भी ऐसे ही मसले आजकल हल करने में जुटी पड़ी है, क्योंकि कोई बड़ा मसला उसकी पकड़ में आ नहीं रहा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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