'भूतनी' पर सवार 'तिड़फूंकनी' की तलाश में

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- Author, रविंद्र सिंह रॉबिन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
अगर कोई आपको मिले और कहे कि वो भूतनी से उतरकर तिड़फूंकनी की तलाश में है और वह भी ऐसी तिड़फूंकनी जिसमें दो धोखेबाज़ चुप हों और वह मीठा प्रसाद खाना चाहता है वो भी दो लड़की के साथ. तो आप क्या कहेंगे?
घबराएं न और न ग़ुस्से में आएं. क्योंकि इसकी पूरी संभावना है कि कहने वाला भारी लड़ाका हो और वह निहंग हो जो अपनी ख़ास ज़बान में बात कर रहा हो.
वो बस यह कहना चाहता है कि वो ट्रेन से उतरकर चाय की तलाश में है और वह भी ऐसी चाय जिसमें दो चम्मच शक्कर हो और वह रोटी खाना चाहता है वो भी दो मिर्चों के साथ.
निहंग (जिन्हें अकाली भी कहा जाता है) प्रसिद्ध और सम्मानित हथियारबंद सिख जाति है. सिख इतिहास और विशेषकर सिख सैन्य इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए निहंगों को सिख समाज में बहुत प्यार और सम्मान के साथ देखा जाता है.

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अब चूंकि यह शांति काल है, इसलिए निहंगों की गतिविधियां सिर्फ़ रस्मी किस्म की हैं.
निहंग सिखों को दुनियावी चीज़ों की चाहत नहीं होती. वो नीले कपड़े पहनते हैं. उनकी पगड़ी एक फ़ुट या उससे भी ज़्यादा ऊंची हो सकती है. इसकी चोटी पर एक 'दुमाला' होता है. वह हमेशा कई हथियार साथ रखते हैं, जैसे चक्र या खांडा.
सिख पंथ के 'दिलेर' माने जाने वाले निहंग सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह के 300 साल पहले स्थापित किए गए दस्ते के सदस्य हैं.
सिखों की जंगों के दिन तो बीत गए लेकिन उस समय विकसित हुई ख़ास बोली जो उन्हें विपरीत हालात में मज़बूती और उत्साह देती थी, अब भी बची हुई है.

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निहंगों के 'बोले' जो उनकी बोली का हिस्सा हैं, अब भी निहंगों के हर संप्रदाय में इस्तेमाल होती है. इन दिनों उनकी अलग ज़ुबान अजीब लग सकती है पर दुश्मन से लड़ते वक़्त मुश्किल समय में यह काफ़ी हौसला देती थी.
तारन दल के उपाध्यक्ष बाबा गज्जन सिंह ने बीबीसी से कहा कि उन दिनों में भी आम आदमी उनकी बोली नहीं समझता था क्योंकि इसे विशेष रूप से सैन्य उपयोग के लिए तैयार किया गया था.
इसकी वजह से दुश्मन और उनके जासूसों को छकाया जा सकता था, जो सिख योद्धाओं की योजना जानने के लिए उनके बीच घुल-मिल जाते थे. इसके अलावा यह मर्दाना बोली उन्हें प्रसन्न करने वाले हल्केपन से भर देती ताकि वह अपनी तकलीफ़ के बारे में भूल जाएं.

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वह कहते हैं कि सिख योद्धा एक अकेले सैनिक को 'सवा लाख' कहते थे.
"कल्पना करो कि एक शब्द सवा लाख का जासूस पर क्या प्रभाव पड़ता होगा जब वह यह सुनता होगा कि सवा लाख फ़ौज दुश्मन पर हमला करने को तैयार है और योद्धाओं के बीच बादाम बांटे जा रहे हैं, जो दरअसल मूंगफली होती थी."
वह कहते हैं कि यह तूफ़ानी बोली जो विपरीत हालात में विकसित हुई थी, न सिर्फ़ दुश्मन को धोखा देने के लिए थी बल्कि सिख योद्धाओं की डूबती हिम्मत को बढ़ाने के भी काम आती थी जिनके पास कभी-कभी युद्ध क्षेत्र में खाने को कुछ नहीं होता था.
जंग के दौरान जिन सिख योद्धाओं की आंखों की रोशनी चली जाती थी या वो बहरे हो जाते थे तो उन्हें 'सूरमे' और 'चौबारे' कहा जाता था.

एक अन्य निहंग जोगा सिंह कहते हैं कि तेज़ मिर्ची को 'लड़की' कहा जाता था क्योंकि यह जीभ पर चुभन छोड़ जाती थी और फूलगोभी को पठानी कहा जाता था.
एक और निहंग सिख करम सिंह कहते हैं कि युद्ध क्षेत्र में सिख योद्धा अक्सर अपने हाथों में 'निशान साहिब' लेकर चलते थे जो ज़मीन पर तभी गिरता था जब वह घायल हो जाते या मारे जाते.
उन्होंने बताया कि निशान साहिब के बजाय सिख योद्धा फ़र्ला- एक नीले रंग का कपड़ा- लेकर चलते थे जिसे सिख योद्धा की पगड़ी की चोटी पर बांध दिया जाता था.
अपने घोड़े को अपनी जान से ज़्यादा चाहने वाले गुरदीप सिंह कहते हैं, "घोड़े निहंग की ज़िंदगी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. हम इन्हें जान भाई कहते हैं."

वह कहते हैं कि घोड़े अब भी जंग में सबसे अच्छे साथी हैं क्योंकि यह आसानी से कुएं, छोटे नाले, पहाड़ी को पार कर जाते हैं जो आधुनिक वाहन नहीं कर सकते.
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