नवादा में क्यों धधके दलितों के आशियाने

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- Author, नीरज सहाय
- पदनाम, नवादा से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
बिहार के नवादा जिला के कझिया गांव के बाहर लगभग 70 दलितों की अस्थायी झोपड़ियां बीते मंगलवार की शाम आग की भेंट चढ़ गईं. हालांकि इस घटना में किसी भी प्रकार का जान-माल का नुकसान नहीं हुआ है.
थाने में अज्ञात लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज करा दी गई है.
ये गांव राजधानी पटना से महज 150 किलोमीटर दक्षिण में बसा है. ये सभी झोपड़ियां सरकारी गैर-मजरुआ (गैर मालिकाना) ज़मीन पर बनी थीं.

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गांव के दलित समाज के चन्द्रिका राम के अनुसार मंगलवार शाम करीब 6.30 बजे के करीब यह हादसा हुआ.
वे गांव के ही कुछ लोगों पर आग लगाने का आरोप लगाते हैं.
पीड़ित नीलू राम कहते हैं कि हमारे घरों में लोगों के रहने की जगह नहीं है, इसलिए हमने यहाँ झोपड़ियां बनायीं. लेकिन गांव के कुछ लोगों को यह नागवार गुजरा.

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वैसे भी भूमिहीनों के लिए सरकार के पास तीन डेसीमल जमीन उपलब्ध कराने की योजना है.

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मिश्रित आबादी वाले इस गांव एक दूसरा पहलू भी है. इस गाँव में जाने पर यह महसूस हुआ कि यहाँ शांति कायम है. गांववाले भी ऐसा ही चाह रहे हैं. लेकिन वे आगजनी की घटना से इंकार करते दिखे. लगभग 80 साल के अर्जुन सिंह कहते हैं कि गाँव में शांति है. घटना से किसी को कोई लेना-देना नहीं है.लेकिन जब-जब चुनाव का समय आता है विभिन्न जातियों के नेता अपनी तिकड़म लगाने लगते हैं.

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वहीँ मोहम्मद मुश्ताक खान का कहना है कि यहाँ सब ठीक-ठाक है.इस जगह अल्पसंख्यक हर साल ताजिया का पहलाम करते हैं.
इस अवसर पर लगभग पांच से छह हज़ार लोग जुटते हैं.

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आग लगी या लगाई गई, इसपर पीड़ितों का अपना पक्ष है. इस घटना पर गाँव के सवर्ण और अल्पसंख्यक समाज के अपने तर्क हैं.
लेकिन ये भी तय है कि इस गैर-मजरुआ सरकारी जमीन पर दबदबा कायम रखने के लिए लड़ाई तेज होने लगी है.
पंचायत चुनाव के ठीक पहले हुई इस घटना से गांव का राजनीतिक माहौल गरम हो रहा है.












