पंजाब बंद: धार्मिक असहिष्णुता या सियासी खेल

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
पवित्र पुस्तक श्रीगुरु ग्रंथ साहिब के 'अपमान' के विरोध में पंजाब बंद रहा.
ये बंद सिख संगठनों की तरफ़ से बुलाया गया था.
पंजाब सरकार ने पवित्र पुस्तक के कथित अपमान और उसके बाद हुई हिंसा की न्यायिक जांच का ऐलान किया है. धार्मिक भावनाओं को भड़काने वालों का सुराग़ देने वाले को राज्य सरकार ने एक करोड़ रुपए देने की भी घोषणा की है
क्या कथित धार्मिक अपमान का मामला देश भर में चारों तरफ घट रही असहिष्णुता वाली घटनाओं की एक कड़ी है? क्या इन घटनाओं के तार सियासी पार्टियों से जुड़ते हैं?
"वैचारिक उथलपुथल"

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वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय कहते हैं कि 2014 के बाद से भारत में 'वैचारिक उथल-पुथल का दौर शुरू हुआ है' जिसका परिणाम आजकल होने वाली घटनाएं हैं.
बुधवार को पंजाब में होने वाली घटना के बारे में उन्होंने कहा, "राज्य सरकार की जो विफलता है, उससे ध्यान हटाने के लिए संभव है कि अकाली समर्थकों ने ये बात की."
शेखर अय्यर अंग्रेज़ी के एक ऐसे पत्रकार हैं जो बीजेपी को ज़माने से जानते हैं. उनका कहना है बीजेपी की सहयोगी पार्टियां हों या दूसरी क्षेत्रीय पार्टियां, सब को ऐसा लगता है कि बीजेपी ने हिन्दुओं के मुद्दों पर अपना एकाधिकार जमा लिया है.
इसलिए जहाँ भी चुनाव होने वाला है, वहां वो खुद को बीजेपी से अधिक हिन्दूवादी दिखाने की कोशिश करती हैं.
राजनीतिक बिसात

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वो कहते हैं, "अगले दो सालों में उत्तर प्रदेश, पंजाब और मुंबई महानगर पालिका में चुनाव होने वाले हैं. आप जो इन दिनों घटनाएं देख रहे हैं, वो चुनाव के कारण हो रहा है"
पंजाब में 2017 में चुनाव होगा. राम बहादुर राय के अनुसार प्रकाश सिंह बादल सरकार से आम जनता असंतुष्ट है. किसान नाराज़ हैं.
सत्तारूढ़ बीजेपी और अकाली दल के बीच काफी समस्याएं हैं. लेकिन फिलहाल, ना तो बीजेपी और ना ही अकाली दल, अकेले चुनाव लड़ने की सोच सकती है. इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अकाली दल से नज़दीक रहने के लिए मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को हाल में सम्मानित किया.
राम बहादुर राय के मुताबिक़, सियासी अनिश्चितता के इस दौर में छोटी पार्टियां खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं.
उनके अनुसार, "आजकल की घटनाएं क्षेत्रीय पार्टियों की पहचान को बचाने की कोशिशों का नतीजा हैं. इनमें बीजेपी की सहयोगी पार्टियां भी शामिल हैं. जिन्होंने छोटी-मोटी संकीर्णताओं के आधार पर जिन लोगों ने अपनी पहचान बनाई थी, उन्हें ऐसा लगता है कि अगर बड़ी पहचान का व्यक्ति, जिसका प्रतीक नरेंद्र मोदी बन गए हैं - अगर इसी तरह से बढ़ता रहा तो उनके लिए संकट खड़ा होगा."
शिवसेना के तेवर

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शिवसेना के तेवर से इस बात के संकेत मिलते हैं कि पार्टी अपनी आक्रामक रुख वाली छवि को दोबारा हासिल करने के लिए बेक़रार है.
शेखर अय्यर की राय में शिवसेना "बीजेपी और नरेंद्र मोदी को चोट पहुँचाना चाहती है". वो बीजेपी और मोदी से अधिक हिन्दूवादी दिखना चाहती है.
इसीलिए मंगलवार को पार्टी ने कहा कि इसने गोधरा और अहमदाबाद वाले नरेंद्र मोदी को समर्थन दिया था. पार्टी के कहने का मतलब ये था कि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता गोधरा और गुजरात दंगों के कारण है.
प्रधानमंत्री के खिलाफ़ ये 'जुमला' उन्हें अपमानजनक लगा होगा. लेकिन शिवसेना की ये सियासी मजबूरी है कि वो मोदी, आरएसएस से अधिक कट्टर हिन्दूवादी नज़र आए.
बीजेपी ज़िम्मेदार

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लेकिन क्या धार्मिक और सांस्कृतिक विवादों की ज़िम्मेदार केवल बीजेपी जैसी बड़ी पार्टी या मोदी जैसी बड़ी हस्ती हैं?
शेखर अय्यर कहते हैं, "दादरी जैसी घटनाओं को रोकना मोदी सरकार के लिए बहुत ज़रूरी है. प्रधानमंत्री मोदी, बीजेपी और आरएसएस सभी हिन्दू संस्थाओं के कारनामों को रोकने में असफल रहे हैं.
प्रधानमंत्री ने सत्ता में आने पर देश में 10 सालों तक किसी तरह के धार्मिक झगड़ों और हिंसा की वारदातों पर अनौपचारिक पाबंदी की अपील की थी.
लेकिन बीजेपी की सहयोगी पार्टियां हों या 'हिन्दू परिवार' के सदस्य सभी ने इसे नज़रअंदाज़ कर दिया.
विशेषज्ञों के विचार में क्षेत्रीय पार्टियों के सामने जितनी बड़ी चुनौती अपना वजूद और पहचान बचाने या इसे मज़बूत करने की है, उतना ही बीजेपी के लिए ज़रूरी है कि वो इन पार्टियों को ख़ुद से पीछे रखे.
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