कभी माओवादी कमांडर थे, अब बीजेपी काडर

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बेगूसराय से
खड़क नारायण तांती आज भारतीय जनता पार्टी के एक साधारण कार्यकर्ता हैं और पार्टी के सिद्धांतों पर चलने का काम भी कर रहे हैं.
मेरी मुलाक़ात उनसे सड़क पर तब हुई जब वो बेगूसराय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभा से वापस लौट रहे थे.
जेब पर सफ़ेद कमल के फूल का निशान. ठीक उसी तरह जिस तरह प्रधानमंत्री और भाजपा के बड़े नेता लगाते हैं.
बिहार के लेनिनग्राद के नाम से पहचान बनाने वाले बेगूसराय के टेगरा में उनका जन्म कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित परिवार में हुआ. उनके पिता भी भाकपा के सक्रिय सदस्य रहे और बड़े भाई भी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की जिला कमिटी के सदस्य हैं.
मगर खड़क नारायण तांती ने और भी ज़्यादा बायाँ रास्ता अपना लिया था. वो भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) से जुड़ गए और कुछ ही सालों में एरिया कमांडर तक की पोस्ट तक पहुँच गए.
बाएं से दाएं का उनका सफ़र भी बड़ा हैरान करने वाला है. आखिर ऐसा क्या हुआ जिसने उन्हें अतिवाम विचारधारा से दक्षिण पंथ की तरफ मोड़ दिया?
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तांती कहते हैं, "वो था भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के लोगों और नेताओं का रवैया."
अपने अंतिम दिनों तक खड़क नारायण के पिता रतन तांती भी वाम आन्दोलन से सक्रिय रूप से ही जुड़े रहे.
"मगर उसका क्या सिला मिला? भाकपा के कैडरों और नेताओं ने मेरे साथ अच्छा सुलूक़ नहीं किया. उन्हें पता था कि मैं माओवादी हूँ. मगर था तो वाम विचारधारा का ही एक सदस्य. इन लोगों ने मेरे परिवार, मेरी बीवी, मेरे बच्चों को तंग करना शुरू कर दिया. पुलिस की मुखबिरी करने लगे. बहुत परेशान किया."
खड़क नारायण तांती कई बार जेल जा चुके हैं. हालांकि कुछ मामलों में उन्हें बेल मिली है, मगर उनके ख़िलाफ़ दर्ज मुक़दमे विभिन्न अदालतों में चल रहे हैं.
उनका कहना है कि उन्हें वापस एक सामान्य ज़िन्दगी जीने में भाजपा और संघ के लोगों ने मदद की, इसीलिए वो संघ की विचारधारा से प्रभावित हुए.
कम्युनिस्ट गढ़

"हालांकि आज तक मैंने संघ की किसी बैठक में हिस्सा नहीं लिया. मगर वो लोग मेरी मदद करते रहे. मुझे नरेंद्र मोदी की बात अच्छी लगती है. वो मुझे एक गंभीर राजनेता लगते हैं. इसीलिए 2014 में मैंने भी भाजपा में शामिल होने का मन बना लिया."
बेगूसराय, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के गढ़ रहा है और एक दौर ऐसा भी था जब यहाँ की सभी सात विधानसभा सीटों पर इसी दल का कब्जा रहा. मगर पिछली विधानसभा में भाकपा ने सिर्फ़ एक ही सीट जीती थी.
पार्टी के 73 वर्षीय सदस्य कामरेड सतीश अपने कम होते आधार का ठीकरा भूमंडलीकरण और उपभोक्तावाद पर फोड़ते हैं.
वो कहते हैं कि पूंजीवाद इस क़दर नवयुवकों के बीच हावी हो गया है कि वो उसी विचारधारा की तरफ आकर्षित होने लगे हैं जहाँ फ़ायदा होता हो.
यही वजह है कि बेगूसराय, और ख़ास तौर पर बिहट जैसे वामपंथियों के गढ़ में कहा जाने लगा है कि अब उनकी विचारधारा अप्रासंगिक सी होने लगी है.
युवाओं से दूरी

टेगरा विधानसभा सीट से पार्टी के प्रत्याशी राम रतन सिंह कहते हैं कि वाम विचारधारा से जुड़ने का मतलब है मजदूरों और शोषितों की लडाई लड़ना और वो भी अपनी जेब से, भूखे रहकर.
वो कहते हैं, "आज का युवा जिन चीज़ों की तरफ आकर्षित हो रहा है वो सब हम दे नहीं सकते."
मगर राम रतन सिंह को लगता है कि खिसकते आधार के बावजूद कोई वाम दलों के चरित्र पर उंगली नहीं उठा सकता.
उनका कहना है कि जिस तरह के सपने दिखाकर 'पूंजीवादी' पार्टियां युवाओं को आकर्षित करना चाह रही हैं, उनकी हक़ीक़त जल्द ही सामने आ जाएगी और एक बार फिर वाम दलों का आधार फैलने लगेगा.
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