मुसलमानों को लेकर असमंजस में कांग्रेस?

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- Author, संदीप भूषण
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस चुनावी राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए जूझ रही है.
मोदी ब्रांड वाले बेलगाम हिंदुत्व से परेशान कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राहुल गांधी के क़रीबी समझे जाने वाले <link type="page"><caption> दिग्विजय सिंह</caption><url href="http://indiatoday.intoday.in/story/digvijaya-singh-congress-will-back-beef-ban/1/491222.html" platform="highweb"/></link> ने गाय को मारने पर रोक लगाने के लिए केंद्रीय क़ानून बनाने की अपील की है.
यह साफ़ नहीं है कि सिंह ने यह बयान क्यों दिया. यह मामला तो राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है.
देश के 29 में से 25 राज्यों में गाय काटने पर पहले से ही प्रतिबंध है. प्रतिबंध लगाने से लोगों का ग़ुस्सा भड़क सकता है, जैसा कि जम्मू-कश्मीर में हाल ही में हुआ.
इसकी एकमात्र वजह संभवतः कांग्रेस पार्टी में दक्षिणपंथ की ओर बढ़ रहा झुकाव है.
दक्षिणपंथ की ओर झुकाव

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पार्टी के अंदर के कई लोगों का मानना है कि दिग्विजय सिंह ने उपाध्यक्ष राहुल गांधी के ढीले-ढाले रवैये से सीख ली है.
हाल ही में दिल्ली से महज़ 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बिसाहड़ा गांव में एक मुसलमान को पीट-पीट कर मार डालने के ख़िलाफ़ जब देश के कई इलाक़ों में ग़ुस्सा भड़क गया तो राहुल वहां तीन अक्तूबर को पहुंचे- घटना के पांच दिन बाद.
बाद में अपने स्वभाव के विपरीत पार्टी ने ट्वीट किया, "राहुल बिसाहड़ा गांव के बाशिंदों की अमन चैन बनाए रखने की इच्छा से काफ़ी भावुक हुए."
यह ज़मीनी सच्चाई के एकदम उलट था, जबकि उग्र गोरक्षक समूह वहां सांप्रदायिक नफ़रत को लगातार भड़का रहे हैं.
साल 2014 के बाद कांग्रेस की समस्या एके एंटनी समिति की रिपोर्ट है.

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आम चुनावों में कांग्रेस की हार की पड़ताल के लिए बनी इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि मुसलमानों के 'तुष्टिकरण' की नीति कांग्रेस की हार की मुख्य वजह है, राहुल गांधी का उदासीन नेतृत्व हार की वजह नहीं है.
एंटनी रिपोर्ट ने 'सांप्रदायिक संगठनों' को अपनी पकड़ मज़बूत बनाने का मौक़ा दिया. यह कहना मुश्किल है कि एंटनी समिति आख़िर कैसे इस निष्कर्ष पर पंहुची?
सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में मुसलमानों की स्थिति सुधारने की दिशा में पुरानी कांग्रेस सरकारों के ख़राब रिकार्ड की काफ़ी आलोचना की गई थी. लेकिन एंटनी के निष्कर्षों ने कांग्रेस को न इधर का छोड़ा, न उधर का.
बिखरा अल्पसंख्यक वोट

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जिन राज्यों में कांग्रेस का मुक़ाबला सिर्फ़ भारतीय जनता पार्टी से है, वहां इसे पहले मिल रहा अल्पसंख्यकों का समर्थन बिखर गया.
क्षेत्रीय दलों के प्रभाव वाले दूसरे राज्यों में कांग्रेस को मिल रहा अल्पसंख्यक समर्थन बिल्कुल रुक गया.
श्रेयस सरदेसाई ने हाल ही में हिंदू अख़बार में लिखा, "मोदी सरकार के आने के बाद से संघ परिवार से जुड़े संगठनों के हमले अल्पसंख्यकों पर बढ़े हैं और एंटनी लाइन की वजह से कांग्रेस पार्टी इस पर बिल्कुल चुप है."
"यदि उसे लगता है कि इस तरह की निष्क्रियता अपनाने से उसे हिंदू वोट मिलेंगे, तो ऐसा होने का कोई आसार नहीं है. इस स्थिति का सबसे बड़ा फ़ायदा भाजपा को मिल रहा है और आगे भी मिलता रहेगा."

कांग्रेस पार्टी के दक्षिणपंथी झुकाव की वजह से जो जगह ख़ाली हुई है, उसे भरने के लिए ही मजलिस-ए-इत्तेहादुल-मुस्लमीन (एमआईएम) जैसी पार्टी आगे आई है.
एमआईएम ने महाराष्ट्र में कांग्रेस पार्टी के दलित-मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगा दी है. इसने महाराष्ट्र विधानसभा की दो सीटों पर क़ब्ज़ा किया और औरंगाबाद नगर निगम में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी. इसलिए बिहार में इसके प्रदर्शन पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं.
दक्षिणपंथ की ओर कांग्रेस पार्टी में झुकाव पहली बार नहीं हुआ है. कांग्रेस ने इसके पहले भी बहुसंख्यक की भावना को ख़ुश करने की नीति अपनाई है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण विवादित राम जन्मभूमि मंदिर का ताला खुलवाने का राजीव गांधी का फ़ैसला है.

पर 1990 तक कांग्रेस पार्टी एक बड़ी राजनीतिक ताक़त थी. राहुल गांधी के अनाड़ी नेतृत्व ने कांग्रेस पार्टी को अंदर ही अंदर विभाजित कर दिया है.
उनका सामना एक ऐसे नेता से है, जो तकनीकी रूप से सक्षम और अच्छा वक्ता है. उन्होंने अपनी शैली से जनमानस में जगह बना ली है, जो अब तक कोई नहीं कर पाया था.
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