तो पासवान, मांझी को कैसे बर्दाश्त करते?

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- Author, सुरूर अहमद
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
बिहार विधानसभा में न तो राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी, ना ही उपेंद्र कुश्वाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के एक भी विधायक हैं.
लेकिन बीजेपी ने इन दोनों पार्टियों को क्रमशः 40 और 23 सीटें दी हैं.
जबकि जीतनराम मांझी की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा को केवल 20 सीटें मिली हैं, वो भी कई दिनों की बातचीत के बाद. हालांकि उनके पास पहले से ही 13 विधायक और दो एमएलसी हैं.
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के अंदर मौजूदा स्थिति की यही विडंबना है.
लोजपा के नेता के आगे बीजेपी झुक गई क्योंकि वो भूली नहीं थी कि उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बाद जब पार्टी ने मायावती सरकार को समर्थन करने का फ़ैसला किया तो कुछ दिनों बाद ही 29 अप्रैल 2002 को कैसे पासवान ने वाजपेयी कैबिनेट से अपना नाता तोड़ लिया था.
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ये अलग बात है कि वो हमेशा ये कहते रहे कि उन्होंने गुजरात दंगों के कारण सरकार से इस्तीफ़ा दिया, जोकि असल में 27 फ़रवरी 2002 को शुरू हुआ था.
लेकिन पिछले साल एनडीए में दोबारा शामिल होने के बाद उन्होंने इस तरह का दावा कभी नहीं किया.
दलित राजनीति में अपने धुर प्रतिद्वंद्वी से मांझी को आधी सीटें मिली हैं, क्योंकि भगवा पार्टी का मानना है कि अनुसूचित जातियों के वोट ट्रांसफ़र कराने में राम विलास पासवान उनसे कहीं बेहतर स्थिति में हैं.
ऐसा इस तथ्य के बावजूद है कि पूर्व मुख्यमंत्री की पार्टी में कई मज़बूत नेता हैं, जिनमें कुछ तो अपने दम पर अपनी सीटें जीत सकते हैं.
लेकिन बिहार में एक बड़ी बहस ये शुरू हो चुकी है कि क्या बीजेपी पासवान की क्षमता को बढ़ा चढ़ा कर आंक रही है?
यह बात सही है कि संख्या, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से उनकी जाति दुषाध या पासवान दलितों की 22 उपजातियों में सबसे ताक़तवर है.
बिहार की कुल आबादी में अनुसूचित जाति के वोटरों की संख्या 15.1 प्रतिशत है और इन अनुसूचित जातियों में दुसाध जाति के वोटरों की संख्या लगभग 4 प्रतिशत है.
दलितों में संख्या के आधार पर दो अन्य मज़बूत जातियां हैं रविदास या चमार और मुसहर, जिन्हें भूनियां के नाम से भी जाना जाता है.
अहमियत

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दशरथ मांझी और जीतन राम मांझी, दोनों ही महादलित उपजाति में उस सबसे निचली जाति से आते हैं, जो अपने नाम के आगे अक्सर मांझी लगाते हैं.
लेकिन अगर पासवान और मुसहर संख्या के लिहाज़ से एक जैसे ताक़तवर हैं तो ऐसा क्यों है कि पासवान को इतनी ज़्यादा अहमियत दी जा रही है?
सच्चाई ये है कि उत्तर प्रदेश से अलग, बिहार में पासवानों की राजनीतिक सत्ता में काफ़ी हिस्सेदारी है. राम विलास के गृह जनपद हाजीपुर जैसी जगहों और इसके आस-पास के संसदीय क्षेत्रों में उनकी ताक़त यादवों के बराबर है.
लेकिन उत्तर प्रदेश की तरह ही, बिहार के रविदास समुदाय का आम तौर पर बहुजन समाज पार्टी की ओर झुकाव होता है.
ऐतिहासिक रूप से पासवान ज़मींदारों की निजी पुलिस के रूप में काम करते थे.
इसके उलट, मुसहर भूमिहीन मज़दूर हैं, जिनमें से अधिकांश अभी भी चूहे और यहां तक कि पेड़ पौधों की जड़ें खाकर ज़िंदा हैं.
महादलित जातियां

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तमाम जगहों पर वो बहुत अमानवीय स्थितियों में रह रहे हैं, यहां तक कि उन्हें वोट भी नहीं देने दिया जाता, हालांकि 1990 में लालू यादव के उभार के बाद तो स्थिति में कुछ सुधार हुआ.
जबकि बीजेपी मुसहर और अन्य महादलित जातियों को लेकर आशंकित है. पार्टी जानती है कि पिछले लोकसभा चुनाव में दुसाध जाति के 68 प्रतिशत लोगों ने एनडीए को वोट दिया था.
ये शायद लोजपा के एनडीए में आने के बाद ही ऐसा संभव हो पाया.
हालांकि लोजपा को 6.4 प्रतिशत वोट मिले थे, जोकि बहुत महत्वपूर्ण थे.
इन तथ्यों के बावजूद यह सच है कि बीजेपी ने राम विलास को कुछ ज़्यादा ही आंका है.
वो कोई मायावती नहीं हैं, जहां दलित आबादी 21 प्रतिशत तक है, जिनमें दो तिहाई रविदास हैं और जिन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटव के नाम से जाना जाता है. मायावती इसी समुदाय से आती हैं.
मायावती और पासवान

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आगरा, मेरठ, कानपुर, इलाहाबाद आदि शहरों या ऐसी जगहों पर जहां चमड़ा उद्योग और टेनरीज़ हैं, रविदास समुदाय की संख्या पर्याप्त है.
इन जगहों पर कैंटोमेंट इलाक़े हैं और ब्रिटिश सरकार ने 1857 की बग़ावत के बाद इन शहरों को आबाद किया था.
इसलिए सैन्य वर्दीयां, बेल्ट और बूट की मांग के चलते इन जगहों पर कपड़ा और चमड़ा उद्योग काफ़ी फला फूला.
इसीलिए रविदास बिहार के पासवानों के मुक़ाबले थोड़ा सम्पन्न हैं.
जबकि पासवानों का मुख्य आधार ग्रामीण अर्थव्यवस्था या प्रवासियों द्वारा भेजा गया पैसा होता है.
इस समय लोजपा के पास छह सांसद हैं, और 2014 में उनकी पार्टी को 6.4 प्रतिशत वोट मिले थे.
कांटे की टक्कर

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यह तथ्य बताता है कि बीजेपी के वोट बैंक ने लोजपा की मदद की, क्योंकि 2014 के चुनाव में इसके सात में से छह उम्मीदवार जीते थे.
कांटे की टक्कर वाली इस लड़ाई में बीजेपी राम विलास को नाख़ुश करने का जोखिम नहीं मोल ले सकती, जो अक्सर ख़ुद को केवल बिहार ही नहीं पूरे देश के सबसे बड़े दलित नेता होने का दावा करते रहते हैं.
ये अलग बात है कि वो हमेशा या तो बीजेपी या कांग्रेस या जनता परिवार के हिस्से के रूप में ही जीत हासिल करते रहे.
जबकि मायावती हमेशा ही विपरीत परिस्थितियों में ख़ुद के दम पर जीतीं.
अगर राम विलास पासवान 2002 में एनडीए में मायावती की एंट्री को बर्दाश्त नहीं कर सके तो वो एनडीए में जीतन राम मांझी को अधिक सीट दिए जाने को कैसे बर्दाश्त करेंगे?
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