बांग्लादेशी हिंदुओं के मुद्दे पर असम बंद

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    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

31 वर्षीय लखी खुद को मूल रूप से पश्चिम बंगाल की निवासी बताती है, लेकिन रोज़गार की तलाश में उनका परिवार पिछले कई सालों से गुवाहाटी में बसा हुआ है.

लखी लोगों के घरों में काम करती हैं, जबकि उनके पति बढ़ई का काम करते हैं. असम में अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की जारी धरपकड़ से लखी काफ़ी परेशान हैं.

बीबीसी के साथ बातचीत में उन्होंने बताया, ‘मैं अपने परिवार के साथ काफी समय से यहां काम कर रही हूं लेकिन पुलिस कई हिंदू बंगाली लोगों को बांग्लादेशी समझ कर पकड़ रही है और हमारे पास भी यहां का कोई सरकारी कागजात नहीं है. राशन कार्ड भी नहीं बना. अब फिर से असम में गडबड़ शुरू हो गई है."

भारत सरकार द्वारा हिंदू बांग्लादेशियों को भारतीय नागरिकता देने के बारे में लखी ने सुना है पर वे अपनी नागरिकता को लेकर चिंतित नहीं हैं. वे कहती हैं कि ग़रीब को सभी परेशान करते हैं.

गुवाहाटी में किराने की दूकान चलाने वाले विनोद मंडल का कहना है कि केंद्र सरकार का हिंदू बांग्लादेशियों को भारतीय नागरिकता देकर यहाँ बसाना ठीक नहीं होगा.

भावनाएँ

असम में बांग्लादेश के हिंदू और ग़ैर मुसलमान शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देने के मुद्दे पर ज़ोरदार विरोध शुरू हो गया है. असम जातीयतावादी युवा छात्र परिषद और विरोध करने वाले क़रीब 11 स्थानीय संगठनों ने शनिवार सुबह 5 बजे से 12 घंटे का असम बंद का ऐलान किया था, जिसका समूचे राज्य पर व्यापक असर दिखा.

गुवाहाटी समेत राज्य के क़रीब सभी ज़िलों में सरकारी कार्यालयों से लेकर बाजार-व्यापार पूरी तरह बंद रहे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए अल्पसंख्यक शरणार्थियों को मानवीय आधार पर, उनके वीज़ा की अवधि समाप्त होने के बाद भी भारत में रहने की अनुमति देने का फैसला किया है. गृह मंत्रालय ने हाल ही में पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम 1920 और विदेशी नागरिक अधिनियम 1946 के तहत इस संबंध में राजपत्र में दो अधिसूचनाएं जारी की हैं.

इन अधिसूचनाओं से ऐसे हिंदू, सिख, ईसाई, जैन, पारसी और बौद्ध समुदाय के लोगों को लाभ होगा, जो धार्मिक उत्पीड़न या धार्मिक उत्पीड़न के डर से भारत में आने को विवश हुए हैं.

लेकिन भारत सरकार के इस फैसले से असम के मूल निवासी बेहद नाराज़ हैं. गैर मुसलमान शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देने के खिलाफ यहाँ के कई स्थानीय संगठन पिछले कुछ दिनों से अपना विरोध जता रहे है.

विरोध

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असम में दो बार शासन कर चुकी क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी असम गण परिषद ने भी इस बंद को अपना समर्थन दिया है. पूर्व मुख्यमंत्री और असम आंदोलन में अखिल असम छात्र संघ (आसू) का नेतृत्व करने वाले प्रफुल्ल कुमार महंत का कहना है कि मोदी सरकार ने ऐसा फैसला कर ऐतिहासिक असम समझौते का अपमान किया है.

विदेशी नागरिकों को बाहर निकालने के लिए 1979 में असम आंदोलन की शुरूआत हुई थी. कई वर्षो तक चले इस आंदोलन में सैकड़ों लोग मारे गए थे और 1985 में अखिल असम छात्र संघ के साथ केंद्र सरकार ने असम समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.

असम समझौते के आधार पर वर्ष 1971 के 24 मार्च को विदेशी शिनाख्त का आधार वर्ष माना गया है. यानी इसके बाद आए विदेशी नागरिकों को यहां से बाहर निकालने के लिए समझौते में शर्त रखी गई.

असम समझौते की शर्तो के आधार पर राज्य में राष्ट्रीय नागरिक पंजी को अपडेट करने का काम चल रहा है.

इतने बड़े असम आंदोलन के बाद भी विदेशी नागरिकों का यह मुद्दा असम में ख़त्म नहीं हुआ. पिछले विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी कांग्रेस ने हिंदू बंगाली समुदाय से वादा किया था कि धार्मिक उत्पीड़न के डर से भारत में आने वाले विदेशियों को भारतीय नागरिकता दी जाएगी और अब फिर असम विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा सरकार ने ऐसी अधिसूचना जारी कर राजनीतिक फसाद खड़ा कर दिया है.

बयानबाज़ी

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असम के प्रभारी राज्यपाल पद्मनाभ बालकृष्ण आचार्य के असम समझौता पर यह कहने से विरोध और तेज़ हो गया कि कुछ भी पवित्र नहीं होता, जिसकी समक्षी नहीं की जा सकती.

राज्यपाल आचार्य के अनुसार भारतीय नागरिकता और मतदान के अधिकार प्राप्त करना हिंदुओं का जन्मसिद्ध अधिकार है.

असम में बंद का आह्वान करने वाले असम जातीयतावादी युवा छात्र परिषद, कृषक मुक्ति संग्राम समिति, असम आंदोलन संग्रामी मंच जैसे कई संगठनों की मांग है कि केंद्र सरकार अपना यह फैसला वापस ले, क्योंकि असम को विदेशियों का ‘डंपिंग ग्राउंड’ बनने नहीं दिया जाएगा.

भारत सरकार द्वारा हिंदू बांग्लादेशियों को भारतीय नागरिकता देने के फैसले का संवाददाता सम्मेलन बुलाकर स्वागत करने वाले असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने विरोध को देखते हुए अब अपना बयान बदल लिया है.

ताज़ा प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार को ऐसी अधिसूचना जारी करने से पहले राज्य सरकार के साथ विचार-विमर्श कर लेना चाहिए था.

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