वाजपेयी या मोदी, कौन लगता है आपको बेहतर कवि

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हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कविता संग्रह ‘साक्षीभाव’ प्रकाशित हुआ है.
इससे पहले बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भी कवि के तौर पर जाना जाता था. उनका कविता संग्रह ‘मेरी इक्यावन कविताएं’ के नाम से उपलब्ध है.
हम यहां पूर्व प्रधानमंत्री और मौजूदा प्रधानमंत्री की कविताओं के कुछ अंश लाए हैं.
पढ़ें और बताएं कवि के तौर पर आपको कौन ज़्यादा पसंद आता है.
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं के अंश

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1.गीत नया गाता हूं
टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अंतर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा,
काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं,
गीत नया गाता हूं.
2 दूध में दरार पड़ गई
खेतों में बारूदी गंध
टूट गए नानक के छंद
सतलज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है
वसंत से बहार झड़ गई
दूध में दरार पड़ गई

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3. क़दम मिला कर चलना होगा
कुछ कांटों से सज्जित जीवन
प्रखर प्यार से वंचित यौवन
नीरवता से मुखरित मधुबन
परहित अर्पित अपना तन-मन
जीवन को शत शत आहूति में
जलना होगा, गलना होगा.
क़दम मिला कर चलना होगा.
4. आओ फिर से दिया जलाएं
आओ फिर से दिया जलाएं
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएं.
आओ फिर से दिया जलाएं.
प्रधानमंत्री मोदी की कविताओं के अंश

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1. जीवन का अधिष्ठान
तो क्या जीवन ऐसे ही सापेक्षता के सहारे जिया जाएगा?
क्या जीवन की गति का कोई निरपेक्ष भाव हो ही नहीं सकता?
और यदि...जीवन की सापेक्षता की सीमाओं में ही बंधे रहना है,
तो फिर असंतोष की आग को रोकेगा कौन?
असंतोष की आग सापेक्ष चिंतन का ही तो
परिणाम है न ?
2. तेरी लिखी हुई कविता
...यों भी इस विशाल जगत में
मानव कितने लोगों को कब तक
मूर्ख बना सकेगा?
मानव कितने कितने वेश सजा सकेगा?
क्या यह नाट्य रूप जगत
इस जीवन का अंतिम साकार रूप बन सकेगा?
न, न, नहीं बन सकेगा.
3. नवजीवन की प्रेरणा
मां मैं जानता हूं, इस शरीर को अब
एक नए रंगमंच पर ले जाना है
नए रंगमंच के अनुरूप इसकी साज सज्जा करनी है,
मन, बुद्धि, हृदय-शरीर के
इन सब अंगों को अब इस नए रंगमंच के अनुरूप ढालना है.
मां, तेरे आशीष से यह भी होगा ही
वहां भी जीवंतता की अनुभूति करवानी ही है.
4.पलबिंदु की धारा
कभी कभी समय चुपके से चला जाता है
कभी कभी समय कलेजे पर पत्थर बन कर जम जाता है.
मानो समय एक बोझ लगता है
मुझे कहां पता था कि समय में भी एक शूल होता है
वह चुभता ही रहता है..चुभता ही रहता है
परंतु यह समय कभी सुगंध की एकाध लहर की तरह
एकदम तरल बन कैसे बह जाता है.
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