दाभोलकर-पंसारे के हत्यारों का अब तक पता नहीं

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- Author, देवीदास देशपांडे
- पदनाम, मुंबई से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
महाराष्ट्र को हिला देनेवाली दो हत्याओं के मामले अभी तक अनसुलझे हैं. अंधविश्वास विरोधी आंदोलन के नेता डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर की हत्या को 20 अगस्त को दो साल पूरे हो गए हैं, वहीं कम्युनिस्ट विचारक गोविंद पंसारे की हत्या को 16 अगस्त को छह महीने पूरे हो गए.
हाई कोर्ट के आदेश पर डॉक्टर दाभोलकर की हत्या की जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी.
गुरुवार को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने ट्वीट किया, "सीबीआई की माँग के अनुसार नरेंद्र दाभोलकर की हत्या की जाँच में मदद के लिए राज्य सरकार ने सात लोगों की एक टीम को सीबीआई की सहायता के लिए नियुक्त किया है."
डॉक्टर नरेन्द्र दाभोलकर का जन्म एक नवंबर 1945 को महाराष्ट्र के सातारा ज़िले में हुआ. एमबीबीएस की पढ़ाई के बाद उन्होंने ख़ुद को सामाजिक कार्यों में झोंक दिया.
1989 में उन्होंने महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की स्थापना की. अपने तीन दशक से भी अधिक के कार्यकाल में दाभोलकर ने ‘पोंगा पंडितों’ के खिलाफ़ कई पुस्तकें लिखीं.
आस्था का फ़ायदा

दाभोलकर ने तथाकथित चमत्कारों के पीछे छिपी हुई वैज्ञानिक सच्चाइयों को उन्होंने उजागर किया. दाभोलकर ‘नकली संतों-महंतों’ पर प्रहार करते थे.
कहते हैं कि एक बार स्वर्गीय विजय तेंदुलकर ने उनसे पूछा था, "क्या तुम्हें नहीं लगता कि श्रद्धा या आस्था रखना लोगों की मजबूरी है?"
तब डॉक्टर दाभोलकर ने कहा था, "मुझे मजबूरीवश आस्था रखनेवालों से कोई आपत्ति नहीं है. मेरी आपत्ति है दूसरों की मजबूरियों का ग़लत फ़ायदा उठाने वालों से."
उन्हीं के प्रयासों के कारण जुलाई 1995 में राज्य में जादू-टोना विरोधी क़ानून का मसौदा पारित हुआ था. उस समय राज्य में शिव सेना और भाजपा की सरकार थी. लेकिन राजनीतिक कारणों से ये कानून अमली जामा नहीं पहन सका था.
दाभोलकर की हत्या के बाद सरकार ने एक अध्यादेश लाकर ये कानून लागू किया.
गणेश विसर्जन के बाद होने वाला जल प्रदूषण, दीवाली में पटाख़ों से होने वाले ध्वनि प्रदूषण, अंतर्जातीय विवाह और जाति प्रथा आंदोलन में उन्होंने अहम भूमिका निभाई.

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'शिवाजी कोण होता' (शिवाजी कौन थे) जैसी पुस्तक के ज़रिए उन्होंने ‘हिंदुत्ववादी’ ताकतों’ पर आरोप लगाया था कि वो शिवाजी की छवि का दोहन करते हैं.
पुणे में 20 अगस्त 2013 की सुबह अज्ञात हमलावरों ने उन पर उस समय गोलियां चलाई जब वे टहलने निकले थे. घटनास्थल पर ही उनकी मौत हो गई थी.
राजनीति भी हुई
इस मामले पर राजनीति भी होती रही है. विधान मंडल के ताजा सत्र में जब यह मुद्दा उठा, तब मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा था कि पंसारे की हत्या के बाद एसआईटी बनाई गई थी जिसने जांच में काफी प्रगति की है. पर उसका खुलासा करने से जांच पर असर हो सकता है.
महाराष्ट्र विधान मंडल में पिछले महीने यह मुद्दा छाया रहा और पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर राज्य में असहनशीलता बढ़ने को लेकर चिंता जताई थी.
इस हत्या की जांच न्यायालय के अधीन हो, इस मांग को लेकर एक जनहित याचिका दाखिल की गई है पर मामला वहीं है.

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डॉक्टर दाभोलकर के बेटे डॉक्टर हमीद का आरोप है कि सरकार दाभोलकर और पंसारे की हत्याओं को लेकर गंभीर नहीं है.
उन्होंने कहा, "सीबीआई ने जांच के लिए छह अधिकारियों की मांग की थी जो सरकार ने अब तक पूरी नहीं की."
वो कहते हैं, "हमारे परिवार के सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ताओं का प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से दो बार मिला. लेकिन सरकार इसे लेकर गंभीर नहीं दिखती."
गोविंद पंसारे की बेटी स्मिता का भी यही विचार है. उन्होंने कहा, "जिस परिस्थिति में यह हत्या हुई, उसे ध्यान में रखते हुए जांच जल्द होनी चाहिए थी. पर सरकार कोई कदम नहीं उठाती. हत्यारों की खोज न होने का कारण सरकार का गैर-जिम्मेदार रवैया है."
कई आंदोलनों के प्रमुख
गोविंद पंसारे महाराष्ट्र में 50 सालों से प्रगतिशील आंदोलन के मुखिया थे. सांप्रदायिकता के विरोध में भी वे काफ़ी सक्रिय थे.
मृत्यु से कुछ दिन पहले उन्होंने नथूराम गोडसे का महिमामंडन किए जाने को लेकर कड़ा एतराज़ जताया था.
कोल्हापुर में चल रहे टोल विरोधी आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल थे.

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इस साल 16 फरवरी को गोविंद पंसारे और उनकी पत्नी पर कोल्हापुर में उस समय जानलेवा हमला हुआ था जब दोनों सुबह टहलने जा रहे थे. पांच दिनों बाद मुंबई में अस्पताल में उन्होंने दम तोड़ दिया.
सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश बीजी कोलसे पाटील के अनुसार, "पंसारे की हत्या की जांच बोगस पद्धति से जारी है. सत्ताधीश और पुलिस की इसमें मिली भगत है. पुलिस को लोगों के सामने सच्चाई लानी ही नहीं है."
कार्यकर्ता इस बात को लेकर दुखी हैं कि हत्याओं की जांच न होने के कारण अलग तरह की प्रवृत्ति बढ़ रही है.
महाराष्ट्र में पिछले छह महीने में भारत पाटणकर और अण्णा हजारे जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी धमकियां मिलने के मामले सामने आए हैं.
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