पीछे हटने पर क्यों मज़बूर है मोदी सरकार?

संसद

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली

संसद के मॉनसून सत्र के हंगामेदार होने के कारण कई बिल लटक गए हैं, जिनमें विवादास्पद भूमि अधिग्रहण बिल भी शामिल है.

इसमें कुछ बड़े संशोधन वापस लेने पर मोदी सरकार के रुख़ में नरमी के संकेत मिले हैं.

मोदी सरकार अब तक इसे बदलने के लिए बिलकुल तैयार नहीं थी.

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वेंकैया नायडू और नरेंद्र मोदी

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सरकार ने एक अध्यादेश के माध्यम से ज़मीन अधिग्रहण वाले 2013 के क़ानून में 15 संशोधनों का प्रस्ताव रखा था, जिन्हें बाद में एक विधेयक में शामिल किया गया था.

इनमें मुख्य नौ संशोधन हैं जिन पर कांग्रेस और दूसरी पार्टियों को आपत्ति है.

सूत्रों के मुताबिक़, इन संशोधनों में से छह पर संसद की संयुक्त समिति की बैठक में चर्चा की गई है और आम सहमति से इन्हें वापस लेने का फैसला किया गया है.

इन छह संशोधनों में दो काफी अहम हैं, सहमति खंड और सामाजिक प्रभाव आकलन.

यूपीए सरकार के ज़रिए लाए गए 2013 के क़ानून में पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप वाली परियोजनाओं के लिए ज़मीन के 70 फीसदी मालिकों की मंज़ूरी हासिल करना ज़रूरी है.

वहीं निजी परियोजनाओं के लिए 80 प्रतिशत की सहमति जरूरी है. मोदी सरकार ने नए बिल में इसे हटा दिया था.

सहयोगी भी विरोध में

वेंकैया नायडू और उद्धव ठाकरे

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इसके अलावा 2013 वाले क़ानून के तहत किसी भी प्रोजेक्ट की मंज़ूरी के लिए सामाजिक प्रभाव का आकलन कराना ज़रूरी है, लेकिन मोदी सरकार ने इस प्रावधान को भी बिल में शामिल नहीं किया था.

इस समिति में कुल 30 सांसद शामिल हैं जिनमे 11 बीजेपी के हैं.

लेकिन अकाली दल और शिव सेना जैसी इसकी कुछ सहयोगी पार्टियों ने भी 2013 के क़ानून में इन संशोधनों का कड़ा विरोध किया.

इस बिल का विरोध किसान भी कर रहे हैं. उन्होंने इसे किसान विरोधी और पूंजीपतियों का पक्ष लेने वाला बिल बताया.

विकास के नारे पर सत्ता में आई मोदी सरकार का तर्क ये है कि विकास के लिए कारखानों और फ़ैक्टरियों की ज़रूरत है जिसके लिए ज़मीनें हासिल करना अनिवार्य है.

'मेक इन इंडिया'

उद्योग

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ख़ुद प्रधानमंत्री की महत्त्वाकांक्षी योजना 'मेक इन इंडिया' के लिए ज़मीन की सख़्त ज़रूरत है और क्योंकि मौजूदा सरकार के अनुसार इनके अधिग्रहण में देरी होती है.

इसीलिए 2013 के क़ानून में बदलाव लाने की ज़रूरत पड़ी.

दरसल 2013 में जब नया क़ानून लाया गया था तो उस समय इस पर खूब चर्चा हुई थी और इसे पारित कराने में बीजेपी भी शामिल थी, लेकिन पार्टी के सत्ता में आने के बाद इसे इस क़ानून को बदलने की ज़रूरत महसूस हुई.

अब संकेत हैं कि केंद्रीय सरकार अध्यादेश वापस ले सकती है.

अब अगर बिल पारित हो भी जाए तो ये 2013 वाले क़ानून से बहुत अलग नहीं होगा.

किसान पुराने क़ानून से ख़ुश

भूमि अधिग्रहण के ख़िलाफ़ प्रदर्शन

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इमेज कैप्शन, भूमि अधिग्रहण के ख़िलाफ़ प्रदर्शन.

कई विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री को इसे अपनी शिकस्त नहीं मानना चाहिए. किसान 2013 वाले क़ानून से खुश हैं.

मोदी सरकार इसमें बदलाव न लाकर उनकी हमदर्दी हासिल कर सकती है.

विशेषज्ञ कहते हैं कि ज़मीनें हासिल करने से परियोजनाओं में देरी करीब 15 प्रतिशत मामलों में होती है.

असल देरी सरकारी मशीनरी की ग़लतियों से होती है.

सरकारी व्यवस्था आज भी अफ़सरशाही, काग़ज़ी कारवाही, रिश्वतखोरी और दूसरी गड़बड़ियों का शिकार है. देरी इन कारणों से अधिक होती है.

प्रधानमंत्री अगर इसमें सुधार लाने पर ज़ोर दें तो विकास का उनका मक़सद पूरा हो सकता है.

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