भारत-पाक वार्ता में ट्रैक टू का हश्र

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- Author, सुशांत सरीन
- पदनाम, रक्षा मामलों के जानकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
रूस के शहर उफ़ा में भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के बीच मुलाक़ात के बाद दोनों देशों के बीच एक बार फिर बातचीत का सिलसिला शुरू होने को है.
दोनों देश 60 सालों से बातचीत कर रहे हैं. कभी औपचारिक तौर पर तो कभी ट्रैक टू के ज़रिए.
<bold><link type="page"><caption> (जानिए क्या होता है भारत-पाक बातचीत में)</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2015/07/150722_indo_pak_talks_analysis_part_one_sr" platform="highweb"/></link></bold>
ट्रैक टू में पुराने अधिकारी, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता आपस में अपनी सरकारों के कहने पर एक दूसरे से मिलते हैं, फिर अपनी अपनी सरकारों को संबंध सुधारने के लिए सलाह देते हैं.
इस दूसरे रास्ते का हश्र तो औपचारिक सरकारों के बीच बातचीत से बुरा होता है.
इसमें होने वाली बातचीत दोनों पक्षों के अपने देश के सरकारी नज़रिए जैसा होता है और वो मुद्दों पर अपने अपने देशों की सरकार की लाइन को मान कर चलते हैं.
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आमतौर पर, भारतीय प्रतिनिधिमंडल के विचार पंचमेल किस्म के होते हैं. वो अलग अलग सुर में बात करते हैं जो साफ़ दिखता है.
जबकि दूसरी तरफ़ पाकिस्तानी, विचारों में विविधता के दिखावे के बावजूद अपने आधिकारिक नज़रिए पर अड़े रहते हैं.
ऐसा इसलिए है क्योंकि ट्रैक टू के से पहले, अधिकांश पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडलों को आधिकारिक लाइन के बारे में बताया जाता है. उसके बाद ये प्रतिनिधिमंडल अपने सरकार को भारतीयों के साथ हुई बातचीत का पूरा ब्योरा देते हैं.
दूसरी तरफ़, ऐसे मेल मिलाप वाले कार्यक्रमों से पहले भारतीय प्रतिनिधिमंडलों का सरकारी अधिकारियों से कोई संवाद नहीं होता है. न ही बातचीत के बाद भारतीय सरकारी अधिकारियों को इस बातचीत का कोई ब्योरा दिया जाता है.
असल में, इस तरह की बातचीत में जो बयानबाजी होती है उसका भारतीय अधिकारियों के लिए कोई मतलब नहीं होता है.
और अक्सर शिष्ट शब्दों वाली ये घोषणाएं या सुझाव रद्दी की टोकरी में डाल दिए जाते हैं.
घोषणाएं

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ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इन घोषणाओं में अधिकांश सुझाव दशकों तक जस के तस हैं.
मसलन- खुला वीज़ा, यात्रा आसान करना, एक दूसरे के देशों में अख़बारों खोलने की इजाज़त दूसरे देश को देना और अन्य घिसे पिटे सुझाव.
किसी भी मामले में, बातचीत में शामिल होने वाले अधिकांश लोग, खासकर रिटायर्ड अफ़सर, चुके हुए कारतूस होते हैं. जीवन भर लड़ने झगड़ने के बाद ये अचानक शांति और हालात सामान्य करने के पर जोर देने लगते हैं.

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गतिरोध को तोड़ने के लिए कोई नया हल निकाल लेने के बाद भी ये लोग किसी भी चीज को प्रभावित करने या कुछ भी बदलने की हालत में नहीं होते हैं.
आखिरकार, दूसरा रास्ता भी सैर सपाटे से ज़्यादा कुछ नहीं होता है.
इन दोनों रास्तों का हिसाब किताब देखें तो इसमें कोई ताज्जुब नहीं लगता है कि संबंधों के सामान्य होने में कोई प्रगति नहीं हुई है.
और उफ़ा सम्मेलन में बातचीत की प्रक्रिया के शुरू होने के बावजूद इसमें कोई बदलाव होने की कम ही संभावना है.
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