पानी को तरसती ज़मीन में डूब गया सब

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- Author, अंकुर जैन
- पदनाम, अमरेली से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
उजड़े हुए खेत, बर्बाद गांव और लुटी-पिटी जिंदगियां. बाढ़ के क़हर ने गुजरात के अमरेली ज़िले का परिदृश्य ही बदल दिया है.
आमतौर पर अमरेली को पीने और खेती के पानी की सख़्त किल्लत वाले क्षेत्र के रूप में जाना जाता है लेकिन सौराष्ट्र में भारी बारिश के बाद से यहां की सूरत बदल गई है.
करीब 20 मीटर ऊंची लहरों वाली विनाशकारी बाढ़ ने एक घंटे से भी कम वक़्त में अमरेली के 600 गांवों को जलमग्न कर दिया.
अब तक 70 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है लेकिन ग्रामीणों का मानना है कि कई लोग और जानवर बाढ़ के बाद खेतों में जमा पांच फ़ीट ऊंची मिट्टी की गाद में दबे हुए हैं.
'पहाड़ जितनी ऊंची लहरें'

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शेत्रुंजी नदी पर बने खोडियार बांध से निकले पानी ने पुलों, रेलवे ट्रैकों और सैकड़ों घरों को बहा दिया.
भारी बचाव और राहत अभियान में गुजरात सरकार, वायु सेना, राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ़) ने 24 जून को निचले इलाक़ों से लोगों को निकालना शुरू किया.
तब तक 400 से ज़्यादा गांव सड़क से पूरी तरह कट चुके थे क्योंकि बाढ़ का पानी सड़कों को निगल चुका था. खंभे बह जाने के कारण बिजली भी नहीं थी.
उस बदनसीब दिन भूपतभाई अमरेली में रेलवे पुल, जिसका ज़्यादातर हिस्सा बाढ़ के बाद गायब हो गया था, से लगे अपने खेत में थे. सात घंटे तक उस पुल पर फंसे रहने के बाद उन्हें वायुसेना के हैलिकॉप्टर ने निकाला.
भूपत कहते हैं, "पहाड़ जितनी ऊंची लहरें मेरी ओर आईं. मैं यहां 60 साल से रह रहा हूं लेकिन मैंने कभी नदी को इतने गुस्से में नहीं देखा. सरकार ने खोडियार बांध के सातों गेट 800 गांवों के लोगों को बिना बताए खोल दिए."
नान्जी की तरह अमरेली के सनोसारा गांव के जीतूभाई दादानी भी सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाते हैं.

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वह कहते हैं, "जब पानी हमारी तरफ़ बढ़ रहा था तो आज तक की जिंदगी में सुनी सबसे भयानक आवाज़ थी. हम सब उसमें फंस गए क्योंकि हमारे गांव में बारिश बहुत ज़्यादा नहीं हुई थी और हम लोगों के लिए यह खेतों में एक सामान्य दिन था."
"सरकार ने बिना हमें कोई सूचना दिए बांध से पानी छोड़ दिया जिसके बाद 100 में 80 परिवारों के पास न तो घर रहा और न ही सामान."
'मुआवज़ा 60 रुपये'
खोडियार बांध के गेट जल्दबाज़ी में खोले जाने की बात स्वीकार करते हुए राज्य प्रशासन इसे वक़्त की ज़रूरत बताता है.
अमरेली के ज़िला कलेक्टर एच आर सुथार कहते हैं, "हमें भारी तबाही को रोकना था. बारिश बहुत ज़्यादा हुई थी. संचार माध्यम और बिजली पहले ही प्रभावित हो चुकी थी इसलिए हमने न्यूज़ चैनल जैसे माध्यमों से निचले इलाक़ों के लोगों तक सूचना पहुंचाने की कोशिश की."

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उनका कहना था कि उनके पास सीमित विकल्प थे. राज्य सरकार ने पीड़ितों के परिवार के लिए चार लाख रुपये के मुआवज़े की घोषणा की है और अन्य नुक़सानों का सर्वे करवा रही है.
हालांकि यह अपना घर गंवाने वाले लोगों को 10 दिन तक प्रति व्यक्ति 60 रुपये का मुआवज़ा देती रही.
यह पूछे जाने पर कि क्या यह मुआवज़ा पर्याप्त है और इसका तर्क किया है, सुथार कहते हैं, "यह मानकों के अनुरूप ही है और इसके तर्क का उन्हें पता नहीं है."
उन्होंने कहा कि अमरेली से गुज़रने वाली 80 फ़ीसदी रेलवे पटरियां क्षतिग्रस्त हो गई हैं और करीब 1.5 लाख हैक्टेयर में फ़सल बर्बाद हो गई है.
'पांच साल फ़सल नहीं'
सौराष्ट्र किसानों की ख़ुदकुशी की राजधानी रहा है. सरकारी आंकड़ों के अऩुसार गुजरात में ख़ुदकुशी करने वाले 89 किसानों में से 67 सौराष्ट्र के थे. सालों तक सौराष्ट्र राज्य सरकार से अपने हिस्से का पानी पाने के लिए जूझता रहा.

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अमरेली के बहुत से गांवों में लोग अब भी पीने का पानी लाने के लए चार से पांच किलोमीटर चलते हैं. अमरेली क़स्बे में पीने का पानी 15 दिन में एक बार उपलब्ध करवाया जाता है.
अमरेली के पर्यावरण और वन्यजीवन कार्यकर्ता राजन जोशी कहते हैं, "अमरेली के पास सीमित मात्रा में पानी है. सौराष्ट्र के बांध अक्सर मानसून के ख़त्म होने के बाद भी भर नहीं पाते. लेकिन इस समय वह लबालब भरे हुए हैं और किनारे तोड़ रहे हैं."
"यह ऐसा बदलाव है जिसका विश्लेषण आसान नहीं. हालांकि सरकार अगर लोगों को अपने घर और खेत छोड़ने की सलाह ठीक से देती तो नुक़सान कम किया जा सकता था."
वह कहते हैं कि अमरेली और सावरकुन्डला क्षेत्रों में मिट्टी की इतनी गाद जमा हो गई है कि खेतों में अगले पांच साल तक फ़सल नहीं बोई जा सकती.

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बाबापुर गांव, जहां बाढ़ का क़हर सबसे ज़्यादा टूटा है, के कृषि मज़दूर जेवाभाई कहते हैं, "यहां के ज़्यादातर किसानों ने कपास की फ़सल के लिए भारी ब्याज पर कर्ज़ लिया था. लेकिन बाढ़ ने हमारा सब कुछ छीन लिया- जानवरों से लेकर घर का सामान तक. अब हमारी सारी उम्मीदें सरकार से ही हैं क्योंकि हमारे पास अब कुछ नहीं बचा है."
(यहां सभी तस्वीरें उस वक्त की हैं जब बाढ़ आई थी.)
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