मुक्ति बाहिनी, भिंडरावाले: नॉन-स्टेट एक्टर्स का सच

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- Author, सुशांत सरीन
- पदनाम, रक्षा मामलों के जानकार
कुछ चीज़ें किसी भी देश के रणनीतिकारों को बहुत ललचाती हैं. जैसे दुश्मन देश के ख़िलाफ़ युद्ध में भाड़े के सैनिकों का इस्तेमाल. या उसके यहाँ चरमपंथियों को पैसा देना और दूसरे तरीकों से भड़काना. तीसरा अपने देश में स्थानीय विद्रोह का मुक़ाबला करने के लिए हथियारबंद लड़ाकों का इस्तेमाल करना.
दुनिया के दो सबसे महान राजनीतिक चिंतक सामरिक रणनीतिकार -भारत के चाणक्य और इटली के मैकेवली ऐसे नॉन-स्टेट एक्टर्स को राज्य-नीति में प्रयोग करने के पक्ष में नहीं थे.
हालांकि चाणक्य चुनिंदा उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ऐसे नॉन-स्टेट एक्टर्स के पूरी तरह से ख़िलाफ़ भी नहीं थे लेकिन मैकेवली उन्हें पूरी तरह से बेकार ही मानते थे.
ख़ुद भारत के पिछले पाँच दशकों का अनुभव बताता है कि चाणक्य और मैकेवली दोनों ही सही थे.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
मुक्ति बाहिनी

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1970 के दशक की शुरुआत में भारत ने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में मुक्ति बाहिनी को समर्थन दिया.
पाकिस्तान के पंजाबी वर्चस्व वाले शासन के ख़िलाफ़ पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों के विरोध से भारत को पाकिस्तान को सबक सीखाने का सुनहरा मौक़ा मिल गया.
पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली अलगाववादियों को समर्थन देना एक तरह से भारत के पूर्वोत्तर में बाग़ियों को पाकिस्तान के मिलने वाले समर्थन का जवाब था.
भारत में शरणार्थियों की भारी आमद और पूर्वी पाकिस्तान में मानवाधिकारों के व्यापक हनन से भारत को हस्तक्षेप करने का वैध कारण भी मिल गया.
मुक्ति बाहिनी ने पाकिस्तान को भारी नुकसान पहुँचाया था फिर भी अगर भारत सैन्य हस्तक्षेप न करता तो शायद बांग्लादेश का जन्म नहीं हुआ होता.
एकदम साफ़ सैन्य-राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति का ये एक बेहतरीन उदाहरण माना जाता है.
जरनैल सिंह भिंडरावाले

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1980 के दशक में भारत ने नॉन-स्टेट एक्टर्स का दो बार प्रयोग किया. एक बार पंजाब में और दूसरी बार श्रीलंका में. दोनों ही मौक़ों पर उसे भयानक ख़ामियाजा उठाना पड़ा.
पंजाब में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को मुश्किल में डालने के लिए सिख चरमपंथ को बढ़ावा दिया. लेकिन स्थिति को काबू से बाहर जाने में समय नहीं लगा.
जल्द ही पाकिस्तान इस खेल में शामिल हो गया. वो सिख चरमपंथियों को पैसा, हथियार, प्रशिक्षण और प्रश्रय देने लगा.
सिख चरमपंथी धीरे-धीरे इतने मज़बूत हो गए कि एक बार ऐसा भी लगने लगा कि वो भारत को हरा भी सकते हैं. इंदिरा गांधी ने आखिरकार 1984 में जनरैल सिंह भिंडरावाले के नेतृत्व वाले खालिस्तानी नेताओं को ख़त्म करने के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू किया.
ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद और कुछ हद इसकी वजह से भी पंजाब अगले एक दशक तक चरमपंथ के चपेट में रहा. उसके बाद ही इसपर नियंत्रण पाया गया.
इस दौरान सिख चरमपंथियों ने पूरे भारत में बम धमाके और हत्याएं कीं. यहाँ तक कि इंदिरा गांधी की हत्या उनके सिख अंगरक्षकों ने कर दी.
लिबरेशन टाइगर ऑफ़ तमिल ईलम

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उसी दशक में भारत सरकार ने श्रीलंका में तमिल चरमपंथ को समर्थन देना शुरू किया था. तमिलों की शिकायत एक हद तक वाजिब थी. सिंहली बहुसंख्यकों ने तमिलों को हाशिए पर पहुँचा दिया था.
जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में उनके साथ होने वाले भेदभाव संस्थानिक रूप ले चुके थे.
भारत के श्रीलंकाई तमिलों को समर्थन देने के कई अलग-अलग कारण थे. एक था जैसे भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और श्रीलंकाई राष्ट्रपति जयवर्धने के बीच व्यक्तित्व का टकराव. दूसरा तमिलनाडु राज्य की अंदरूनी राजनीति.
तीसरा, श्रीलंका को 'सबक सिखाने' की मंशा क्योंकि भारत को लगता था कि श्रीलंका ने पिछले कुछ समय में ऐसे कुछ काम किए हैं जो उसके हितों के ख़िलाफ़ थे.

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श्रीलंका में ख़ूनी तमिल विद्रोह 1983 में शुरू हुआ और यह क़रीब तीस साल तक चला. उसके बाद ही तमिल विद्रोही संगठन एलटीटीई को निर्णायक रूप से ख़त्म किया जा सका.
लेकिन 1991 में भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी की एलटीटीआई द्वारा की गई हत्या के बाद से भारत इससे दूर हो गया. लेकिन ऐसा नहीं है कि भारत ने श्रीलंका में हस्तक्षेप की बस यही एक क़ीमत चुकाई.
1987 में भारत और श्रीलंका की सरकार के बीच हुए एक समझौते के बाद भारत ने वहाँ अपनी शांति सेना भेजी थी. लेकिन शांति बहाली की कोशिशें कुछ ही दिनों में थम गईं.
क़रीब 1500 भारतीय सैनिकों के मारे जाने और कई हज़ार सैनिकों के घायल हो जाने के बाद आईपीकेएफ़ को वापस बुला लिया गया.
इख़्वानः

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1990 के दशक में भारतीय सुरक्षा बलों ने उन कश्मीरी लड़ाकों का प्रयोग शुरू किया जिनका अपने पुराने साथियों से मोहभंग हो चुका था.
इख़्वानी लड़ाके भाड़े के सिपाही थे जो पहले कश्मीरी अलगाववादी रहे थे. उनके नेता थे कुका परे. अलगावादियों से जूझ रहे भारतीय सुरक्षा बलों के लिए इख़्वान लड़ाके किसी वरदान की तरह थे.
इख़्वान लड़ाकों का सफल प्रयोग पाकिस्तान समर्थित चरमपंथी संगठन हिज़्बुल मुजाहिद्दीन की कमर तोड़ने में किया गया. लेकिन इख़्वान का केवल सकारात्मक असर ही नहीं हुआ.
ख़ुद इख़्वान कश्मीर में दहशत का पर्याय बन गया. उनपर आरोप लगे कि वो अलगाववादियों से लड़ने के नाम पर अपनी निजी दुश्मनियों का बदला ले रहे हैं, ज़मीन-जायदाद के क़ब्ज़े के लिए आपराधिक गिरोह चला रहे हैं, जबरन पैसे वसूल रहे हैं और ये सब कुछ वो क़ानूनी छत्रछाया में कर रहे हैं.

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कश्मीर में 1996 में हुए चुनाव के बाद इख़्वानियों की उपयोगिता नहीं रही. सरकार बन जाने के बाद सुरक्षा बलों ने इख़्वानियों को समर्थन देना बंद कर दिया और धीरे-धीरे वो ख़त्म हो गए.
कुछ को चरमपंथियों ने बदले की कार्रवाई में मार डाला. कुछ ख़ुद ब ख़ुद लापता हो गए. भाड़े के सैनिकों का एक निश्चित उद्देश्य से प्रयोग करने और उसके बाद उनसे हाथ खींच लेने का ये एक अच्छा उदाहरण था.
ऐसा ही एक दूसरा सफल प्रयोग था असम में उल्फ़ा के ख़िलाफ़ सुल्फ़ा का प्रयोग. सुल्फ़ा का भी कुछ समय के लिए एक ख़ास मकसद से प्रयोग किया गया और उसके बाद उसे ख़त्म हो जाने दिया गया.
सलवा जुडुमः

बीसवीं सदी के पहले दशक में सुरक्षा बलों ने छत्तीसगढ़ में गुरिल्ला माओवादियों का सामना करने के लिए सलवा जुडुम नामक लड़ाका संगठन खड़ा किया.
इसकी पहल एक राजनेता महेंद्र कर्मा ने की लेकिन राज्य सरकार ने इसका समर्थन किया.
सलवा जुडुम से कुछ लाभ तो हुए लेकिन इसके ख़िलाफ़ दबंगई, निजी बदले लेने और कथित माओवाद समर्थकों पर तमाम तरह की क्रूरताओं के आरोप लगे.
हालांकि 2000 के दशक तक हालात पहले की तुलना में काफ़ी बदल चुके थे. दिन-रात चलने वाले टीवी चैनलों के साथ ही मीडिया में क्रांतिकारी बदलाव आ चुका था.
पहले के दशकों में जो चीज़ें की जा सकती थीं अब वो संभव नहीं थीं. विभिन्न नागरिक संगठनों की सक्रियता और मुखरता इस दौरान काफ़ी बढ़ चुकी थी.

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न्यायपालिका भी क़ानून की अनदेखी करके उठाए गए किसी तरह क़दम के ख़िलाफ़ सक्रिय हस्तक्षेप करने लगी थी.
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने सलवा जुडुम को ग़ैर-क़ानूनी क़रार देते हुए सरकार को इसे भंग करने का आदेश दिया.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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