क्यों हैं एक करोड़ से ज्यादा घर खाली?

इमेज स्रोत, AP
- Author, विवेक कॉल
- पदनाम, आर्थिक विशेषज्ञ
अगर आप भारत की राजधानी दिल्ली के इर्द-गिर्द के इलाके में घूमेंगे तो आपको मीलों तक बने हुए ऐसे घर मिलेंगे जिनमें कोई नहीं रहता.
प्रॉपर्टी कंसलटेंसी कंपनी 'सीबीआरइ साउथ एशिया' के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर अंशुमान मैगज़ीन ने हाल ही में एक लेख में कहा है, "करीब एक करोड़ 20 लाख निर्मित घर शहरी भारत में खाली पड़े हुए हैं. "
कुछ इसी तरह की बात अखिलेश तिलोतिया ने अपनी किताब 'द मेकिंग ऑफ़ इंडिया गेमचेंजींग ट्रांजिशन' में कहते हैं कि भारत में परिवारों की संख्या से ज्यादा घरों की संख्या है.
वे लिखते हैं कि भारत में परिवारों की संख्या 2001 से 2011 के बीच 18 करोड़ 70 लाख से बढ़कर 24 करोड़ 70 लाख हो गई यानी कि 6 करोड़ बढ़ी है.
लेकिन इसी अवधी में मकानों की संख्या 25 करोड़ से 33 करोड़ 10 लाख हो गई यानी कि आठ करोड़ दस लाख बढ़ी.
फिर मकान की किल्लत क्यों?
इसके बावजूद शहरी भारत में मकान की किल्लत बनी हुई है.
नए इकॉनॉमिक सर्वे में 2 करोड़ मकानों की किल्लत बताई गई है.
तो सवाल उठता है कि आख़िर यह हो क्या रहा है?

इमेज स्रोत, Reuters
इनमें से कई घरों के निर्माण में ऐसे लोगों ने निवेश किया है जिनके पास निवेश के लिए 'अतिरिक्त' पैसा है.
किसी को नहीं पता कि इसमें काला धन कितना लगाया है जिसपर टैक्स नहीं चुकाया गया है.
इसलिए ये मकान बिक तो गए हैं लेकिन इनमें कोई रह नहीं रहा.
दूसरी वजह है कि ज्यादातर बिल्डर भारत की अमीर आबादी को ध्यान में रखते हुए क़ीमत तय करते हैं.
इसकी वजह से ये खासी आबादी की पहुंच से दूर हैं.
नए इकॉनॉमिक सर्वे के मुताबिक़ "मकान की किल्लत का सबसे ज्यादा असर कम आय वर्ग के लोगों पर पड़ता है और इसकी तदाद 95.6 फ़ीसदी है."
अच्छे संकेत नहीं

इमेज स्रोत, AP
तितोलिया के मुताबिक़ मकान के लिए पांच लाख से 10 लाख तक देने वाले लोगों की बिल्डरों के पास बड़े पैमाने पर कमी है.
रियल एस्टेट की कंपनी लियासेस फोरस की नई रिपोर्ट में बताया गया है कि मुंबई के महानगरीय इलाके में एक मकान की औसत क़ीमत एक करोड़ तीस लाख है.
बंगलौर और दिल्ली में एक मकान की औसत क़ीमत 86 लाख और 74 लाख है.
इसलिए 2011 की जनगणना के अनुसार एक करोड़ 37 लाख परिवार झुग्गी झोपड़ी में रहते हैं और इस आकड़ें पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए.
इन झुग्गी झोपड़ियों में रहने वालों की संख्या साढे छह करोड़ है और यह शहरी आबादी का 17.4 फ़ीसदी है.
इसका मतलब है कि भारत में झुग्गीयों की संख्या बढ़ती जा रही है और यह कोई अच्छे संकेत नहीं.
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> आप यहां</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> क्लिक कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>












