पाक में गड़बड़ के लिए भारत पर 'हमले जारी'

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- Author, अशोक कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
पाकिस्तान के उर्दू अख़बार कराची में 13 मई के हमले को लेकर भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ पर लगातार सवाल उठा रहे हैं.
'जंग' लिखता है कि सिंध प्रांत के मुख्यमंत्री कायम अली शाह ने कहा है कि उनकी ख़ुफ़िया एजेंसियों को हमले में रॉ के शामिल होने के सबूत मिल गए हैं.
अख़बार लिखता है कि हमले के बाद घटनास्थल से मिले कुछ पर्चों से इस वारदात के पीछे पहले इस्लामिक स्टेट का हाथ होने के संकेत मिल रहे थे लेकिन बाद में जांचकर्ताओं ने इससे इनकार कर दिया.
अख़बार के मुताबिक सिंध के मुख्यमंत्री के दावे पर किसी को हैरानी नहीं है क्योंकि रॉ हमेशा से पाकिस्तान में अशांति फैलाने की कोशिश में रहती है.
‘सबूत सौंपे’

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'एक्सप्रेस' लिखता है कि पाकिस्तान में हालिया चरमपंथी घटनाओं में रॉ की मदद के सबूत पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के विशेष अमरीकी दूत को सौंप दिए हैं.
अख़बार ने जहां भारत की मोदी सरकार को किसी ग़लतफहमी में न रहने की चेतावनी दी, वहीं अफ़ग़ानिस्तान से भी कहा है कि वह भारत को अपनी सरज़मीन का इस्तेमाल न करने दे.
लेकिन इस बारे में 'रोज़नामा दुनिया' का कहना है कि पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसियों को भी अपनी कारगुजारियों का जायज़ा लेना चाहिए कि उनके रहते दुश्मन एजेंसियां देश में हस्तक्षेप कर रही हैं और उन्हें पता ही नहीं है.
अख़बार की राय है कि पाकिस्तान सरकार विदेश मंत्रालय में सारे देशों के राजदूतों की बैठक बुलाकर उन्हें रॉ की कारस्तानियों के सबूत दें ताकि वो अपनी-अपनी सरकारों को सच से अवगत करा सकें.
अख़बार के शब्दों में, "हम कब तक भारत से रिश्तों की क़ीमत पर अपनी संप्रभुता और शांति-व्यवस्था को ख़तरे में डालते रहेंगे."

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उधर 'रोज़नामा मशरिक' ने पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसियों के बीच सहयोग के समझौते पर पूर्व अफ़ग़ान राष्ट्रपति हामिद करजई की आपत्तियों पर लिखा है कि वह पाक-अफ़ग़ान रिश्तों में बेहतरी देख ही नहीं सकते हैं.
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की वापसी
दूसरी तरफ़ ज़िम्बाब्वे क्रिकेट टीम के पाकिस्तानी दौरे को सभी अख़बारों ने पाकिस्तान में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की वापस बताते हुए ख़ुशी जताई है.
'नवाए वक़्त' लिखता है कि 2009 में श्रीलंका की क्रिकेट टीम पर हमले के बाद किसी देश की क्रिकेट टीम पाकिस्तान आई है.
अख़बार के मुताबिक़ अब ज़िम्बाब्वे का यह दौरा राजनयिक स्तर पर पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड की एक बड़ी कामयाबी है, लेकिन असली मुबारकबाद के हक़दार तो ज़िम्बाब्वे के खिलाड़ी हैं जिन्होंने पाकिस्तान आने का साहसिक फ़ैसला किया.

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'जसारत' लिखता है कि पाकिस्तान में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की बहाली स्वागतयोग्य है और उम्मीद है कि ज़िम्बाब्वे के बाद और टीमें भी पाकिस्तान आएंगी.
‘जात बिरादरी का चश्मा’
रुख़ भारत का करें तो ‘हिंदोस्तान एक्सप्रेस’ ने सम्राट अशोक को लेकर छिड़े विवाद पर लिखा है कि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को देखें तो अशोक को किसी एक बिरादरी में बांधने की कोशिश अजीबो गरीब लगती है.
अख़बार के मुताबिक़ अशोक को इतिहासकर इसलिए महान मानते हैं क्योंकि उस वक़्त कल्याणकारी राज्य वजूद में नहीं था और अशोक ने जनता की भलाई के लिए बहुत से काम किए और जनता का दिल जीता.
“ऐसे में बेहतर यही होगा कि राजनीतिक दल सम्राट अशोक को जात बिरादरी के चश्मे से न देखें.”

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'मुंसिफ' ने मुंबई में मुस्लिम होने के कारण एक युवक को नौकरी पर न रखे जाने के मामले पर संपादकीय लिखा. अख़बार कहता है कि बंटवारे के बाद से ही मुसलमानों के साथ भेदभाव हो रहा है और सरकारी विभागों में मुसलमानों का क्या अनुपात है, ये बात भी सब जानते हैं.
लंबे से संपादकीय लेख के आख़िर में अख़बार कहता है कि धर्म के आधार पर नौकरी से इनकार करने वाली कंपनी के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई हो, ताकि आगे ऐसा न हो सके.
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