भारतीय संविधान में राज्यसभा की ख़ास जगह क्यों?

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- Author, प्रमोद जोशी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
राज्यसभा में विपक्ष से हलकान मोदी सरकार के वित्तमंत्री अरुण जेटली ने एक साक्षात्कार में कहा कि जब एक चुने हुए सदन ने विधेयक पास कर दिए तो राज्यसभा क्यों अड़ंगे लगा रही है?
जेटली के स्वर से लगभग ऐसा लगता है कि राज्यसभा की हैसियत क्या है?
असल में भारत में दूसरे सदन की उपयोगिता को लेकर संविधान सभा में काफी बहस हुई थी.
आखिरकार दो सदन वाली विधायिका का फैसला इसलिए किया गया क्योंकि इतने बड़े और विविधता वाले देश के लिए संघीय प्रणाली में ऐसा सदन जरूरी था.
धारणा यह भी थी कि सीधे चुनाव के आधार पर बनी एकल सभा देश के सामने आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए नाकाफी होगी.
क्या राज्यसभा चुनी हुई नहीं?

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ऐसा नहीं है. बस इसके चुनाव का तरीका लोकसभा से पूरी तरह अलग है.
इसका चुनाव राज्यों की विधान सभाओं के सदस्य करते हैं. चुनाव के अलावा राष्ट्रपति द्वारा सभा के लिए 12 सदस्यों के नामांकन की भी व्यवस्था की गई है.
असल में राज्यसभा, संतुलन बनाने वाला या विधेयकों पर फिर से ग़ौर करने वाला पुनरीक्षण सदन है.
उसका काम है लोकसभा से पास हुए प्रस्तावों की समीक्षा करना.
सरकार मे विशेषज्ञों की कमी भी यह पूरी करता है, क्योंकि साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा से जुड़े कम से कम 12 विशेषज्ञ इसमें मनोनीत होते ही हैं.
जवाहर लाल नेहरू ने सदन की ज़रूरत को बताते हुए लिखा है, "निचली सदन से जल्दबाजी में पास हुए विधेयकों की तेजी, उच्च सदन की ठंडी समझदारी से दुरुस्त हो जाएगी."
इसकी सदस्यता के लिए न्यूनतम आयु तीस साल है, जबकि लोकसभा के लिए पच्चीस साल.
राज्यसभा की गरिमा के लिए देश के उपराष्ट्रपति को इसका सभापति बनाया गया है.
सरकार पर लगाम

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राज्यसभा सरकार को बना या गिरा नहीं सकती. फिर भी वह सरकार पर लगाम रख सकती है.
यह काम खासतौर से उस समय बहुत महत्वपूर्ण होता है जब सरकार को राज्यसभा में बहुमत हासिल न हो.
दोनों सभाओं के बीच गतिरोध को दूर करने के लिए संविधान में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाने की व्यवस्था है.
वित्तीय मामलों में लोकसभा को राज्यसभा की तुलना में प्रमुखता हासिल है.

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संविधान संशोधन विधेयक को पास करने के लिए दोनों सदनों में अलग-अलग बहुमत ज़रूरी है.
इस मामले में दोनों सदनों के बीच गतिरोध को दूर करने की कोई व्यवस्था नहीं है.
मोटे तौर पर मंत्रिपरिषद् की सामूहिक ज़िम्मेदारी और कुछ ऐसे वित्तीय मामलों को छोड़कर जो सिर्फ लोकसभा के क्षेत्राधिकार में आते हैं, दोनों सदनों को समान शक्तियां प्राप्त हैं.
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