विवादों के जंगल में जगन्नाथ का पेड़

जगन्नाथ का पेड़

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    • Author, संदीप साहू
    • पदनाम, भुवनेश्वर से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

ओडिशा में 'नवकलेवर' का बुखार छाया हुआ है. मुख्यधारा की मीडिया हो या सोशल मीडिया, घर हो या सड़क, हर जगह केवल 'नवकलेवर' के ही चर्चे हैं.

पिछले डेढ़ महीनों से ऐसा लगता है कि इस राज्य में इसके अलावा और कुछ हो नहीं रहा है.

दरअसल नवकलेवर एक धार्मिक महोत्सव है. इसमें हिन्दू भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और उनकी छोटी बहन सुभद्रा नया रूप धारण करते हैं.

वो नया रूप लेते हैं इसलिए नई मूर्तियां बनाईं जाती हैं. इस महोत्सव को हर 12वें या 19वें साल में मनाया जाता है.

मान्यता है कि अन्य हिन्दू देवी देवताओं से अलग जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मनुष्यों की तरह मृत्यु होती है और फिर पुनर्जन्म होता है.

विवाद

जगन्नाथ पूजा

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भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और उनकी छोटी बहन सुभद्रा की मूर्तियां यूं तो नीम की लड़की से बनती हैं.

लेकिन इन तीनों की मूर्ति बनाने के लिए काफी सावधानी बरती जाती है. किसी भी ऐरे-गैरे पेड़ को यूं ही चार बढ़ई मिलकर नहीं काट लेते.

चुने गए पेड़ की लकड़ी को 'दारू' कहा जाता है. इस काम में कई पंडित या दैतापति लगते हैं.

शास्त्रों के अनुसार, पेड़ के लिए सबसे पहले मुख्य पंडित को सपना आता है. उसके बाद दसियों पंडित उस पेड़ की तलाश में निकलते हैं.

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मूर्ति के लिए नीम के पेड़ में कुछ लक्षणों का होना ज़रूरी है. इस पेड़ को काटने के पहले सारे पंडित दो दिन तक अन्न जल नहीं लेते.

लेकिन सोशल मीडिया और 24 घंटे लाइव टीवी के जमाने में 'नवकलेवर' भी नहीं बच पाया.

टीवी कैमरों को पेड़ पर उल्लू का घोंसला और उसमें बच्चे दिख गए. पेड़ ख़ारिज होता, इसके पहले पंडित चिल्लाए 'उल्लू तो लक्ष्मी का वाहन है.'

'पेड़ फ़िक्सिंग'

पेड़ पर कीलें ठुंकी थीं. वो भी नज़रअंदाज़ हुआ. इस शोरगुल के बीच एक पंडित बोल पड़ा कि दारु के पेड़ को लेकर 'सपना नहीं निर्देश आया था.'

मुख्य पंडित ने उन्हें झूठा करार दे दिया. पंडितों के चुपके-चुपके खाने पीने की बात भी आई गई हो गई.

ये हंगामे छिड़े ही हुए थे कि 'पेड़ फ़िक्सिंग' की बात आ गई. अब पेड़ जिस इलाक़े में मिलता है, उस इलाके की शान तो बढ़ ही जाती है.

पंडित लाख अपने सपने की बात करते रहे, लेकिन आखिर में पेड़ मिला वहाँ जहाँ 15 दिन पहले मीडिया ने कहा था कि मिलेगा.

इन तमाम झगड़ों और विवादों से जिनको फ़र्क पड़ता हो उनको पड़ता हो, कम से कम उनमें भगवान के भक्त तो नहीं हैं.

जगन्नाथ पूजा

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लाखों का चंदा चढ़ाया जा रहा है, दिव्य पेड़ को देख कर लोग अपने आपको धन्य मान रहे हैं.

और पंडित स्वीकार कर रहे हैं कि उनमें से हर किसी के हिस्से कम से कम पांच लाख तो आएंगे ही.

आखिर भगवान 'सेवा के बदले मेवा' तो देते ही ही हैं.

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