'लड़कियों से कपड़े तक धुलवाते हैं कोच'

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- Author, नौरिस प्रीतम
- पदनाम, खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
केरल में स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (साई) के हॉस्टल की शर्मनाक घटना के बाद देश की महिला खिलाड़ियों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर सवाल खड़ा हो गया है.
हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब महिला खिलाड़ियों ने यौन उत्पीड़न या अन्य शारीरिक उत्पीड़न का आरोप लगाया हो, लेकिन क्योंकि इस हादसे में चार लड़कियों ने कथित रूप से ज़हरीला फल खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की, जिसमें एक की जान भी चली गई, इसलिए यह घटना बहुत ही शर्मनाक और चौंकाने वाली है.
केरल की इस घटना की पीछे तरह तरह की अटकलें चल रही हैं.
उत्पीड़न

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स्पोर्ट्स ऑथोरिटी के कुछ अधिकारियों के अनुसार, सीनियर खिलाड़ियों के रैगिंग के बाद परेशान होकर इन चार लड़कियों ने एक ज़हरीला फल खा लिया.
कुछ लोगों का कहना था कि ये लड़कियां मदिरा का सेवन करती पाई गई थीं और अधिकारियों की डांट फटकार के बाद उन्होंने ये कदम उठाया.
लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि महिला खिलाड़ियों से साथ दुर्व्यवहार और उत्पीड़न तो होता ही है.
पहले भी लगे हैं इल्ज़ाम

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इससे पहले भारत की महिला हॉकी टीम ने अपने कोच पर इल्ज़ाम लगाया था.
और बाद में सिडनी ओलंपिक खेलों की कांस्य पदक विजेता कर्णम मल्लेश्वरी ने वेटलिफ्टिंग के एक कोच को महिला खिलाड़ियों के साथ ग़लत हरकत करने के लिए दोषी बताया था.
मल्लेश्वरी ने वेटलिफ्टिंग फ़ेडरेशन से साफ़ शब्दों में कहा था कि वो कोच लड़कियों के साथ काम करने लायक नहीं है. लेकिन कोच पर कोई एक्शन नहीं लिया गया.
खेल मंत्रालय चुप!

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पिछले साल इंचियोन एशियाई गेम्स से पहले दिल्ली में चल रहे जिमनास्टिक के नेशनल कैंप में भी इसी प्रकार की शिकायतें सामने आई थीं.
यहाँ तक कि एक खिलाड़ी ने कोच के ख़िलाफ़ दिल्ली पुलिस में एफ़आईआर भी की थी, लेकिन खेल मंत्रालय की तमाम वादों के बाद कोई एक्शन नहीं लिया गया.
अक्सर यह देखा गया है की इस प्रकार की घटना क्रिकेट, टेनिस या गोल्फ़ में कम देखने को मिलती है, जहाँ लड़कियां पढ़े लिखे और ऊँचे घराने से आती हैं.
कपड़े धुलवाते हैं कोच?

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लेकिन एथलेटिक्स, जिमनास्टिक और कबड्डी ऐसे खेल हैं, जहाँ लड़कियां माध्यम वर्ग या निम्न मध्यम वर्ग की होती हैं, जो खेलों के द्वारा नौकरी पाकर अपने जीवन में सुधार करना चाहती हैं.
ये अक्सर गांवों या छोटे कस्बों से होती हैं और अपने ऊपर हो रहे उत्पीड़न के कड़वे घूँट पीकर शर्म की वजह से इसे सहन करती रहती हैं.
ऐसे में कई अधिकारी और कोच इनकी मजबूरी का फायदा उठाते हैं.
पूर्व एथलीट अश्विनी नचप्पा का मानना है कि नेशनल कैंप में ऐसी घटनाएं हुई हैं.
अश्विनी के अनुसार, "कई कोच लड़कियों से अपने कपड़े धुलवाते हैं, लेकिन लड़कियां कुछ नहीं बोलती हैं."
उपाय

न तो स्पोर्ट्स हॉस्टल को बंद किया जा सकता है, ना ही कैंपस को.
लेकिन यह ज़रूर किया जा सकता है कि इस घटना के बाद कम से कम इसपर गंभीरता से सोचा जाए और सही उपाय निकाला जाए.
सिर्फ खेल मंत्रालय के इतना भर कहने से काम नहीं चलेगा की दोषी के ख़िलाफ़ एक्शन लिया जाएगा और क़ानून अपना काम करेगा.
कहीं ऐसा ना हो की देश का नाम ऊँचा करने वाली लड़कियां सिर्फ मैरी कॉम, साइना नेहवाल या सानिया मिर्ज़ा तक ही सिमटकर रह जाएं.
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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