'कुत्ता' ट्वीट और हमदर्दी की ‘लैंडक्रूज़र’

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- Author, सुधीश पचौरी
- पदनाम, मीडिया समीक्षक
यह कौन सी दुनिया है और कौन से दिमाग़, जो सौ करोड़ दो सौ करोड़ की कमाई करने वाली फ़िल्मों के डॉयलागों में रहकर इतराते रहते हैं और सड़क पर सोने वालों को ‘कुत्ता’ कहते हैं!
क्या अभिजीत के <link type="page"><caption> 'कुत्ता' ट्वीटों</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2015/05/150506_salman_bollywood_fma.shtml" platform="highweb"/></link> में और सलमान के सौ करोड़ क्लब वाली फ़िल्मों के पॉपुलर डॉयलागों में कोई वैचारिक रिश्ता है?
अभिजीत ने ट्वीट किया, "कुत्ता रोड पर सोएगा तो कुत्ते की मौत मरेगा! रोड ग़रीब के बाप की नहीं!"
<link type="page"><caption> अभिजीत और उनके विवादित बयान</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2015/05/150507_singer_abhijeet_controversy_sk.shtml" platform="highweb"/></link>
जब इस बदतमीज़ी पर मार पड़ने लगी तो किसी ढीठ बालक की तरह अगला ट्वीट किया, "आत्महत्या अपराध है, फ़ुटपाथ पर सोना भी अपराध है."
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अब हम उन पॉपुलर संवादों को याद करें, जिनमें सलमान कहते हैं..
"अगर एक बार कमिट कर लूं तो फिर मैं अपने आप की भी नहीं सुनता."
"मुझ पर एक एहसान करना कि मुझ पे कोई एहसान न करना!"
"हम तुम में इतने छेद करेंगे कि समझ नहीं पाओगे कि सांस कहां से लूं और --कहां से...खिहखिहखिह!"
बॉलीवुड के हीरो हीरोइनें एकदम निराली क़ौम है. उनका होना समाज पर एक बड़ी नेमत का, एक अहसान का होना है!
दबंगई की संस्कृति

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‘टाइगर’, ‘बॉडीगार्ड’, ‘दबंग’ एक-दो से लेकर ‘किक’ तक एक हीरो के सिक्स पैक्स ऐब का एक मिथक बनता रहा है, जिसे चमकदार एक्शन के सौ करोड़ दो सौ करोड़ कमाने वाले फ़ार्मूले के रूप में परोसा गया है!
उसने सलमान को नया एक्शन आइकन बनाया है जो दुर्जेय सा नज़र आता रहा है.
उनके उक्त संवाद दबंगई को परम एक्शन सांस्कृतिक मूल्य बनाते हैं, वही उनके सोच का तरीक़ा है.
यह दबंगई का कल्चर है. दबंगई को दबंगई पोसती है. इसी चक्कर में एक मामूली सा गायक बौरा गया और सलमान की दुष्कीर्ति के साथ अपनी कीर्ति बढ़ाने को मचल उठा!
लंपट छवि

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तेरह साल बाद ही सही, लेकिन सलमान को सज़ा देकर अदालत ने क़ानून के अनुसार, अपना कर्तव्य मात्र पूरा किया है, वरना क्या उसे मालूम न रहा होगा कि इस पर हल्ला होगा और बॉलीवुड वाले अपनी बिरादरी की ग्लैमरवादी दबंगियत को एक बार फिर चरितार्थ करेंगे!
उक्त फ़िल्मों का हीरो, हीरो मात्र नहीं, वह एक नई दबंगई का उजड्ड और लंपट रूपक भी है, जिसे बॉलीवुड ने पिछले दो ढाई दशकों में बनाया है.
यह ‘ज़ंजीर’ या ‘दीवार’ वाला ‘एंग्री यंगमैन’ नहीं है. यह ‘यंग लंपटत्व’ है जो मारपीट में, ताक़त के प्रदर्शन में आनंद लेता है, जो हरदम अपने होने के लिए एक नए ‘किक’ एक नए उत्तेजक की खोज में रहता है.
किक यानी लात! किक यानी मज़ा, किक यानी उत्तेजना, किक यानी मसख़री, किक यानी दूसरे को किक लगाकर मस्ती, जिसमें आदमी एक फुटबॉल भर है.
ऐसी फिल्में सिक्स पैक्स ऐब की मेल सेक्स और हिंसक इमेज को बेचती हैं.
देसी सुपरमैन

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यह एकदम नया हीरो है जो सुपरमैन, आइरनमैन, श्वॉर्जनेगर और स्टेलॉन का मिलाजुला देसी संस्करण है.
उनकी तब भी कोई एकाध बार पिटाई कर देता है, लेकिन अपने देसी हीरो की कोई पिटाई नहीं कर सकता.
इनका मारना पीटना ही इनका अभिनय है, जिसे कुछ तीखे डॉयलागों के सहारे हज़म करते रहते हैं.
यह एक्शन फिल्मों के असामाजिक होने का दौर है. अब हमारा हीरो हिंसा के लिए किसी के प्रति जबावदेह नहीं है, फ़िल्म की कहानी के प्रति भी नहीं!
और हमारे फ़िल्म समीक्षक और हमारा मीडिया, ऐसी फ़िल्मों को तीन चार सितारे बांटने में इतने उदार हैं कि उनकी समीक्षाएं फ़िल्मों की प्रोमो बन जाती हैं.
'काला बिज़नेस'

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फ़िल्म के रिलीज से एक सप्ताह पहले तक टीवी के हर ख़बरिया चैनल पर आकर हीरो हीराइनें फ़िल्म के बारे में और उसमें आए अपने आनंद के बारे में बताते रहते हैं.
फ़िल्म की सफलता का मानक अभिनय या निर्देशन नहीं, उसकी कुल कमाई है.
उसके पांच हजार प्रिंट हैं, जो दुनिया भर में रिलीज़ कर दिए जाते हैं और तीन चार सप्ताह में सारी कमाई हो जाती है.
वह अब कला नहीं काला बिजनेस है!
अब हम सलमान की कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसबिलिटी की बात करें जिसके लिए न केवल उनके मित्रों के पास अपील के आंसू थे, बल्कि सलमान की और अभिजीत की आलोचकों के पास भी हमदर्दी थी कि सलमान का हृदय बदल गया था अच्छा काम करने लगा था. अब उस पर निर्भर लोगों का और विकलांगों का क्या होगा?
बॉलीवुडवालों की हमदर्दी

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यानी कि सजा कम होती तो बेहतर होता. क्या हमने ऐसी ही दलीलें तब नहीं सुनीं, जब संजय दत्त अंदर हुए थे?
उनकी गांधीगीरी की छवि को उनके पक्ष में खड़ा किया गया था! अदालत ने तब भी अपना काम किया था, अब भी किया है, इस पर बहस क्या?
सलमान का गाड़ी में बैठा तना चेहरा, उसके माता-पिता, भाई-बहनों के उतरे चेहरे हमदर्दी पैदा करने को थे, बॉलीवुडवालों की हमदर्दी बहती दिख रही थी.

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अजीब बात है कि सड़क छाप आम जनता द्वारा टिकट ख़रीदकर जिसे हीरो बनाया गया, वो एक बार भी अपनी ग़लती नहीं माना, एक बार भी पश्चाताप में नहीं रोया और हर तरह से बचने की कोशिशों में लगा रहा.
तेरह साल तक मुक़दमा यों ही तो नहीं खिसकता रहा होगा!
और जब सज़ा हुई तो उसके पक्षधर, उसके एहसानों का हवाला देकर हमदर्दी की ‘लैंडक्रूज़र’ फिर चढ़ाने चले हैं?
(ये लेखक के अपने विचार हैं.)
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