किसानों का दर्द बताता टीकाराम का 'उठावना'

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- Author, प्रीति मान
- पदनाम, फ़ोटो पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
राजधानी दिल्ली में एक किसान की ख़ुदकुशी से देश हिल गया. किसानों की समस्या राष्ट्रीय मीडिया की चर्चाओं के केंद्र में आ गई.
इन सबसे इतर दिल्ली में ही किसानों की स्थिति को कला के माध्यम से दर्शाने की कोशिश भी हो रही है.

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शहर की एस्पेस गैलरी में लगी प्रदर्शनी 'इंपोटेंट रेज' के केंद्र में देश के किसानों की समस्याएं थीं.
यह प्रदर्शनी भारतीय किसानों की तकलीफ और दबे हुए रोष को दर्शाती है.

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मध्यप्रदेश के विदिशा में पैदा हुए 36 वर्षीय अक्षय ने चित्रों, तस्वीरों, आर्काइवल प्रिंट व इंस्टालेशन के ज़रिए ग्रामीण जीवन की समस्याओं व संघर्ष की ओर ध्यान खींचने की कोशिश की है. उनकी यह दिल्ली में पहली प्रदर्शनी है.

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अक्षय कहते हैं, "मैं बचपन से जाति भेद देखते हुए बड़ा हुआ हूं, ऊंची जाति वालों को नीची जाति को दबाते हुए देखता आया हूं. मैंने ग्रामीण सामाजिक संरचना की गिरावट व भूमि सुधार उदारीकरण को लागू करने में असफलता का कारण और परिणाम देखा है."

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उनका कहना है, "यह प्रदर्शनी अदृश्य ग्रामीण भारत में छुपे हुए उस गुस्से को दर्शाती है, जो व्यवसायीकरण और उसके प्रभाव से जन्मा है."

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प्रदर्शनी 70 वर्ष के काछी किसान टीकाराम के पोर्ट्रेट के पास जाकर ठहरती है.
इसका शीर्षक है 'उठावना' जिसमें टीकाराम अकेला खड़ा अपने खेत से बीजों की बनी दीवार देख रहा है.

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राठौर बताते हैं, "टीकाराम को भूमि की उर्वरता के उपयोग में महारथ हासिल थी. वह किसानों की एक ख़ास जाति से थे. वह अकेले अपनी सारी खेती करते थे और खेती में जैविक उत्पादों का ही प्रयोग करते थे".
'वार' नामक चित्र इस प्रकार की खेती को एक श्रद्धांजलि है. वहीं 'सांड और बैल' नाम का चित्र दो जानवरों की तुलना करता दिखता है. सांड जहां भव्यता, शक्ति और मर्दानगी का प्रतीक है, वहीं बैल अयोग्य और विस्थापित है.

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सबसे ज़्यादा ध्यान खींचने वाला चित्र एक शिशु का है, जो हथियारों से लैस है, उसका चेहरा गुस्से और पीड़ा से भरा हुआ है.
'फ़ूड इन हैंड' तस्वीरों की सीरीज में आम मंडी व ग्रामीण हाटों में मिलने वाले अनाज की तस्वीरें हैं. यह तस्वीरें भारत के ग्रामीण बाज़ार में मिलने वाली विविध सामाग्रियों को दर्शाती है.

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विभिन्न सामग्रियों जैसे अनाज, दालों और मछलियों को भींचे हुए हाथों की तस्वीरें किसान की उदासी और क्रोध को प्रदर्शित करती हैं.

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यह प्रदर्शनी एक तरह से दिल्ली में बैठे संभ्रांत वर्ग को इस बात का अहसास दिलाने के लिए है कि समाज का किसान वर्ग कितना महत्वपूर्ण है.

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और इस किसान वर्ग की अवहेलना से हमें भविष्य में कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है.
ये किसान और खेती ही हमारे समाज की नींव हैं.

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किसानों की मौजूदा हालत और समस्याओं का जायजा लेने के लिए पिछले कुछ वर्षों से राठौर ने मेघालय, असम, छत्तीसगढ़ से लेकर यूनाइटेड स्टेट्स, फ्रांस और स्विट्ज़रलैंड के खेतों का दौरा किया और दस्तावेज़ जमा किए.

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यह प्रदर्शनी एक सवाल भी खड़ा करती है कि लगातार प्रकृति, खेत और किसानों की अनदेखी आखिर कब तक होती रहेगी?
ये प्रदर्शनी राजधानी दिल्ली की इस्केप गैलरी में 21 मार्च से 20 अप्रैल के बीच आयोजित की गई थी.
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