राहुल के 'कॉमन सेंस' पर अब सवाल नहीं?

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- Author, विजय सिम्हा
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
राहुल गांधी के नए रूप ने उनके कॉमन सेंस को लेकर अटकलें लगाने वालों को चुप कराना शुरू कर दिया है.
भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उपाध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी उस नेतृत्व का हिस्सा हैं जिस पर लगातार कई चुनावों में हार की ज़िम्मेदारी है.
2014 के आम चुनाव में तो पार्टी को सबसे क़रारी शिकस्त मिली थी.
राहुल गांधी में चतुराई और एक दिशा में सोचने की आदत की कमी दिखी. ये दो गुण ऐसे हैं जो राजनीति के लिए ऑक्सीजन की तरह हैं.
उनके राजनीतिक जीवन का सबसे निचला ग्राफ़ वो था, जब वह आम चुनावों के बाद 56 दिनों की छुट्टी पर चले गए.
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लेकिन जब से वो लौटे हैं तब से उन्होंने ठहर कर सांस नहीं ली है और इस बात ने अन्य राजनेताओं को हैरत में डाल दिया है.
क्या यही वास्तविकता है? क्या यही वो जगह है जहां राहुल गांधी को उम्मीदें ज़िंदा रखने और प्रचार पाने का मौक़ा मिलेगा.
यह उत्सुकता इसलिए है क्योंकि राहुल ने वापस लौटने के बाद संसद में एक सप्ताह में इतना बोला, जितना शायद वो पिछले दस सालों में भी नहीं बोले थे.
अचानक राहुल गांधी वहां मौजूद दिखाई देते हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कुछ फ़ुट दूर, अपने पैरों पर खड़े होकर, हाथ हिलाते हुए कुछ कहना चाहते हैं और मीडिया का पूरा ध्यान खींचे हुए हैं.
इनमें से बहुत सारी चीजें भारत से बाहर दिमाग़ और शरीर को मिले आराम और चिंतन का नतीजा हैं.
लेकिन इनमें से कुछ तो गांधी का अपना भी है जिसे अभिव्यक्ति का मौक़ा मिला.
असफलता और राहुल

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राहुल अपने आप से खुश हैं. साल 2014 में हफ़्तों तक वो भारत के राजनेताओं में सबसे अधिक आलोचना झेलने वाले नेता थे. लेकिन उन्होंने ख़ुद में बदलाव नहीं किया.
सालों से उन्होंने कांग्रेस पार्टी को नया नज़रिया और नए तौर-तरीकों में ढालने की कोशिशें कीं. वो इसमें सफल नहीं हुए.
ध्यान देने की बात है कि पार्टी के भीतर ही उम्मीदवारों के चुनाव का उनका प्रयोग असफल हो गया.
जो चुने गए वो चुनाव हार गए. लेकिन जब चीजें उनके अनुसार नहीं हुईं, तो राहुल गांधी ने कोई तामझाम नहीं खड़ा किया.
ऐसा लगा कि चीजों के उल्टी दिशा में जाने को लेकर वो तैयार थे.
अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत में ही चुनाव हारने की ज़िम्मेदारी भी उनपर ही है. इन सबने उन्हें एक पूरा इंसान बनाने में मदद की.
दोस्ताना व्यवहार

एक बार बातचीत में राहुल ने मुझ से कहा था कि वो सोचते हैं कि शुरुआत में असफलता व्यक्तित्व को मज़बूत बनाती है.
अब उनके पास असफलताओं की फेहरिस्त है. अब उनसे सफलता की उम्मीद है.
हाल के सालों में भारतीय राजनीति में तीन लोगों ने अपनी पहचान बनाई है- नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल.
मोदी के पास भारतीय जनता पार्टी के प्रशंसकों की जमी जमाई भीड़ है. केजरीवाल अपनी पार्टी में हर उस शख़्स को ख़त्म करना पसंद करते हैं, जो उनसे मतभेद रखता है. इन तीनों में राहुल का ही सबसे दोस्ताना व्यवहार है.
हालांकि राजनीति जितनी बाहरी दिखावे वाली चीज़ है, उतनी ही अंदर की भी चीज़ है. बाहरी दिखावा गांधी का सबसे असहज क्षेत्र है. कुछ नया सोचना बहुत पुरानी बात है.
राहुल का राजतिलक!

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भारतीय वोटर राहुल से ज़्यादा मोदी और केजरीवाल के बारे में जानते हैं. उत्तर प्रदेश के अमेठी से दस सालों तक सासंद रहने के बाद भी यहां नैया थोड़ी डगमगाई.
कुछ ही सप्ताह में राहुल गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाए जाने की उम्मीद है. जब भी ऐसा होगा, यह 'राजतिलक' जैसा होगा, जो राहुल को नापसंद है.
और इसके साथ ही राहुल गांधी के करियर का नया चरण शुरू होगा, जहां उन्हें वो सब करना पड़ेगा, जिसे वो नापसंद करते हैं. प्रचार अभियान, आलोचना, मीन मेख निकालना और डींग हांकना.
अच्छी शुरुआत

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अपनी छुट्टी के बाद उन्होंने अच्छी शुरुआत की है. लेकिन राजनीति अंत में सफल रहने का नाम है.
बिहार और उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. हो सकता है कि इसमें राहुल गांधी को उम्मीद के अनुसार सफलता न मिले.
लेकिन इससे हमें पता चलेगा कि गांधी किस ओर जा रहे हैं और कारवां को कैसे ले जा रहे हैं.
(विजय सिम्हा एक स्वतंत्र पत्रकार हैं और नई दिल्ली में एडिक्शन थेरेपिस्ट हैं. वो तहलका डॉट कॉम और फ़ाइनेंशियल वर्ल्ड के कार्यकारी सम्पादक भी रहे हैं.)
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