एयरटेल तय करेगा कौन से ऐप्स फ्री हों?

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    • Author, शालू यादव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

भारत की सबसे बड़ी टेलीकॉम ऑपरेटर कंपनी भारती एयरटेल ने एक ऐसा मोबाइल इंटरनेट प्लान लॉन्च किया है जिसके तहत कुछ ऐप्स उपभोक्ताओं को मुफ़्त दिए जाएंगे.

आपको ये पढ़कर लगेगा कि ये एक अच्छी ख़बर है लेकिन इसके भीतर एक बुरी ख़बर भी है.

अगर आप एयरटेल उपभोक्ता हैं तो आपके लिए इसका सीधा मतलब ये है कि आपके बजाय अब एयरटेल ये फ़ैसला करेगा कि आप कौन-कौन से ऐप्स का इस्तेमाल मुफ़्त कर सकते हैं.

‘एयरटेल ज़ीरो’ नाम के इस प्लान की सोशल मीडिया पर काफ़ी आलोचना हुई है क्योंकि जानकारों के मुताबिक ऐसे ऑफ़र से ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ यानी इंटरनेट के निष्पक्ष स्वरूप पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा.

‘नेट न्यूट्रैलिटी’ का मतलब है कि इंटरनेट पर हर ऐप, हर वेबसाइट और हर सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म बराबर हैं. इंटरनेट सेवा मुहैया करवाने वाली टेलीकॉम कंपनी को लोगों को उनकी डेटा खपत के हिसाब से चार्ज करना चाहिए.

क्या है स्कीम

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एयरटेल ज़ीरो स्कीम के तहत जो मोबाइल ऐप एयरटेल को पैसा देगी, उसे कंपनी मुफ़्त में उपभोक्ताओं तक पहुंचाएगी.

उदाहरण के तौर पर अगर रीटेल वेबसाइट फ़्लिपकार्ट एयरटेल को पैसा देती है तो उपभोक्ता इस ऐप को मुफ्त में इस्तेमाल कर सकते हैं.

इसका फ़ायदा फ़्लिपकार्ट को और एयरटेल को तो होगा, लेकिन दूसरी रीटेल वेबसाइट जैसे जबॉन्ग और स्नैपडील के लिए ये बुरी ख़बर होगी और साथ ही उन उपभोक्ताओं के लिए जो फ़्लिपकार्ट के बजाय दूसरे ऐप्स ज़्यादा पसंद करते हों.

टेलीकॉम एक्सपर्ट प्रशांतो रॉय ने बीबीसी को बताया, "ऐसी सेवाएं लॉन्च करना इंटरनेट की आचार संहिता के ख़िलाफ़ है. इसके ज़रिए एयरटेल केवल उन्हीं ऐप्स को बिज़नेस देगा जो या तो उसकी ख़ुद की हों या फिर जिसके साथ उसकी कोई डील हो जैसे कि हाइक चैट ऐप. और फिर ख़तरा ये भी है कि एयरटेल अपने मुफ़्त ऐप्स को प्रमोट करने के लिए अपने नेटवर्क पर दूसरे ऐप्स की सेवाएं बाधित कर दे."

विरोध

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एयरटेल के भारत में 20 करोड़ उपभोक्ता हैं और पिछले साल कंपनी ने स्काइप और वाइबर जैसे ऐप्स पर ज़्यादा चार्ज लगाने की बात कही थी, लेकिन इंटरनेट उपभोक्ताओं ने जब इसका विरोध किया तो एयरटेल ने ये फ़ैसला वापस ले लिया था.

भारत में इंटरनेट निष्पक्षता से जुड़ा कोई क़ानून नहीं है और जानकारों का कहना है कि मोबाइल कंपनियां इसका फ़ायदा मुनाफ़ा बनाने के लिए कर रही हैं.

‘नेट न्यूट्रैलिटी’ के हिसाब से जब कोई उपभोक्ता कोई भी डेटा प्लान ख़रीदता है तो उसे हक है कि उस प्लान में दी गई इंटरनेट स्पीड हर ऐप या वेबसाइट के लिए एक समान रहे.

प्रशांतो रॉय ने कहा कि एयरटेल का कुछ ऐप्स को ज़्यादा तवज्जो देना भारत में मोबाइल इंटरनेट सेवाओं के भविष्य के लिए एक गलत उदाहरण साबित होगा.

सोशल मीडिया वेबसाइट्स पर एयरटेल की इस योजना की बहुत निंदा हो रही है.

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फ़ेसबुक पर जहां ये ख़बर टॉप फ़ीड्स में ट्रेंड कर रही है, वहीं ट्विटर पर भी ये मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है.

आम लोगों से जुड़े मुद्दों के लिए आवाज़ उठाने वाली वेबसाइट www.change.org पर तो इसके ख़िलाफ़ एक याचिका भी शुरू की गई है जिस पर अब तक करीब एक लाख लोग इंटरनेट के ज़रिए साइन कर चुके हैं.

पैसे ऐंठने का नया तरीका?

दरअसल भारत में इंटरनेट न्यूट्रैलिटी का मुद्दा अभी शुरुआती दौर में ही है. शायद इसलिए मोबाइल ऑपरेटर कंपनियां उपभोक्ताओं से पैसे कमाने के लिए नए तरीके आज़मा रहे हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी रणनीति अपनाना अनैतिक होगा.

एक समय में अमरीका में भी इस मुद्दे पर बहस हुई थी और वहां फ़ैसला उपभोक्ताओं के पक्ष में लिया गया था.

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लेकिन भारत में उपभोक्ताओं के हक़ के लिए कौन फ़ैसला लेगा? किसी क़ानून या दिशानिर्देश के अभाव में भारत में नेट न्यूट्रैलिटी की स्थिति थोड़ी पेचीदा है.

प्रशांतो रॉय ने बताया, "टेलीकॉम रेग्यूलेटरी ऑथारिटी ऑफ़ इंडिया यानी टीआरएआई के दायरे में ये फ़ैसला लेना शायद संभव नहीं होगा क्योंकि उनका रुख़ ज़्यादातर टेलीकॉम कंपनियों के पक्ष में ही रहता है. हालांकि उनका काम रेग्यूलेशन का है लेकिन वो उपभोक्ताओं के विरोध को शायद ही संबोधित कर पाएं. हो सकता है कि इस मुद्दे को एक जनहित याचिका के ज़रिए अदालत में उठाया जाए."

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उपभोक्ताओं पर इसका कैसा असर पड़ेगा ये आने वाले दिनों में सामने आ ही जाएगा. लेकिन बड़ा सवाल ये है भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इंटरनेट के इस्तेमाल को लेकर क्या लोकतंत्र स्थापित हो पाएगा?

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