'इस अनोखे फ़न को चीन नहीं चुरा सकता'

- Author, सुमिरन प्रीत कौर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
एक तरफ़ नगाड़ा बज रहा है. रंग-बिरंगी पोशाकें पहने, ज़ेवर से लदे हुए बच्चे, बूढ़े और जवान- कोई नाच रहा था, कोई गा रहा था. यह अनोखा नज़ारा है तिब्बती ओपेरा का जिसमें पुरानी लोक कथाओं को बेहद मनोरंजक रूप से दर्शाया जाता है.
हिमाचल प्रदेश के धर्मकोट में चल रहा है "शोतोन" तिब्बती उत्सव. यहां निर्वासन में तिब्बती ओपेरा के 20 साल का उत्सव मनाया जा रहा है.
इस मौक़ै पर भारत के कोने-कोने से तिब्बती कलाकार और दर्शक आए हुए हैं. ये साल और ख़ास इसलिए है क्योंकि इस साल तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा 80 साल के हो जाएँगे.
उनकी उपस्थिति में धर्मकोट के तिब्बतन इंस्टीट्यूट ऑफ़ परफ़ार्मिंग आर्ट्स में इस उत्सव का उद्घाटन हुआ.
<link type="page"><caption> देखिए ओपेरा की एक झलक</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2015/04/150402_tibetan_opera_spk" platform="highweb"/></link>
'शोतोन का मतलब था पढ़ाई से छुट्टी'

दलाई लामा कहते हैं, "ये ओपेरा तिब्बती संस्कृति और परंपरा का एक अनोखा हिस्सा है. तिब्बती संस्कृति का आधार है बौद्ध धर्म. बौद्ध धर्म का जन्म भारत में हुआ था. फिर वो तिब्बत में आया. भारतीय हमारे गुरु हैं और हम उनके चेले."
दलाई लामा कहते हैं, "लेकिन गुरु शायद बौद्ध धर्म के बारे में भूल गया. हमने बौध धर्म से जुड़ी काफ़ी बातें अब तक संभाल कर रखी हैं. ख़़ासकर नालंदा विश्वविद्यालय के ज्ञान को. ऐसे जश्न में ये तिब्बती पहचान दोहराई जाती है. जब मैं छोटा था तो मेरे लिए इस जश्न का मतलब था कि अब सारा परिवार साथ होगा और पढ़ाई नहीं करनी पड़ेगी."

पहले दिन ओपेरा में छोटी-छोटी झलकियाँ दिखाई गईं. बहुत से कालकार भावुक होकर नाचते-नाचते रो पड़े. उनके मुताबिक आप दलाई लामा के सामने अपनी कला का प्रदर्शन करें और दोस्तों से मिलें, ऐसा मौका रोज़ नहीं मिलता.

दलाई लामा कहते हैं, "हम भी वक़्त के साथ चलने में विश्वास रखते हैं. हम अपनी कला में भारत की कला, आधुनिक ज्ञान और पुरानी बातें, सबका ध्यान रखते हैं. तिब्बती परंपरा पर भारत का बहुत गहरा प्रभाव है."
"ये कला कोई नही चुरा सकता"
निर्वासन में तिब्बती सरकार के राजनीतिक प्रमुख लोबसांग संगेय कहते हैं, "चीन इस अनोखी कला को नहीं चुरा सकता. जिस तरह की आवाज़ चाहिए होती हैं ओपेरा में, ख़ासकर तिब्बती ओपेरा में वो सिर्फ़ उन लोगों के बस की बात है जो बहुत ऊपर पहाड़ों पर रहते हैं और जिनका गला आवाज़ को बेहतरीन तरीके से ऊपर-नीचे कर सकता है."

संगेय कहते हैं, "जहाँ एक तरफ हम निर्वासन में अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे हैं, वहीं हम अपनी जवान पीढ़ी को अपनी संस्कृति के बारे में सिखाते हैं ताकि वो तिब्बती परंपरा से जुड़े रहें."
मैं नाचते हुए अलग दुनिया में होती हूँ
ये ओपेरा 5 अप्रैल तक चलेगा. इस इन्स्टिट्यूट में तिब्बती छात्रों को तिब्बती कला, संगीत और ओपेरा सिखाया जाता है.
इस इन्स्टिट्यूट की कलाकार दावा भूटी कहती हैं कि नाचते हुए वो अलग ही दुनिया में होती हैं.

भूटी कहती हैं, "इस बार हम भगवान बुद्ध के जीवन की कहानी बता रहे हैं ओपेरा के ज़रिए. इसमें मैं गौतम बुद्ध की माँ बनी हूँ. ये मेरे लिए ख़ास मौका है. तिब्बती ओपेरा सिर्फ़ नाच-गाना नहीं है. ये हमें बेहतर इंसान बनाता है. सही-ग़लत का भेद बताता है. हमारी कहानियाँ कहती हैं कि अच्छे कर्म करो."
एक दल लगभग आठ घंटे तक नाचता है. उसके बाद चाहे कोई कितना भी थका हो, दर्शक हो या कलाकार, सब एक साथ नाचते हैं.

फिर शाम की चाय का वक़्त होता है. कोई अपने दोस्त से मिलता है, कोई अपनी माँ से और कोई अपने भाई-बहन से. सब भारत और दुनिया के अलग-अलग कोने में रहते हुए आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे हैं और अपनी संस्कृति को बचाने की कोशिश कर रहे हैं.
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