मोबाइल कंपनियों के घड़ियाली आंसू!

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- Author, शालू यादव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत में हाल में हुई स्पेक्ट्रम नीलामी के बाद से ही मीडिया में ख़बरें गर्म हैं कि अब मोबाइल कॉल रेट 10 से 15 प्रतिशत तक बढ़ने वाले हैं.
कहा जा रहा है कि मोबाइल स्पेक्ट्रम ख़रीदने के लिए टेलीकॉम कंपनियों ने जो पैसा खर्च किया, उससे उनकी आमदनी को धक्का लगा और वो घाटे में आ गई हैं.
लेकिन दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भरोसा दिलाया कि ऐसा कुछ नहीं होगा.
रविशंकर प्रसाद ने कहा कि उनके आकलन के हिसाब से मोबाइल कंपनियों को अपना राजस्व बराबर करने के लिए कॉल रेट बढ़ाने की ज़रूरत नहीं है.
बीबीसी हिन्दी ने की इन ख़बरों और सरकार के दावों की पड़ताल.
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हाल में हुई स्पेक्ट्रम नीलामी से भारत सरकार को एक लाख करोड़ रुपए से ज़्यादा कमाई हुई है.
सेल्युलर ऑपरेटर एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के मुख्य निदेशक राजन मैथ्यूज़ से जब बीबीसी ने पूछा कि स्पेक्ट्रम की ख़रीद का टेलीकॉम कंपनियों पर कितना असर पड़ा है तो उन्होंने स्थिति की गंभीरता के बारे में बताया.
मैथ्यूज़ ने कहा, "स्पेक्ट्रम ख़रीदने के लिए इतना खर्च करने के बाद मोबाइल कंपनियों को कर्ज़ लेकर उसकी भरपाई करनी होगी. अंतरराष्ट्रीय स्पेक्ट्रम खरीद के मापदंड के मुकाबले भारतीय मोबाइल कंपनियां सरकार को स्पेक्ट्रम की ख़रीद के लिए 30 प्रतिशत ज़्यादा पैसा दे रही हैं."
उनके अनुसार, "पिछले कुछ वर्षों से मोबाइल ऑपरेटर कंपनियों ने खुद को कई बार रेट बढ़ाने से रोका है. अब हम और वित्तीय बोझ नहीं उठा सकते."
भारत में करोड़ों मोबाइल उपभोक्ता हैं और उनमें से कई स्मार्टफ़ोन पर इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं. इसलिए आम धारणा ये है कि बढ़ते उपभोक्ताओं को लुभाने के लिए कंपनियों को अपनी सेवाएं सस्ती ही रखनी चाहिए.
मंशा का समर्थन

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सेल्युलर ऑपरेटर एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया भारत की सात मोबाइल सेवा कंपनियों का प्रतिनिधित्व करती हैं.
एसोसिएशन का कहना है कि तमाम कंपनियां सरकार की सभी भारतीयों को मोबाइल इंटरनेट सेवा देने की मंशा का समर्थन करती हैं, लेकिन कंपनियों के पास इसे पूरा करने के लिए साधन नहीं हैं.
रविशंकर प्रसाद ने कॉल रेट बढ़ने की ख़बरों पर लगाम लगाते हुए कहा था, "टेलीकॉम रेग्युलेटर के आंकड़ों पर आधारित एक आसान-सा गणित किया जाए तो ये निष्कर्ष निकलता है कि कॉल रेट 1 रुपए 30 पैसे प्रति मिनट से ज़्यादा नहीं बढ़ेंगे."
वहीं टेलीकॉम सचिव राकेश गर्ग ने कहा, "मोबाइल कंपनियों को स्पेक्ट्रम 20 वर्षों के लिए दिया गया है. यानी हर साल उन्हें 5300 करोड़ रुपए देने होंगे. मोबाइल इंडस्ट्री की सालाना आय दो लाख करोड़ है."
गर्ग के अनुसार, "अगर आप कुल मोबाइल मिनट को 5300 करोड़ से भाग करें, तो लगभग एक रुपए 30 पैसे प्रति मिनट की एक कॉल होनी चाहिए."
सरकारी गणित

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लेकिन मोबाइल कंपनियाँ सरकार के गणित को सही नहीं मानतीं.
राजन मैथ्यूज़ ने बीबीसी से कहा, "मंत्री जी ने न तो अपने गणित में महंगाई को ध्यान में रखा है और न ही इस बात का उल्लेख किया है कि मोबाइल कंपनियां सरकार को स्पेक्ट्रम के अलावा अपनी कमाई का 13 प्रतिशत लाइसेंस फ़ीस के तौर पर भी देती हैं."
वो कहते हैं, "मोबाइल क्षेत्र दुविधा में है और अगर हमने अपनी सेवाओं का रेट 12 से 15 प्रतिशत ज़्यादा नहीं बढ़ाया तो हम अपना अस्तित्व खो देंगे."
हालांकि टेलीकॉम मामलों के जानकार अाशुतोष सिन्हा सरकार के गणित को बिल्कुल ग़लत नहीं मानते.
बीबीसी से बातचीत में सिन्हा ने कहा कि उन्हें सरकार का गणित पूरी तरह सटीक नहीं लगता, लेकिन मोबाइल कंपनियों के गणित से ज़्यादा वास्तविक लगता है.
स्मार्टफ़ोन से बढ़ा लाभ

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सिन्हा ने बीबीसी से कहा, "मोबाइल कंपनियों ने इस बात का ज़िक्र नहीं किया कि उन्हें बढ़ते स्मार्टफ़ोन उपभोक्ताओं से भी काफ़ी पैसा मिल रहा है. 3 जी इस्तेमाल करने वालों से डाटा ट्रैफ़िक बढ़ रहा है, तो ऐसा नहीं है कि मोबाइल कंपनियां बड़े घाटे में हैं."
सिन्हा के अनुसार, "उपभोक्ता कॉल रेट बढ़ने पर तो शिकायत करते हैं, लेकिन डेटा सेवाओं का जो रेट बढ़ा है, उसकी शिकायत करता कोई नहीं दिखता, क्योंकि लोग ये सेवाएं इस्तेमाल करना चाहते हैं."
उन्होंने कहा, "आजकल बढ़ती तादाद में लोग रोमिंग, मोबाइल बैंकिंग और सोशल नेटवर्किंग सेवाओं के लिए मोबाइल डाटा सेवाओं पर निर्भर हैं, तो ऐसे में मोबाइल कंपनियां को बेवजह शोर नहीं मचाना चाहिए."

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इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2013 में उपभोक्ताओं का करीब 45 प्रतिशत मोबाइल बिल डेटा सेवाओं पर लगा जबकि वर्ष 2014 में ये आंकड़ा बढ़कर 54 प्रतिशत हो गया था.
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