पीएम मोदी और 'संघ के मोदी' में अंतरविरोध

भारत और पाकिस्तान की वाघा सीमा
    • Author, हरीश खरे
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

नरेंद्र मोदी सरकार के दोस्त और दुश्मन, दोनों ही बीते दिनों पाकिस्तान नीति पर कुछ उलझन की स्थिति में थे.

पाकिस्तान के राष्ट्रीय दिवस के मौके पर पाकिस्तानी उच्चायुक्त के घर पर हुए कार्यक्रम में विदेश राज्य मंत्री वीके सिंह की मौजूदगी पर काफी नाटक हुआ था.

पर इसका मतलब न मोदी के दोस्त निकाल पा रहे हैं और न ही उनके दुश्मन. इसकी वजह यह है कि स्वयं सिंह ने इस मुद्दे पर सार्वजनिक बहस छेड़ कर एक विवाद खड़ा कर दिया था.

अब्दुल बासित, वाणिज्य दूत, पाकिस्तान

उच्चायुक्त के घर अलगाववादी हुर्रियत नेताओं की मौजूदगी से यह कार्यक्रम निश्चित तौर पर एक नाटक बन गया.

पढ़े पूरा विश्लेषण.

सिर्फ़ आठ महीने पहले मोदी सरकार ने कूटनीतिक विवाद इसलिए खड़ा कर दिया था कि पाकिस्तान ने भारत के विदेश सचिव के दौरे के पहले हुर्रियत के लोगों से विचार विमर्श किया था.

पाकिस्तान के उच्चायुक्त के घर पर जनरल सिंह की मौजूदगी पहले से चल रहे कूटनीतिक शिष्टाचार के पालन के अलावा और कुछ नहीं था.

भारत में इस पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया, इस पर किसी को ताज्जुब नहीं होना चाहिए क्योंकि यह नई सरकार का अंदरूनी अंतरविरोध दिखाता है.

प्रचारक मोदी बनाम पीएम मोदी

आरएसएस के स्वयंसेवक

यह संघ के प्रचारक नरेंद्र मोदी और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच का अंतरविरोध है.

प्रचारक के रूप में वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पसंद को बिल्कुल नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते. संघ हमेशा से पाकिस्तान के साथ किसी तरह के मेल मिलाप के ख़िलाफ़ रहा है.

संघ और दूसरे दक्षिणपंथी संगठनों को मोदी एकदम से नज़रअंदाज नहीं कर सकते, क्योंकि उन्हें दिल्ली पंहुचाने में इन संगठनों ने काफ़ी नाज़ुक घड़ी में काफ़ी ज़्यादा मदद की है.

वह अपने मातृ संगठन से दूर गए तो उन्हें इसकी क़ीमत चुकानी ही होगी. अटल बिहारी वाजपेयी ने एक समय के बाद पाकिस्तान समेत तमाम मुद्दों पर संघ के रवैये की परवाह करनी बंद कर दी थी. मोदी ऐसा कर पाएंगे या नहीं, यह देखा जाना अभी बाक़ी है.

मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में देश की रणनीतिक ज़रूरतों का ख़्याल रखना होगा. उन्हें यह भी देखना होगा कि दक्षिण एशिया की हक़ीक़त को ध्यान में रखते हुए वह किस तरह इन ज़रूरतों को पूरा करते हैं.

अमरीकी हितों पर ध्यान

बराक ओबामा के साथ नरेंद्र मोदी

अपने राजनीतिक फ़ायदों के लिए आगे बढ़ कर अमरीका को रिझाने की कोशिश करने वाला प्रधानमंत्री इस क्षेत्र में वाशिंगटन के हितों की उपेक्षा नहीं कर सकता.

अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के दौरे के तुरंत बाद मोदी सरकार के रवैये में नरमी आई और उसने ‘क्रिकेट कूटनीति’ शुरू कर दी. विदेश सचिव जयशंकर ने इस्लामाबाद का दौरा किया, जिसका कोई ख़ास महत्व नहीं है.

मोदी ने अपनी एक राजनीतिक छवि गढ़ी है. यह कुछ इस तरह किया गया है कि पुराने जनसंघ की विचारधारा वाले लोगों को अच्छा लगे.

इसके मूल में हिंदू-मुसलमान समीकरण में कुछ भी हासिल नहीं होने वाली विभाजन के समय की भावना है. इस समीकरण का भी कोई समाधान नहीं निकाला गया है.

छवि से परेशानी

अटल बिहारी वाजपेयी के साथ नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री बनने के लिए मोदी ने जानबूझ कर अपनी ऐसी छवि बनाई है कि मनमोहन सिंह की तरह वह पाकिस्तान की किसी मूर्खता को बर्दाश्त नहीं करेंगे.

अब कोशिश कर गढ़ी गई मज़बूत आदमी की छवि और कूटनीति की ज़रूरतों का अंतर्द्वंद्व खुल कर सामने आ रहा है.

भारतीय समाज में उग्र राष्ट्रवाद की भावना काफ़ी मज़बूत है. यह माना जाता है कि पड़ोसियों की किसी भी ग़लती को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए.

यह उग्र राष्ट्रवाद की ही भावना थी, जिसने मोदी को इसलिए आगे बढ़ाया कि उन्होंने पाकिस्तान के सामने असहाय नहीं बने रहने का भरोसा लोगों को दिया था.

अब यही लोग मोदी को टकराव की नीति से थोड़ा भी पीछे नहीं हटने देंगे. इसी उग्र राष्ट्रवादी समुदाय की वजह से वीके सिंह को पाकिस्तान के उच्चायुक्त के घर जाने पर दिक़्क़त हुई और उन्होंने कई ग़लत ट्वीट कर दिए.

फैलाई गई कहानियां

वीके सिंह के साथ नरेंद्र मोदी

सोशल मीडिया पर चल रही नोक झोंक से एक दूसरे तरह का अंतर्द्वद्व भी सामने आ गया. यह है प्रधानमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के लोगों के बीच का अंतर्द्वंदव्.

भारतीय जनता पार्टी ने कई तरह की कहानियां फैलाईं. उसने यह बात फैलाई की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पाकिस्तानी उच्चायुक्त के घर नहीं जाना चाहती थीं.

उसने यह कहानी भी फैलाई कि कैसे प्रधानमंत्री कार्यालय ने वीके सिंह से सफ़ाई देने को कहा.

एक और अंतर्द्वद्व सामने आया है. एक राजनीतिक दल के नेता के रूप में यह बिल्कुल वाज़िब है कि मोदी अमित शाह के साथ मिल कर ज़्यादा से ज़्यादा राज्यों में अपनी सरकारें बनवाने की कोशिश करें.

उलझन और अंतरविरोध

इसलिए मोदी-अमित शाह की जोड़ी ने पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ अजीब जोड़ी बनाई. यह वही पार्टी है, जिसे भाजपा ने ‘अलगाववादियों’ के साथ मिलीभगत के लिए काफ़ी कोसा था.

मुफ़्ती और अमित शाह के साथ नरेंद्र मोदी

इस गठजोड़ से भारत सरकार की पाकिस्तान नीति में कई और समस्याएं आई हैं.

न मोदी, न भारतीय जनता पार्टी और न ही आरएसएस यह समझने को तैयार है कि भारत में सरकार बदलने भर से पाकिस्तान अपनी कश्मीर नीति नहीं बदलेगा.

उसे इस समय ऐसा करने से कोई फ़ायदा नहीं होने को है.

पाकिस्तान को लेकर यह उलझन तब तक बरकरार रहेगी जब तक इस तरह के अंतरविरोध ख़त्म नहीं हो जाते.

(लेखक पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार थे.)

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