आईटी एक्ट: 6 सवालों में पूरा मामला समझें

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- Author, सिद्धार्थ वरदराजन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
नरेंद्र मोदी, आज़म ख़ान, कार्ति चिदंबरम और ममता बनर्जी में क्या समानता है?
समानता ये है कि इनमें से किसी के बारे में भी ऑनलाइन टिप्पणी करने पर क़ानून के तहत अब किसी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकेगा.
सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए भारत में संविधान के अंतर्गत अभिव्यक्ति की आज़ादी को सर्वोपरि ठहराया है.
कोर्ट ने इंफ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट के सैक्शन 66ए को असंवैधानिक ठहराया है.
इसके तहत इंटरनेट पर वो सब लिखना या बोलना ग़ैरकानूनी था, जो वैसे टीवी या अख़बार या किसी सार्वजनिक मंच पर क़ानून के तहत कहा जा सकता था.
ये हैं क़ानून और कोर्ट के आदेश से जुड़ी 6 ख़ास बातें
1. क़ानून में क्या था आपत्तिजनक?

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क़ानून के आपत्तिजनक अनुच्छेद में निम्नलिखित बातों को कम्यूटर या अन्य ‘संप्रेषण तकनीक’ के ज़रिए भेजने या प्रकाशित करने पर संबंधित व्यक्ति के लिए तीन साल की सज़ा का प्रावधान था.
(क) कोई भी जानकारी जो ठेस पहुंचाने वाली हो या जिसका स्वर धमकी भरा हो.
(ख) कोई भी जानकारी (जो वह शख्स जानता है कि झूठी है) पर असुविधा या ख़तरा पैदा करने, आहत करने, आपराधिक धमकी देने, शत्रुता, दुर्भावना या नफ़रत फैलाने या किसी को गुस्सा दिलाने के मकसद से डाली जाए.
(ग) ऐसी कोई भी इलेक्ट्रॉनिक मेल या इलेक्ट्रॉनिक मेल संदेश जो पाने वाले को नाराज़ करे, उस संदेश के मूल स्रोत को लेकर धोखा दे, गुमराह करे या असुविधा पैदा करे...
2. किन मामलों में गिरफ़्तारी हुई

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इन बहुत ही ढीलेढाले कानूनी प्रावधानों के कारण पिछले साल गोआ में देबु चोडानकर पर एक फेसबुक पोस्ट पर अपराधिक मामला दर्ज किया गया जिसमें उन्होंने कहा था कि 'उन्हें डर है कि अगर मोदी प्रधानमंत्री बन जाते हैं तो 'हॉलोकास्ट' की स्थिति पैदा हो जाएगी.'
पुडुचेरी में रवि श्रीनिवासन को ये ट्वीट करने पर गिरफ्तार कर लिया गया कि ‘रिपोर्ट मिली है कि कार्ति चिदांबरम ने वाड्रा से ज़्यादा संपत्ति इकट्ठा कर ली है.’
कक्षा 11वीं के छात्र विकी ख़ान तब गिरफ़्तार किया गया जब उन्होंने एक कथन को ग़लती से समाजवादी पार्टीके नेता आज़म ख़ान के हवाले से लिख दिया.
कोलकाता के एक प्रोफ़ेसर अम्बिकेश महापात्रा पर आरोप लगा कि वे ममता बनर्जी के एक कार्टून का प्रचार कर रहे थे जो पुलिस के मुताबिक, अपमानजनक था.
विडम्बना ये है कि इनमें से कोई भी कथन उन वाजिब प्रतिबंधों के तहत नहीं आता जो कि संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार पर लगता है.
साथ ही, भारत में अवमानना और मानहानि के कानून के तहत अभिव्यक्ति की आज़ादी को भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी देशों से मैत्रीपूर्ण संबंधों, सार्वजनिक शांति व्यवस्था और नैतिकता के हित में ही प्रतिबंधित किया जा सकता है. या अगर इसमें किसी अपमानपूर्ण व्यवहार को भड़काना शामिल हो.
3. मनमोहन सरकार का क्या था रवैया

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2009 में मनमोहन सिंह सरकार ही सैक्शन 66ए को आइटी एक्ट के तहत लेकर आई थी. इसने नागरिक के किसी भी माध्यम का इस्तेमाल कर बात रखने के अधिकार को सीमित कर दिया था.
इन प्रतिबंधों ने केवल सोशल मीडिया के विकास को सीमित ही नहीं किया, बल्कि दीर्घकालिक तौर पर इसने पारंपरिक मीडिया के भी ठीक से काम करने पर ख़तरा पैदा कर दिया.
आखिरकार सभी अख़बारों और टीवी चैनलों की अपनी वैबसाइटें हैं, जहां वे अपनी सामग्री डालते हैं.
सैक्शन 66ए का मतलब था कि जिस सामग्री को प्रिंट या ब्राडकॉस्ट किया जा सकता था उसके ऑनलाइन उपलब्ध होने पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती थी.
4. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मायने

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सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सर्वोच्चता को आधार मानते हुए, माध्यम को सीमा न मानते हुए, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संबंधी उन्हीं प्रावधानों को कायम रखा है जो आईटी एक्ट में 66ए लाए जाने से पहले थे.
कोर्ट ने मोदी सरकार और उसकी पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के उन आश्वासनों को भी खारिज किया कि इस सैक्शन के दुरुपयोग के ख़िलाफ़ आधिकारिक व्यवस्था की गई है.
त्रासदी ये है कि दुरुपयोग के ख़िलाफ़ ये व्यवस्था विक्की ख़ान को गिरफ्तार होने से बचा नहीं पाई. कोर्ट ने इसका भी संज्ञान लिया है.
इस प्रावधान ने खासकर एक्टिविस्टों, समाज में हाशिये पर पड़े लोगों पर असर डाला था.
5. मोदी का सेंसरशिप का विरोध, फिर यू-टर्न

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अधिकतर राजनीतिक पार्टियां ने सैक्शन 66ए को आईटी एक्ट का हिस्सा बनाए रखने के लिए पुरज़ोर कोशिशें की थीं.
कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए के समय में जब इंटरनेट यूज़र्स को परेशान किए जाने के उदाहरण सामने आए, तो नरेंद्र मोदी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में खड़े हुए और सेंसरशिप के ख़िलाफ़ ट्विटर पर स्याह डिसप्ले प्रोफ़ाइल लगाया.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट में मोदी सरकार ने यू-टर्न किया और आपत्तिजनक ऑनलाइन पोस्ट को अपराध की श्रेणी में रखने के लिए ज़ोरदार दलीलें पेश कीं.
6 आगे क्या, नेताओं पर असर होगा?
अब अति-उत्साही पुलिसकर्मी, पतली चमड़ी के राजनीतिक लोगों को खुश करने के लिए सैक्शन 66ए का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे.
लेकिन अब भी उनके पास ऐसे कई हथियार हैं जिनसे वे अपने आलोचकों को चुप करा सकते हैं. मानहानि का दावा एक ऐसा हथियार है.

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या फिर, फ़ालतू की शिकायतें जिनके तहत शत्रुता बढ़ाने के आरोप लगाए जाते हैं. इन शिकायतों को अंत में कोर्ट ख़ारिज कर देता है, लेकिन कानूनी कार्यवाही समय लेती है और ये प्रक्रिया अपने आप में एक सज़ा है.
एक आदर्श दुनिया में हमारे राजनेता सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को पढ़ते और महसूस करते कि उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कितना सम्मान करना चाहिए.
और, खासकर ऐसी अभिव्यक्ति का जो व्यंग्य, विवेक, और आलोचना के साथ गुंथी हो.
लेकिन असलियत में, माफ़ कीजिएगा, ऐसा होने की संभावना मुझे तो बहुत कम नज़र आती है.
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