'बधियाकरण यौन हमलों का रामबाण नहीं'

बलात्कार विरोध, भारत

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    • Author, द्रोण शर्मा
    • पदनाम, मनोचिकित्सक, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

निर्भया गैंगरेप ने भारतीयों में गुस्सा, डर, हताशा को जन्म दिया था. इसके साथ ही इसने हमारे समाज के घिनौने चेहरे को भी दिखाया था, जिसका हिस्सा हम भी हैं. और यह अहसास ज्यादा तकलीफ़देह है.

यह तो साफ़ है कि इस मामले में 'किसी' को 'कुछ' करना होगा, लेकिन यह साफ़ नहीं है कि वह व्यक्ति कौन है और यौन हमलों को रोकने के लिए वह क्या करेगा?

पढ़िए पूरा विश्लेषण

लोगों का न्यायिक दंड प्रक्रिया से विश्वास उठता जा रहा है और इसके सबूत दिन ब दिन साफ़ होते जा रहे हैं- हाल ही में भीड़ ने नगालैंड में बलात्कार के एक अभियुक्त को जेल से निकालकर पीट-पीटकर हत्या कर दी.

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इस मामले में भीड़ के मनोविज्ञान की पड़ताल भी की जा सकती है.

लेकिन यह भी सही है कि ऐसी घिनौनी घटना सबूत है कि लोग क़ानून को अपने हाथ में ले रहे हैं क्योंकि उन्हें यक़ीन नहीं कि उन्हें क़ानूनी प्रक्रिया से जल्द न्याय मिलेगा.

यौन हमला करने वालों से कई स्तरों पर निपटा जा सकता है.

उदाहरण के लिए दोषी पाए गए अपराधियों के लिए न्यायिक दंड का रास्ता और ऐसे दोषियों के लिए जिनमें कोई मानसिक विकार भी हो - इलाज की व्यवस्था है.

इलाज, ताकि वह आज़ाद भी न घूमें और उनका इलाज भी हो.

दोनों सूरतों में कैद व्यक्ति की स्थिति का आकलन कर उसके दोबारा अपराध करने की संभावना ख़त्म करने के लिए कदम उठाए जा सकते हैं.

कोग्निटिव बिहैवियर थेरैपी के तहत साक्ष्य आधारित इलाज़ में हमलावर के हमला करने की प्रवृत्ति को चुनौती दी जाती है.

उसके उन विचारों और बर्ताव को पहचानने की कोशिश की जाती जो उसके फिर हमला करने की आशंका को बढ़ाते हैं.

और फिर उस ख़तरे को कम करने की रणनीति तैयार की जाती है.

जैविक और मनोवैज्ञानिक कारण

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सेक्सुअल इच्छा और सेक्सुअल बिहेवियर दोनों जैविक रूप से तय होते हैं. पुरुषों में इसे हार्मोन टेस्टोस्टेरोन तय करता है.

इंसानों का अपनी सेक्सुअल इच्छा पर मनोवैज्ञानिक नियंत्रण रहता है और हर समाज में इसके सबूत मिलते हैं.

सामाजिक नियम हमें अपने मां-बाप, भाई-बहनों, बच्चों आदि के साथ यौन संबंध बनाने से रोकते हैं. हालांकि सामाजिक नियम भी अलग हो सकते हैं (कुछ संस्कृतियों में चचेरे-ममेरे भाई-बहन में शादी की अनुमति होती है जबकि अन्य में नहीं).

सेक्सुअल इच्छा के जैविक घटक में बदलाव किए जा सकते हैं और इसे शारीरिक रूप से नियंत्रित किया जा सकता है. आदमियों में इसे सर्जरी के ज़रिए अंडकोष निकालकर किया जा सकता है, जो टेस्टोस्टेरोन का मुख्य स्रोत होता है.

बधियाकरण से अपराध कम होंगे?

हालांकि यह अमानवीय और बर्बर लगता है, लेकिन इसे सबूतों की रोशनी में देखा जाना चाहिए. बीसवीं सदी की शुरुआत में कुछ यूरोपीय देशों में यौन अपराधियों के बधियाकरण को क़ानूनी मान्यता प्राप्त थी.

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हालांकि जिनका बधियाकरण किया जाता था वह सिर्फ़ यौन अपराधी ही नहीं होते थे बल्कि कुछ समलैंगिक भी होते थे (जो उस समय उन देशों में अपराध था). इससे उस समय फिर किए जाने वाले अपराधों में पांच फ़ीसदी की कमी आई थी.

बाद के सालों में विकसित देशों में कानून और व्यवहार में जबरन बधियाकरण बंद कर दिया गया, हालांकि अगर यौन अपराधी खुद इसकी मांग करे तो यह किया जा सकता है या फिर रासायनिक बधियाकरण प्रस्तावित किया जाता है.

अंडकोषों और टेस्टोस्टेरोन को हटाने के कई साइड इफ़ेक्ट्स भी हो सकते हैं, जिनमें वजन बढ़ना, शरीर और चेहरे से बालों का गिरना, बोन डेन्सिटी कम होना शामिल है जिससे हड्डी टूटने की संभावना बढ़ सकती है.

बधियाकरण किए गए यौन अपराधियों पर मनोवैज्ञानिक असर भी पड़ सकते हैं, जिनमें अवसाद, खुदकुशी की प्रवृत्ति बढ़ना, मूड में अचानक बदलाव और जीने की रुचि ख़त्म हो जाना शामिल है.

इससे बधियाकरण किए गए अपराधियों में समाज और उनके शिकार के प्रति बदले की भावना पैदा हो सकती है, जिससे वह हिंसक हो सकते हैं.

चिंता की बात यह है कि टेस्टोस्टेरोन इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध हैं, जिनसे सेक्स इच्छा वापस हासिल की जा सकती है और बधियाकरण का असर ख़त्म किया जा सकता है.

इलाज

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अध्ययन बताते हैं कि बधियाकरण के बाद आदमी की प्रजनन क्षमता और कामवासना दोनों कम हो जाती हैं और इसके साथ ही फिर से हमले की दर भी. हालांकि फिर से हमले की दर कभी भी शून्य नहीं होती!

सीधी बात यह है कि बधियाकरण इस बात की गारंटी नहीं है कि वह व्यक्ति फिर यौन हमला नहीं करेगा.

निर्भया कांड की तरह यौन हमला सिर्फ़ यौनाचार तक ही सीमित नहीं था बल्कि इसमें शारीरिक हिंसा भी शामिल थी.

उल्लेखनीय बात यह है कि बड़ी संख्या में ऐसे मामलों में शारीरिक हिंसा शामिल होती है और यह बधियाकरण किए गए हमलावर द्वारा फिर की जा सकती है.

फिर एक समाज को यह भी सवाल पूछना चाहिए कि बधियाकरण हमले का इलाज़ है या किसी और चीज़ की सज़ा.

आगे का रास्ता

हालांकि हम सब खून के प्यासे हो रहे हैं, लेकिन दरअसल हमें यह हक़ीकत स्वीकार करनी चाहिए कि बधियाकरण यौन हमलों की रामबाण दवा नहीं है.

बारंबार होने वाले मामले में इसे इलाज के मनौवैज्ञानिक तरीके के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.

साथ ही उस पर निगरानी और बधियाकरण के लिए अपराधी की सहमति से इस इलाज़ को अपनाया जा सकता है.

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यौन अपराधियों पर इसे जबरन लागू करने से फ़ायदा तो कम होगा, लेकिन समाज में सुरक्षा की एक झूठी भावना पैदा होगी.

इसके अलावा पहले ही समाज से तालमेल बैठाने में नाकाम आदमियों को उस समाज को तबाह करने की एक और वजह मिल जाएगी, जिसने उनका बधियाकरण किया है.

यह तय है कि भारत अन्य समाजों से अलग नहीं है जहाँ यौन हमलावर हैं. भारत को बीबीसी की डॉ्क्यूमेंट्री के संदर्भ में ख़ुद को पीड़ित पक्ष की तरह पेश करना बंद कर देना चाहिए.

एक देश के रूप में भारत के लिए यह मौका है कि वह ज़िम्मेदारी ले और उसके कानूनों का पालन हो, सही लोग दोषी ठहराए जाएँ और उन्हें सज़ा दी जाए.

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इसके साथ ही सजग राष्ट्र की तरह एक क़दम आगे बढ़ते हुए, भारत सुनिश्चित करे कि वह यौन अपराधियों को इलाज प्रदान करने की पद्धति विकसित करे.

यह वो ज़रूरी कदम है जो क़ानूनी कैद को अर्थपूर्ण बनाता है और इसके साथ ही निर्भया जैसे कांड होने की संभावना को कम करता है.

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