रास आ रहा है मुफ़्ती को सियासी भंवर?

नरेंद्र मोदी और मुफ्ती मोहम्मद सईद

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    • Author, उर्मिलेश
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर में सत्तारूढ़ गठबंधन के दोनों दलों - जम्मू कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और भारतीय जनता पार्टी ने गठबंधन को पुख्ता आधार देने के लिए सवा दो महीने का वक़्त लिया.

मुद्दों पर सहमति बनाने पर काफी मशक्कत हुई और शपथ-ग्रहण के साथ सरकार का न्यूनतम साझा कार्यक्रम भी घोषित किया गया, लेकिन महज़ सात दिनों के अंदर एक अलगाववादी नेता की रिहाई के मसले पर गठबंधन की बुनियाद ही हिलती नज़र आ रही है.

क्या ‘उत्तर और दक्षिण ध्रुव के इस मिलन’ की वैचारिकता में ही कोई ख़ामी है या दोनों के नेताओं में परस्पर भरोसे की कमी है या फिर कुछ और?

साल 2010 से ही जेल में पड़े अलगाववादी मसर्रत आलम की रिहाई के बाद गठबंधन के दोनों घटक आमने-सामने हैं.

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अमित शाह और महबूबा मुफ्ती

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एक गठबंधन सरकार के लिए इससे ज्यादा बुरी शुरुआत और क्या हो सकती है? सरकार के साथ यह देश सबसे संवेदनशील सरहदी सूबे के लिए भी अफ़सोसनाक है. इसके लिए कोई तीसरा पक्ष नहीं, गठबंधन के दोनों घटक ही ज़िम्मेदार माने जाएंगे.

आख़िर सियासत में उठे इस तूफान का असल कारण क्या है?

घाटी में मसर्रत आलम को अलगाववादी नेताओं की दूसरी कतार में शुमार किया जाता है. साल 2010 में गिरफ्तारी के कारण वे सुर्खियों में आए. उस वक्त घाटी में व्याप्त युवा आक्रोश, ख़ासकर पत्थरबाज़ी वगैरह अभियानों से उनका नाम जुड़ा था.

हुर्रियत में उन्हें बुज़ुर्ग अलगाववादी नेता सैय्यद अली शाह गिलानी का ख़ास सहयोगी माना जाता था. पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत उन्हें बार-बार गिरफ्तार किया गया.

लेकिन 27 मामलों में अभियुक्त बनाए जाने के बावजूद सरकारी स्तर पर एक भी मामले में उनके ख़िलाफ़ न तो आरोपपत्र दायर किए जा सके और न ही उन्हें मुकदमे के तहत कसूरवार ठहराया जा सका.

कोर्ट के फ़ैसले की रोशनी में नई सरकार ने उन्हें रिहा करने का फ़ैसला लिया. इस ख़बर के चलते घाटी के बाहर सियासी बवंडर सा मच गया.

इससे पहले भी घाटी में अनेक अलगाववादी नेता जेल आते-जाते रहे हैं, नज़रबंदी का दौर भी चलता रहा है लेकिन शायद ही किसी एक रिहाई को लेकर इस तरह का सियासी बवंडर देखा गया.

लाचार भाजपा

नरेंद्र मोदी और मुफ्ती मोहम्मद सईद

भूमि अधिग्रहण क़ानून सहित अन्य मुद्दे पीछे छूट गए और संसद से सड़क तक मसर्रत आलम का छोड़ा जाना ‘राष्ट्रीय मुद्दा’ बन गया.

विपक्ष ने सरकार को घेरा और सरकार बचाव के लिए दलीलें खोजने लगी. जम्मू में भाजपा विधायक पहले से आक्रोश में थे. वे अपनी आलाकमान से गुहार करने लगे कि ऐसे फैसलों से पार्टी का जम्मू में आधार ही खिसक जाएगा.

कांग्रेस को फिर से पनपने का मौका मिलेगा. एक ‘धुर दक्षिणपंथी हिन्दुत्ववादी पार्टी’ जिसने ‘अति-राष्ट्रवादी एजेंडे’ को बहुसंख्यक आबादी में हमेशा एक कारगर राजनीतिक उपकरण के तौर पर इस्तेमाल किया, इस मुद्दे पर अपने को लाचार महसूस करने लगी.

उसने शिद्दत से महसूस किया कि उसके एजेंडे को विरोधी दल वाले छीन रहे हैं. उसके अपने जनाधार (सिर्फ जम्मू ही नहीं, पूरे देश में) में सवाल उठ रहे हैं.

मीडिया, ख़ासकर न्यूज़ चैनलों के बड़े हिस्से ने जिस तरह इस मुद्दे को क़ानून-न्याय-व्यवस्था की बजाय ‘राष्ट्रवाद और देशभक्ति’ के चश्मे से देखते हुए ख़बरें परोसीं, उसका असर पड़ना लाजिमी था.

आक्रोश का स्वर

मसर्रत आलम

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लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 9 मार्च को जब कहा कि ‘इस मामले में पैदा हुए आक्रोश में वह अपना भी स्वर मिलाते हैं’, तो उनकी सरकार और पार्टी पर पड़े चौतरफा दबाव का असर समझा जा सकता है. यही नहीं, प्रधानमंत्री ने यहां तक कहा कि जम्मू कश्मीर में जो हो रहा है, वह केंद्र सरकार की जानकारी और मशविरे के बगैर हो रहा है.

आखिर सात दिनों के अंदर ऐसी संवादहीनता कैसे पैदा हुई? वह भी तब, जब राज्य सरकार में स्वयं प्रधानमंत्री की पार्टी अहम हिस्सेदार है!

कहीं न कहीं, यह ‘राजनीतिक-लोकप्रियतावाद’ की निर्मम प्रतिद्वंद्विता का नतीजा है. साल 2002 से 2005 के बीच कांग्रेस भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में मुफ़्ती की अगुवाई वाली उस सरकार का हिस्सा थी, जिसने घाटी में ‘हीलिंग-टच पॉलिसी’ के तहत बहुत सारे क़ैदियों को रिहा किया था. इनमें कई अलगाववादी भी थे.

कम होगी नाराज़गी

सैयद अली शाह गिलानी

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केंद्र की तत्कालीन वाजपेयी सरकार भी मुफ़्ती की इस नीति के ख़िलाफ़ नहीं थी. साल 2004 में आई मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने मुफ़्ती को भरपूर सहयोग दिया. नतीजतन, घाटी के माहौल में गुणात्मक बदलाव देखा गया, लेकिन आज का माहौल उससे बिल्कुल अलग है- सबके लिए.

भाजपा के साथ गठबंधन में जाने का फ़ैसला करके स्वयं मुफ़्ती भी घाटी के बड़े हिस्से में संदिग्ध बन गए थे. सिर्फ़ अलगाववादी और उग्रवादी ही नहीं, विपक्षी नेता उमर अब्दुल्ला भी उनके ख़िलाफ़ अभियान चला रहे थे.

मुफ़्ती ‘फिरकापरस्त ताकतों से नापाक रिश्ते’ बनाने के आरोप से घिरे महसूस कर रहे थे. बचावी मुद्रा से बाहर आने के लिए मुफ़्ती को यह दांव कारगर लगा होगा. वह चाहते तो यह क़दम कुछ समय बाद भी उठा सकते थे लेकिन सरकार में आते ही उन्होंने आनन-फानन में यह क़दम उठाया.

उन्हें लग रहा है कि इससे घाटी में उनकी सियासी पकड़ पहले से और मज़बूत हो गई है. कम से कम उन्हें अब कोई घाटी में ‘भाजपा का ग़ुलाम’ नहीं कह सकेगा, अलगाववादी-उग्रवादी जमातों की नाराज़गी कम होगी. यही कारण है कि वह मसर्रत की रिहाई पर उठे सियासी तूफ़ान से तनिक भी विचलित नहीं हैं.

पूर्वाग्रहों की सीख

दूसरी तरफ़, भाजपा के सामने संकट ही संकट है. अगर वह इस मसले पर खामोश रहे तो ‘भगवा में रंगी अति-राष्ट्रवादी राजनीति’ के प्रतिनिधि के तौर पर उसकी स्थिति संदिग्ध हो जाएगी.

सिर्फ़ शिवसेना जैसे उसके नाराज़ सहयोगी ही नहीं, स्वयं उसका मार्गदर्शक संगठन आरएसएस भी यह स्थिति बर्दाश्त नहीं करेगा.

जम्मू का माहौल भी उसके पक्ष में नहीं रहेगा. देश में आज जिस तरह की सियासत हो रही है, उसमें लोगों को पूरे सच से रू-ब-रू होने की नहीं, अपने-अपने आग्रहों-पूर्वाग्रहों पर टिके रहने की सीख दी जा रही है.

लोगों की सामूहिक चेतना के स्तर को उठाने का नहीं, मिथ्या चेतना के विस्तार को आधार दिया जा रहा है. इस सियासी भंवर से निकलने का रास्ता बनाना बहुत कठिन है.

दुखद यह है कि तात्कालिक सिसायी फ़ायदे के लिए कश्मीर जैसे जटिल मसले पर राष्ट्रीय सरोकार के दूरगामी और बड़े मक़सद हाशिए पर डाले जा रहे हैं और इस नाज़ुक खेल में सारे पक्ष शामिल हैं.

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