भारत में बलात्कार पर चुप्पी के 5 कारण

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- Author, सुधीति नासकर
- पदनाम, लेखिका
भारत के पश्चिम बंगाल का मुर्शिदाबाद ज़िला देश के ज़्यादातर ग्रामीण इलाक़ों से अलग नहीं है. धूल भरे मैदानों के बीच में बसे हुए गाँवों में शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी सुविधाएँ नाममात्र की नज़र आती हैं.
इस इलाक़े की महिलाओं के रोज़मर्रा के जीवन से परिचित होने के बाद मुझे पता चला कि यहाँ बहुत सी ऐसी महिलाएँ हैं जिन्होंने उनके साथ होने वाले बलात्कार या यौन हिंसा की शिकायत नहीं दर्ज कराई है.
पश्चिम बंगाल भारत में महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा के मामले में तीसरे स्थान पर है. ज़ाहिर है इन आंकड़ों में उन महिलाओं का मामला शामिल नहीं है जो अपने साथ होने वाले अपराध पर चुप रह गईं.
इस इलाक़े की महिलाओं से बात करने के बाद बलात्कार जैसे गंभीर अपराध के बावजूद इनके चुप रह जाने के पीछे पाँच प्रमुख कारण उभर कर आए.
1. 'लड़की की शादी करनी होती है'

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एक गाँव में मैंने एक किशोरी के साथ चार साल पहले हुई बलात्कार की कहानी सुनी. वो लड़की रोज की तरह सुबह शौच करने के लिए खेत में गई थी तब उसके संग बलात्कार हुआ.
उसके माता-पिता को पता था कि किसने बलात्कार किया है लेकिन उन्होंने इसकी कोई शिकायत नहीं दर्ज कराई. कई गाँव वालों ने मुझे बताया कि उस व्यक्ति पर पहले भी एक बलात्कार का आरोप लग चुका था.
लड़की के एक रिश्तेदार ने मुझसे कहा, "लड़की की अगले कुछ सालों में शादी करनी है. अगर बलात्कार की बात सार्वजनिक हो जाती तो उसके लिए वर ढूंढना मुश्किल हो जाता. ग्रामीण इलाक़ों में शादी के लिए कौमार्य एक ज़रूरी मानक है."
लड़की और उसके माता-पिता नहीं चाहते कि उनकी पहचान ज़ाहिर हो. अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से मिले सहयोग से उन्हें ढांढस तो मिला है लेकिन वो बलात्कारी के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कर सके.
बलात्कारी को सज़ा दिलाने का मतलब होगा मामले को सबके सामने लाना.
लड़की अब कॉलेज में पढ़ने जाती है और वो अपने दुखद अतीत को भूलकर जीवन में आगे बढ़ना चाहती है.
2. 'बदनामी' का डर

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कथित निचली जाति से आने वाली और एक भूमिहीन किसान की पत्नी बंदना बागदी भी उसी गाँव में रहती हैं. उनके संग भी ऐसा ही एक हादसा हुआ था.
एक तालाब के किनारे बनी अपनी जर्जर झोपड़ी में वो कहती हैं, "मेरा भी बलात्कार हो जाता लेकिन मैं भागने में सफल रही."
जब वो अपने पति और भाइयों के साथ दोषी का सामना करने जाने लगीं तो गाँव वालों ने उन्हें रोक दिया.
वो बताती हैं, "उन्होंने कहा कि मैं एक बुरी औरत हूँ जो एक अच्छे आदमी के पीछे पड़ गई है."
यहाँ जैसे परंपरागत ग्रामीण समाजों में पीड़ित पर ही दोष मढ़ देने का चलन आम है.
3. 'दोषी ज़्यादा ताकतवर'

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केलाई गाँव की 60 वर्षीय गोलेचरा बेवा अपने को असहाय पाती हैं. उनकी सबसे छोटी बेटी 19 वर्षीय अजिदा खातून एक शाम जब घर वापस आ रही थीं तो किसी ने उन पर हमला किया.
अजिदा भागकर अपने को बचाने में सफल रहीं.
गोलेचरा कहती हैं, "एक ग़रीब अनपढ़ बूढ़ी महिला के लिए पुलिस में जाना बहुत मुसीबत भरा काम है. गाँव की पंचायत में जाया जा सकता है लेकिन उससे लड़की की 'बदनामी' होगी."
वो कहती हैं, "हमारे लिए इज़्ज़त ही सब कुछ है. उसके बिना हम इस गाँव में नहीं जी सकते."
उनकी घबराहट की एक बड़ी वजह है हमला करने वाले व्यक्ति का संपन्न होना, जिनके सामने वो ख़ुद को असहाय महसूस करती हैं.

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खाड़ी देशों में मज़दूरी के माध्यम से इस इलाक़े में पैसी की आमदनी का नया रास्ता खुला है.
कई बलात्कार पीड़ितों का मुकदमा लड़ चुके स्थानीय वकील राजीब लोचन रॉय कहते हैं, "'नए पैसे से लोगों में अहंकार बढ़ गया है. अपनी ग़लत हरकतों को पैसे और ताकत के बल पर जायज़ ठहराने का चलन बढ़ा है."
वो कहते हैं, "यह पुराने ज़माने की तरह है जब सामंती ज़मींदार ग़रीब तबके की औरतों पर अपनी मर्ज़ी थोपते थे."
ऐसे मामलों में अक्सर पैसे लेकर मामला निजी तौर पर सुलटा दिया जाता है और पुलिस तक बात नहीं पहुँचती.
4. 'गाँव की इज़्ज़त'

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व्यक्तिगत इज़्ज़त की तरह गाँव की इज़्ज़त भी ऐसे अपराधों के दर्ज नहीं होने का बड़ा कारण हैं. यहाँ के गाँव शादी-ब्याह और पारिवारिक संबंधों के कारण आपस में कई पीढ़ियों से जुड़े हुए हैं.
अगर बलात्कार का मामला पुलिस में जाता है तो पूरे समुदाय की 'प्रतिष्ठा दाँव पर' लग सकती है. इस कारण समुदाय के अंदर ऐसे मामलों को दबा लेने का दबाव रहता है.
ऐसे मामलों में माना जाता है कि चुप रहने पर कोई सार्वजनिक विवाद नहीं होगा और समाज में शांति बनी रहेगी.
5. राजनीतिक दबाव?

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बापी दास की पत्नी का मामला परेशान कर देने वाला है. पुलिस ने इस मामले को आपसी सहमति से यौन संबंध बनाने के बाद हुई हत्या के मामले के रूप में दर्ज किया.
लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट इसका खंडन करती है जिसके अनुसार महिला के साथ जबरदस्ती यौन संबंध बनाया गया था. बापी दास दिल्ली और कोलकाता के मानवाधिकार आयोगों में न्याय के लिए दौड़ रहे हैं.
दास की मदद करने वाले एक स्थानीय नागरिक अधिकार संगठन को लगता है कि पुलिस पर बलात्कार के मामलों में कमी दिखाने का राजनीतिक दबाव रहता है.
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