क्या हमारे अंदर भी कोई तालिबान छुपा है?

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
क्या भारतीय समाज तालिबानीकरण की तरफ़ बढ़ रहा है? कहीं तो ऐसा तो नहीं कि पहले से ही हमारे समाज की ऊपरी परत के नीचे कोई तालिबानी प्रवृत्ति छिपी हुई है?
नगालैंड के दीमापुर में जिस तरह भीड़ ने बलात्कार के एक अभियुक्त को पीट-पीट कर मार डाला वो न्याय के तालिबानी तरीकों से भी बदतर प्रतीत होता है.
यह चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट द्वारा विभिन्न पत्रकारों और पश्चिमी नागरिकों के सिर काटे जाने की घटनाओं से भी बुरा प्रतीत होता है.
लेेकिन भारत एक सभ्य और लोकतांत्रिक समाज है, ऐसे में क्या हमारे समाज में ऐसी प्रवृत्तियाँ ज़्यादा परेशान कर देने वाली हैं?
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इस्लामिक स्टेट एक स्वयंभू संगठन है और उसके कृत्य अमानवीय हैं.
वो जो हत्याएं करते हैं उनका किसी तरह से बचाव नहीं किया जा सकता. लेकिन वो एक चरमपंथी संगठन है जो मानवीय जीवन और क़ानून को कोई महत्व नहीं देता.
तालिबान के दस साल के शासन में आम लोगों और राजनेताओं को जैसा न्याय दिया उसे केवल बर्बर ही कहा जा सकता है. तालिबान के न्याय प्रक्रिया से हम सभी विचलित होते हैं लेकिन वो भी सभ्य लोगों का संगठन नहीं है.
हमारे अपने समाज के बीच तालिबानीकरण के लक्षण ज़्यादा परेशान करने वाले हैं. नगालैंड में हुई घटना के ख़िलाफ़ कथित सभ्य समाज में जिस तरह की तीखी प्रतिक्रिया दिखनी चाहिए थी, अब तक मुझे नहीं दिखी है.
भीड़ की बर्बरता

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एक उन्मादी भीड़ ने उच्च सुरक्षा वाली दीमापुर सेंट्रल जेल से बलात्कार के अभियुक्त सैयद शरीफ़ ख़ान को निकाला, उसे नंगा करके पीट-पीट कर मार डाला.
शायद यह काफ़ी नहीं था इसलिए भीड़ ने उसकी लाश को काफ़ी दूर तक घसीटने के बाद शहर के चौराहे पर लटका दिया.
अगर भारत में ऐसी प्रवृत्ति बढ़ रही है तो यह सदमा पहुँचाने वाली बात है. क़रीब 18 महीने पहले मैं हरियाणा में एक रिपोर्ट के सिलसिले में गया था. दिल्ली से महज 100 किलोमीटर दूर एक लड़की और लड़के को उनके परिवार वालों ने ही क्रूरतापूर्ण तरीके से मार दिया था.
लड़के के परिवारवालों ने उसके शरीर के टुकड़े कर दिए थे. लड़की को जलाकर मारा गया था. मुझे उनके माता-पिता का वह बयान अब तक याद है जिसमें उन्होंने कहा था, "हमने ऐसा इसलिए किया ताकि दूसरे लड़के-लड़कियाँ प्यार में न पड़ें."
आपको यह दलील सुनी-सुनी लगती है? आपने कई लोगों को ये कहते सुना होगा कि नौजवान लड़के-लड़कियों को प्यार नहीं करना चाहिए.
मध्यकालीन न्याय की माँग

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क्रूर हिंसक भीड़ के इस तरह से 'न्याय' किए जाने की भारत में कई घटनाएँ घट चुकी हैं. साल 2005 में मुंबई के विरार में भीड़ ने दो संदिग्ध चोरों को पीट-पीट कर मार डाला था.
निर्भया सामूहिक बलात्कार मामले में अदालत का फ़ैसला आने से पहले मैंने उनके माता-पिता के पड़ोसियों से बातचीत की थी. मुझसे बात करने वाले ज़्यादातर लोग इस मामले में मध्यकालीन बर्बर तरीकों से न्याय किए जाने के समर्थन में थे.
कुछ लोगों का कहना था कि अभियुक्तों को चौराहे पर फांसी दी जानी चाहिए. कुछ की माँग थी कि उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े किए जाएँ.
कुछ अन्य लोगों ने तालिबान शैली में न्याय किए जाने की वकालत की. ध्यान देने की बात है कि इस तरह के न्याय की पैरवी करने वाले भारत की राजधानी दिल्ली के शहरी थे.
हो सकता है कि निर्भया मामले में फ़ैसला सुनाए जाने के दिन लोगों की भावनाएँ अपने उफान पर रही हों. लेकिन मैंने ऐसी बातें निर्भया मामले में फ़ैसला आने के काफ़ी पहले और बाद में भी सुनी हैं.
अपने रिश्तेदारों और दोस्तों के साथ बातचीत के दौरान भी मैंने न्याय के ऐसे तरीकों का समर्थन किए जाते देखा है.
सभ्य नागरिकों की जिम्मेदारी

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मुझे डर है कि अगर हमारी ऊपरी परत हटाई जाय तो बहुत से ख़ुद को तालिबान सरीखा पाएँगे. वो भी तब जब हम एक सुव्यवस्थित संविधान से चलने वाले लोकतांत्रिक समाज हैं.
इस तरह से न्याय पाने की भावना को बढ़ावा देने के लिए क़ानून को लागू करने के ग़ैर-पेशेवर तौर-तरीके और भारतीय अदालतों की सुस्त न्याय प्रक्रिया भी काफ़ी जिम्मेदार है.
लेकिन अगर हम एक सचमुच सभ्य समाज के नागरिक हैं तो हैं तो हमें क़ानून का सम्मान करना ही चाहिए.
हमें तीव्र न्याय और पुलिस की पेशेवर व्यवस्था की माँग ज़रूर उठानी चाहिए. लेकिन हम उनकी तरह बर्ताव नहीं कर सकते जिनकी हम बर्बर कह के निंदा करते हैं.
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