कॉरपोरेट युग में नेहरूवादी बजट

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- Author, ज्यां द्रेज़
- पदनाम, अर्थशास्त्री, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
बजट में इस तथ्य की अनदेखी की गई है कि आर्थिक वृद्धि और जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए जितनी महत्वपूर्ण पूँजी है, उतना ही मानव सामर्थ्य भी.
यह उन दिनों की याद दिलाता है जब वृद्धि और विकास का एक ही अर्थ होता था, पूँजी को विकास की कुंजी माना जाता था और मानव पूँजी की उपेक्षा की जाती थी.
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दूसरे विश्व युद्ध के अंत के आस-पास विकास, अर्थशास्त्र में एक सीधी-सादी सोच थी और इसे मुख्यत: पूँजी निवेश का मामला समझा जाता था यानी बांध, सड़क, रेलवे आदि बनाना.

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चूंकि निजी क्षेत्र इसके लिए तैयार नहीं था तो सरकार को यह ज़िम्मेदारी उठानी पड़ी. इसलिए भारत की पहली पंचवर्षीय योजनाएं काफ़ी हद तक बुनियादी ढाँचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) में सरकारी निवेश को लेकर ही थीं. जिसे आज अर्थशास्त्री मानव पूँजी कहते हैं, उसकी बुरी तरह उपेक्षा हुई.
इस विकास रणनीति का नेहरू से कम ही लेना-देना था, यह उस वक़्त दुनिया भर में समान थी और अर्थशास्त्रियों का इसे भरपूर समर्थन हासिल था.
फिर भी इसके कुछ नतीजे निकले और ब्रिटिश राज के दौरान लंबे समय से जारी आर्थिक ठहराव के बाद 1950 और 1960 के दशक में ‘विकास की हिंदू दर’ (क़रीब साढ़े तीन फ़ीसदी प्रति वर्ष) को जगह दी. बावजूद इसके सब कुछ ठीक नहीं था.
पूँजी, वृद्धि और विकास

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अर्थशास्त्री और आगे चलकर नोबेल पुरस्कार पाने वाले मिल्टन फ़्रीडमैन 1955 में भारत आए और उन्होंने एक जानकारीपरक ‘भारत सरकार को ज्ञापन’ पेश किया. इस ज्ञापन में उन्होंने ‘मानव पूँजी निवेश की क़ीमत पर भौतिक निवेश को बढ़ावा देने वाली नीतियों’ के ख़िलाफ़ चेतावनी दी थी.
कुछ भारतीय अर्थशास्त्री जैसे बीवी कृष्णमूर्ति भी ऐसा ही सोचते थे, जिन्होंने उसी साल शिक्षा नीति के विरोध में सरकार को एक कड़ा पत्र लिखा. इस पत्र में उन्होंने 'शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय पर किराने के व्यापारी जैसी सोच' के लिए सरकार की भर्त्सना की.
एक अलग नज़रिए से दूसरी असहमति डॉक्टर अंबेडकर की थी जिन्होंने अनुसूचित जाति के लोगों को आगे लाने के लिए व्यापक स्तर पर शिक्षा को ज़रूरी माना.
इन आलोचकों को दरकिनार कर दिया गया और भारत आज भी इसकी क़ीमत चुका रहा है.
विकास और वृद्धि

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बाद में, विकास अर्थशास्त्र में हुए काम ने इन आलोचकों को दोषमुक्त साबित किया.
यह कहने की ज़रूरत नहीं कि विकास के लिए भौतिक पूँजी अहम है. मगर उसी तरह मानव पूँजी, अर्थ संस्थान और दूसरी चीज़ें जैसे सामाजिक क़ायदे जिन्हें हम पूरी तरह नहीं समझते, वो भी ज़रूरी हैं.
इसके अतिरिक्त, जीवन स्तर में सुधार और इंसान की आज़ादी के अर्थ में विकास केवल वृद्धि नहीं है.
वृद्धि विकास का एक अहम औज़ार हो सकता है, मगर वृद्धि का विकास में बदलना, उसकी प्रक्रिया और सार्वजनिक अमल के कई तरीक़ों पर निर्भर करता है.
मिसाल के लिए सुपोषण जीवन की गुणवत्ता के लिए ज़रूरी है, पर यह पोषण की शिक्षा, साफ़ पानी, स्वास्थ्य और दूसरी कई चीज़ों पर सार्वजनिक क़दम उठाने पर निर्भर है.
बुनियादी ढांचे पर ज़ोर

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आश्चर्यजनक ढंग से, नेशनल डेमोक्रेटिक अलाएंस (एनडीए) का हालिया बजट इन अंतरदृष्टियों को उठाकर एक तरफ़ रख देता है और हमें जवाहरलाल नेहरू के ज़माने में ले जाता है, जब विकास और वृद्धि एक जैसे मालूम पड़ते थे.
भौतिक पूँजी कुंजी थी और मानव पूँजी की कोई अहमियत नहीं थी.
हमें बताया जाता है कि वृद्धि आर्थिक नीति का सबसे अहम पहलू है- बाक़ी अपने आप हो जाएगा.
और वृद्धि की कुंजी है ‘बुनियादी ढांचा’– या एक ख़ास किस्म का बुनियादी ढांचा जिसे कॉरपोरेट सेक्टर का समर्थन हासिल है.
इसके अलावा बुनियादी ढांचे में निवेश मुख्यत: सरकार को करना है. इसलिए बुनियादी ढांचे में सार्वजनिक निवेश को मोटा पैसा मिलता है, और दूसरी सभी चीज़ें सुरक्षा को छोड़कर छोटी पड़ जाती हैं.
बुनियादी ढांचा

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खासकर स्वास्थ्य और शिक्षा को सर्वाधिक नुकसान का सामना करना पड़ता है.
दरअसल, बुनियादी ढांचे पर फिर से ज़ोर एनडीए का विचार नहीं है. यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलाएंस (यूपीए) सरकार में अर्थनीति के स्तंभ रहे मोंटेक सिंह अहलूवालिया की पहले ही बुनियादी ढांचे में निवेश को लेकर बड़ी योजनाएं थीं. बजट का एक लाख करोड़ डॉलर 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान खर्च किया जाना था.
जो नया है, वह यह विचार है कि बुनियादी ढांचा सार्वजनिक निवेश से आना चाहिए.
नेहरू के विपरीत मोंटेक बुनियादी ढांचे में निवेश पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप के ज़रिए निजी सेक्टर से चाहते थे, मगर अब बात फिर से सार्वजनिक निवेश पर आ गई है.
यह इसलिए अजीब लगता है, क्योंकि सार्वजनिक सेक्टर को बिज़नेस मीडिया में निहायत ही छोटा साबित किया जा चुका है. तो यह कहां से आएगा?
करदाताओं के भरोसे

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इसका जवाब वित्त मंत्रालय की ‘मिड ईयर इकोनॉमिक एनालिसिस 2014-15’ में मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने बेहद सफ़ाई के साथ दिया है.
रिपोर्ट में साफ़ कहा गया है कि ‘बैंकिंग सेक्टर लगातार रियल सेक्टर को पैसा देने में असमर्थ और अनिच्छुक बनता जा रहा है’, क्योंकि उसके बही खाते में 18 लाख करोड़ रुपए के नाकाम या स्थगित प्रोजेक्ट्स जुड़े हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक़, ‘ऐसे में सार्वजनिक निवेश को विकास का पहिया बनाने के लिए उसे फिर से ज़िंदा करने की ज़रूरत है.’
दूसरे शब्दों में सार्वजनिक बैंकों को ध्वस्त करके और नॉन परफ़ॉर्मिंग एसेट्स का झंझट करदाताओं के हवाले करके कॉरपोरेट सेक्टर अब सार्वजनिक सेक्टर से उम्मीद रख रहा है कि वह उसे विश्वस्तरीय हाइवे और दूसरी बुनियादी ढांचागत सुविधाएं मुहैया कराए, यानी एक बार फिर करदाताओं के भरोसे पर ही यह सब कुछ हो.
कॉरपोरेट हित

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भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने इन हालात पर पिछले कुछ समय में कड़ी टिप्पणियां की हैं.
25 नवंबर 2014 को अपने एक भाषण के दौरान उन्होंने इशारा किया था कि भारतीय कॉरपोरेट सेक्टर ने अभी तक कुछ-कुछ ‘जोखिमविहीन पूँजीवाद’ देखा है.
उन्होंने अपील की थी कि ये सोच बदली जाए और ‘अड़ियल और असहयोगी बकायेदार को उद्योग का कप्तान मानकर अहमियत न दी जाए, बल्कि इस देश के मेहनतकशों पर लदने की वजह से उसे दंडित किया जाए.'
वित्त मंत्री अरुण जेटली हालाँकि कॉरपोरेट हितों के लिए ज़्यादा हमदर्द हैं.
न केवल वह सार्वजनिक क़ीमत पर विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराने की कॉरपोरेट की मांग को मान रहे हैं, बल्कि उनके बजट भाषण में एक नए पीपीपी मॉडल की बात की गई है, जिसमें ‘जोखिम को फिर से संतुलित करने’ की बात है जहां 'संप्रभु सरकार को इस जोखिम के बड़े हिस्से की ज़िम्मेदारी लेनी पड़ेगी'.
सार्वजनिक क्षेत्र

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ज़ाहिर है कॉरपोरेट्स एक के बाद एक पिछले कुछ दिनों से बजट की प्रशंसा कर रहे हैं. सामाजिक सेक्टर के लिए इसके नतीजे विनाशकारी हैं.
पहली बार अहम सामाजिक कार्यक्रम जैसे स्कूल में भोजन और इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विसेज़ (आईसीडीएस) पर तलवार लटक रही है.
राज्य सरकारों की ओर से कहा गया है कि वो इस खाली स्थान को बढ़े हुए राष्ट्रीय कर से भरने वाले हैं. केंद्र-राज्य के रिश्तों पर मामूली समझ रखने वाले किसी भी व्यक्ति को ख़तरे की घंटियां सुनाई पड़ती होंगी.
शायद इस बजट संकुचन का सबसे बुरा शिकार स्वास्थ्य सेक्टर है. सभी को पता है, जीडीपी के अनुपात में स्वास्थ्य पर सार्वजनिक ख़र्च भारत में दूसरे देशों के मुक़ाबले काफ़ी कम है.
संयोग से पिछले बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने ‘यूनिवर्सल हेल्थ एश्योरेंस’ के लिए एक बड़ी योजना की घोषणा की थी.
बजट कटौती

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पिछले हफ़्ते के बजट भाषण में इसके बारे में एक भी शब्द नहीं कहा गया. इसके बजाय मंत्री अब ‘यूनिवर्सल सोशल सिक्योरिटी’ का वादा कर रहे हैं.
इस संकुचन की सबसे चिंताजनक बात यह है कि इसे मुख्य धारा के मीडिया में पूरे उल्लास से लिया गया. हमें बताया गया है कि इसके संकेत ‘हैंडआउट’ से हटकर लाभकारी निवेश की तरफ़ स्थानांतरण है.
मगर बड़े स्तर के हैंडआउट, जैसे विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को अनुदान असल में रहेंगे.
दूसरी तरफ़, सामाजिक कार्यक्रम जो लोगों के कल्याण और उनकी उत्पादकता को लाभप्रद बनाने में असल योगदान दे सकते हैं, बड़े बजट कटौती से वाकिफ़ हैं.
(ज्यां द्रेज़ रांची यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र विभाग में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर हैं)
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