गैंगरेप डॉक्यूमेंट्रीः इतना हंगामा क्यों?

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- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
दिल्ली में 2012 में एक छात्रा के गैंग रेप और हत्या पर ब्रितानी फ़िल्ममेकर की एक डॉक्यूमेंट्री पर भारत में कोहराम मचा है.
इसका विरोध करने वालों का कहना है कि यह फ़िल्म बलात्कारी का महिमामंडन करती है और पूरे मामले को सनसनीख़ेज़ तरीक़े से पेश करती है.
यह अलग बात है कि ज़्यादातर लोगों ने यह फ़िल्म नहीं देखी है.
अचरज की बात?

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ब्रितानी फ़िल्म निर्माता लेस्ली उडविन ने भारत को झकझोर देने वाले निर्भया बलात्कारकांड पर बनी डॉक्यूमेंट्री 'इंडियाज़ डॉटर' पर दो साल तक काम किया.
एक घंटे लंबी इस फ़िल्म में पीड़िता के अभिभावकों, दोषियों और उनके परिवारों और वकीलों के विस्तृत साक्षात्कारों के साथ ही बीच-बीच में उस घटना का नाट्य रूपांतरण है.
यह फ़िल्म उडविन के उस परिश्रम का नतीजा है जिसमें उन्होेंने एक भारतीय ज़ेल में फांसी की सज़ा पाए दोषी का साक्षात्कार लेने के लिए सबसे असाधारण और दुर्लभ पहुंच हासिल की.
दस हज़ार से ज़्यादा कैदियों और नौ परिसरों वाली दिल्ली की 57 साल पुरानी तिहाड़ जेल एशिया की सबसे सुरक्षित जेल है.
उडविन ने बलात्कार के दोषी मुकेश सिंह का तीन दिन के दौरान 16 घंटे का इंटरव्यू किया. सफ़ेदी किए हुए कमरे में और धूप में मुकेश सिंह शांत और तनावमुक्त नज़र आता है.
फ़िल्म निर्माता का कहना है कि उनकी टीम को जेल अधिकारियों और गृह मंत्रालय ने अनुमति दी थी.
आक्रोष की वजह

ख़बरिया चैनल और सोशल मीडिया पर गुस्सा भड़कने का कारण था मुकेश सिंह का साक्षात्कार.
तीन अन्य दोषियों के साथ मौत की सज़ा पाने वाले मुकेश की बातों से ऐसा नहीं लगता कि उसे कोई पछतावा है बल्कि उसने पीड़िता पर ही सवाल उठा दिया कि उसने बलात्कार का विरोध क्यों किया.
एक प्रमुख टीवी चैनल ने इस फ़िल्म के ख़िलाफ़ तुरंत अभियान छेड़ दिया और इसे 'मजे लेना' और 'पत्रकारिता के सभी मानदंडों' के ख़िलाफ़ क़रार दिया.
कुछ मीडिया विश्लेषकों को लगता है कि इसका संबंध एनडीटीवी के साथ उस चैनल की प्रतियोगिता से ज़्यादा है, जिसने इस फ़िल्म को हासिल कर लिया था और प्रतिबंध लगने से पहले इसे प्रसारित करने वाला था.
भारत में कई लोग मानते हैं कि यह फ़िल्म एक बलात्कारी को अपनी बेतुकी बातें कहने के लिए मंच प्रदान करती है और उसे महिमामंडित करती है.

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इसे लेकर संसद में भी हंगामा हुआ. कई महिला सांसद इसके विरोध में सदन से बाहर चली गईं, जबकि अन्य ने चिल्लाकर पूछा 'बलात्कारियों को अब तक फांसी पर लटकाया क्यों नहीं गया?'
एक जाने-माने कार्यकर्ता का कहना है कि मुकेश की टिप्पणियां दोषी ठहराए जा चुके अन्य बलात्कारियों की अपील पर बुरा असर डाल सकती हैं और उन्हें तुरंत फांसी देने की मांग को बढ़ावा मिल सकता है.
लेकिन अन्य को लगता है कि मुकेश की कही बातों को टीवी पर दिखाने से और ऐसे अपराध को बढ़ावा मिलेगा.
कई लोग इस बात पर ग़ुस्सा हैं कि 'ऐसे क्रूर आदमी की बातों' को प्राइमटाइम पर नहीं दिखाना चाहिए.
भारतीय पुरुषों की छवि
इस बारे में जानी-मानी महिला कार्यकर्ता कविता कृष्णन ने एक चर्चित लेख में पूछा है, "उडविन को कैसे जेल के अंदर दोषियों का इंटरव्यू करने की इजाज़त दी गई जबकि 'भारत में अधिकारी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को कैदियों से बात करने और उन्हें अकेले में फ़िल्माने तक की इजाज़त नहीं देते."

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उन्होंने भारतीय पुरुषों को 'पाशविक' कहे जाने पर भी सवाल उठाया है. उन्होंने कहा, "महिला उत्पीड़न और हिंसा के ख़िलाफ़ भारतीय संघर्ष के साथ एकजुटता पर भारतीय पुरुषों का नस्ली चित्रण किया जाएगा, तो यह विचलित करने वाली बात है."
लेकिन यह तर्क सिर्फ़ आंशिक रूप से सत्य नज़र आते हैं.
कुछ साल पहले प्राइमटाइम समाचारों में भारतीय और भी व्यथित कर देने वाली चीज़ों को देख चुके हैं. उन्होंने एक समाचार पत्रिका के स्टिंग ऑपरेशन में एक कट्टर हिंदू नेता को विस्तार से ये बताते हुए सुना कि कैसे 2002 के गुजरात दंगों के दौरान उसने मुसलमानों और यहां तक कि गर्भवती महिलाओं तक की हत्या की थी.
अख़बारों में नियमित रूप से शवों और दुर्घटनाओं की भयानक तस्वीरें मुख्य पृष्ठों में छापी जाती रही हैं.
हालांकि उत्सुक पश्चिमी मीडिया भी कभी-कभी भारत में महिला विरोधी हिंसा की अपनी कवरेज में भारतीय पुरुषों को 'दुष्ट और पुरुषवादी' के तौर पर पेश करता है.

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लंदन में रहने वाले लेखक सलिल त्रिपाठी बताते हैं कि जब वह 'भारत में बलात्कार' विषय पर एक सेमिनार में बोल रहे थे तो दर्शकों में मौजूद एक महिला खड़ी हुई और पूछा, "क्या सभी भारतीय पुरुष ऐसे ही नहीं होते? क्या भारत में बलात्कार एक महामारी नहीं है?"
त्रिपाठी कहते हैं, "मैंने कहा, क्या सारे जर्मन नाज़ी हैं? भारत में एक अरब से ज़्यादा लोग रहते हैं और दिल्ली के बलात्कारी जैसे अपवाद दस लाख में एक हो सकते हैं. यकीनन मुकेश सिंह एक आदर्श भारतीय पुरुष नहीं है."
फ़िल्म की अन्य बातें
बलात्कार के दोषियों के वकील भी दरअसल फ़िल्म में ख़ुद को गरिमा के आवरण में पेश नहीं करते हैं.
बचाव पक्ष के एक वकील एमएल शर्मा का कहना है, "लड़की किसी अजनबी लड़के के साथ थी, जो उसे डेट पर ले गया था."

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बचाव पक्ष के एक अन्य वकील एपी सिंह कहते हैं, "हमारे समाज में हम कभी लड़कियों को अनजान के साथ बाहर नहीं निकलने देते (शाम को). अगर सचमुच ज़रूरी हो तो वह परिवार के सदस्यों के साथ जाए."
यह देश की अव्यवस्थित न्याय प्रणाली का चौंकानेवाला और शर्मिंदा करने वाला उदाहरण है.
अधिकारियों की प्रतिक्रिया
पुलिस ने दिल्ली की एक अदालत से 'अगले आदेश तक' फ़िल्म पर रोक का आदेश हासिल कर लिया.
पुलिस ने अदालत को बताया कि मुकेश सिंह की 'घिनौनी और अपमानजनक बातों' से 'भय और तनाव का माहौल बन गया है जिससे लोगों का गुस्सा फूटने और कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा हो सकती है.'
कुछ लोग तो मज़ाक में कहते हैं कि ये पूरा हंगामा और क़ानून-व्यवस्था को संभावित ख़तरा सिर्फ़ टीवी स्टूडियोज़ और सोशल मीडिया तक ही सीमित है.

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गृह मंत्री राजनाथ सिंह का कहना है कि इस इंटरव्यू से वो 'ख़ुद हैरान' हैं. उन्होंने इसकी जांच करने का वादा किया है कि कैसे जेल अधिकारियों ने फ़िल्म निर्माता को इंटरव्यू करने की इजाज़त दे दी.
कई लोगों को लगता है कि भारत प्रतिबंधों का देश बन गया है- फ़िल्म, किताब और हाल ही में एक राज्य में गोमांस पर प्रतिबंध.
अभी तक यह साफ़ नहीं है कि डॉक्यूमेंट्री पर प्रतिबंध, अपनी छवि को लेकर सतर्क रहने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व वाली असहिष्णु भारत सरकार के कारण लगा है या इसलिए कि गृह मंत्रालय ने खुद को मुश्किल स्थिति में पाया क्योंकि उसके पास कोई ख़ुफ़िया जानकारी तक नहीं थी कि दिल्ली के एक जेल में एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्माई गई और जो प्रसारित होने जा रही थी.
नुक़सान किसे?
कई लोगों को लगता है कि फ़िल्म पर प्रतिबंध से भारत की छवि को सबसे ज़्यादा नुक़सान हुआ है.

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जब प्रधानमंत्री मोदी निवेश और पर्यटन के लिए विश्व में भारत की छवि को चकमाने में लगे हैं, तो इस तरह की जल्दीबाज प्रतिक्रिया से नुकसान हो सकता है.
एक ब्रितानी कलाकार ने मेरे ट्विटर टाइमलाइन पर लिखा, "लोग अपने देश में क्या देखना चाहते हैं, यह उसे नियंत्रित करने की कोशिश को बढ़ावा देना है."
सलिल त्रिपाठी कहते हैं, "कोई भी समझदार आदमी फ़िल्म पर प्रतिबंध की बात नहीं कर सकता. यह ग़लत है."
लेकिन चीजें जितनी बदलती हैं, वो उतनी ही पहले जैसी रहती हैं. मोदी सरकार के वरिष्ठ मंत्री वेकैया नायडू 'भारत को बदनाम करने की साज़िश' की बात करते हैं और कहते हैं 'अगर उडविन की डॉक्यूमेंट्री भारत के बाहर दिखाई गई तो देश की छवि को नुक़सान होगा.'

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कई लोगों को लगता है कि भारत की छवि इससे ज़्यादा ख़राब होगी कि उसकी सरकार बोलनी की आज़ादी देने की समर्थक नहीं है, बनिस्बत, मुकेश सिंह की निंदनीय बातों के.
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