ये 'आप' में तानाशाही की शुरुआत है?

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भगोड़ा, ये वो घातक शब्द है जो पिछले साल आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल की छवि से चिपक गया था.
इसका कारण था 49 दिनों तक दिल्ली में सत्ता में रहने के बाद उनका अचानक सत्ता छोड़ जाना.
अरविंद केजरीवाल को इसका अहसास हुआ कि सत्ता से 'भागने' वाली छवि उनकी पार्टी के लिए ख़तरनाक साबित हुई.
उन्होंने जनता से माफ़ी मांग ली, माफ़ी के बावजूद हाल के दिल्ली विधान सभा चुनाव अभियान के दौरान ये शब्द उनसे जुड़ा रहा. विपक्ष ने दिल्ली के वोटरों से बार बार कहा कि केजरीवाल भगोड़े हैं उन्हें वोट मत दो. लेकिन जनता ने उनकी माफ़ी स्वीकार की और पहले से भी अधिक मतों से उन्हें सत्ता पर दोबारा बैठाया.
केजरीवाल पर तानाशाही के आरोप

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लेकिन अब केजरीवाल पर कथित रूप से तानाशाह होने का आरोप लगा कर योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने पार्टी में एक तरह से 'विद्रोह' कर दिया है.
पार्टी में आए इस संकट से निपटने के लिए बुधवार को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक घंटों चली. अंदर पार्टी के नेता बहस कर रहे थे और बाहर पार्टी के समर्थक बेचैनी से इंतज़ार कर रहे थे कि अंदर फ़ैसला क्या होता है.
लेकिन इस ड्रामे से एक व्यक्ति ग़ायब था अरविंद केजरीवाल, वो इस बैठक में शामिल नहीं हुए. इसके संकेत पहले ही मिल गए थे. इस बैठक में योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के बारे में अहम फ़ैसले लेने थे. लेकिन केजरीवाल वहां नहीं थे.
सोशल मीडिया पर 'भगोड़ा' शब्द एक बार फिर से नमूदार होने लगा.
वो इलाज के लिए बंगलुरु जाने वाले हैं लेकिन बुधवार को वो दफ्तर में थे. उन्होंने संयोजक पद से इस्तीफ़ा देने का प्रस्ताव भी रखा लेकिन अपने साथियों से आँख से आँख मिलाकर बात करने का साहस नहीं किया.
ज़रूरत के वक़्त ग़ायब हुए केजरीवाल

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ये वो समय था जब पार्टी के अधिकतर युवा और अनुभवहीन नेताओं को उनकी ज़रुरत थी. ये उनके लिए अपने नेतृत्व के गुण दिखाने का समय था.
बुधवार की बैठक पार्टी के तीन साल के इतिहास की एक अहम बैठक थी.
केजरीवाल पार्टी के एकमात्र बड़े स्टार हैं, वो पार्टी का चेहरा हैं. उन्होंने दिल्ली चुनाव में लीडरशिप की भूमिका खूब निभाई लेकिन इस समय जब पार्टी के अंदर उन्हें लीडरशिप दिखाने की ज़रुरत थी वो बैठक से दूर रहे.
प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति से निकाल दिया गया है और इस समिति को दोबारा गठित करने का निर्णय लिया गया है.

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उन्हें पार्टी के अंदर दूसरी ज़िम्मेदारियाँ सौंपी गयी हैं लेकिन इन दोनों नेताओं के तर्क को नज़र अंदाज़ करके पार्टी ने अरविंद केजरीवाल की तानाशाह की साख को और भी मज़बूत किया है.
योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के इस तर्क में दम है कि 'आप' में शख़्सियत-परस्ती का बोलबाला है और ये कि अरविंद केजरीवाल भी उसी 'पर्सनालिटी कल्ट' का शिकार होते जा रहे हैं.
योगेंद्र यादव ने पिछले साल आम चुनाव के बाद भी ये मुद्दा उठाया था. तब चुनाव में हार के बाद केजरीवाल का नर्म रवैया था. उन्होंने अपने ख़िलाफ़ आलोचना को स्वीकार करके यादव के साथ मिलकर काम करने का वादा किया था.
लेकिन अब उनका रवैया सख्त नज़र आता है, लचक नहीं है. अब पार्टी में उन्हें तानाशाह कहने वाले डरेंगे. ये केजरीवाल के हित में नहीं होगा.
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