भारत को मुंह तोड़ जवाब देना होगा: पाक मीडिया

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    • Author, अशोक कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

नियंत्रण रेखा पर गोलाबारी और संघर्षविराम उल्लंघन की घटनाओं को लेकर भारत को दी गई पाकिस्तानी सेना की चेतावनी को पाकिस्तानी अख़बारों ने ख़ासी अहमियत दी है.

नवाए वक़्त का संपादकीय है- भारत को मुंह तोड़ जवाब देना वक़्त का तक़ाज़ा है.

अख़बार के मुताबिक़, जनरल राहील शरीफ़ ने कहा कि भारत बार-बार संघर्षविराम का उल्लंघन कर रहा है. इससे न सिर्फ़ क्षेत्रीय स्थिरता प्रभावित हो रही है, बल्कि दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ जारी अभियान को भटकाने की कोशिशें भी की जा रही हैं.

उर्दू अख़बारों के निशाने पर भारत

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अख़बार लिखता है कि अमरीका भी उसे नहीं रोकता, इसलिए भारत को मुंह तोड़ जवाब देने में कोई अड़चन नहीं होनी चाहिए.

निशाने पर मोदी सरकार

वहीं एक्सप्रेस ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख के इस बयान को संपादकीय का हिस्सा बनाया है कि भारत किसी ख़ुशफ़हमी में न रहे.

अख़बार के मुताबिक़, मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद सरहद पर गोलाबारी और फ़ायरिंग का सिलसिला शुरू हो गया. मोदी सरकार के अब तक के क़दमों से साफ़ है कि पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते बेहतर करने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है.

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संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून की कश्मीर के मुद्दे पर मध्यस्थता की पेशकश का ज़िक्र करते हुए अख़बार लिखता है कि भारत ने इस पर भी कोई ध्यान नहीं दिया.

दैनिक दुनिया ने भी अपने संपादकीय में भारत को मुंह तोड़ जवाब देने की बात की है. अख़बार ने आरोप लगाया है कि भारत अफ़ग़ानिस्तान के रास्ते पाकिस्तान में चरमपंथ को हवा दे रहा है.

अख़बार के मुताबिक़, बलूचिस्तान में अलगावादियों को हथियार और पैसा दिया जा रहा है, कराची में सांप्रदायिक हिंसा को भड़काया जा रहा और पूर्वी सीमा पर बिना वजह संघर्षविराम का उल्लंघन हो रहा है.

अख़बार का कहना है कि ये सुनी सुनाई बातें नहीं हैं, बल्कि पाकिस्तान के पास इनके पक्के सबूत हैं. इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के पाकिस्तान विरोधी एजेंडे को उजागर किया जाए.

इस्लामिक स्टेट का ख़तरा

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दूसरी तरफ औसाफ़ ने गृह मंत्री निसार अली ख़ान के इस बयान पर सवाल उठाया है कि पाकिस्तान को इस्लामिक स्टेट से ख़तरा नहीं है.

अख़बार की राय है कि पाकिस्तान में कई चरमपंथी समूह और संगठन आईएस के नेतृत्व को क़बूल कर रहे हैं. ऐसे में हमें सच से आंखें चुराने की बजाय ऐसे तत्वों का पता लगाना चाहिए.

अख़बार के मुताबिक़, सिर्फ़ यह कहने से काम नहीं चलेगा कि आईएस मध्यपूर्व का संगठन है और उसके पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वो पाकिस्तान तक पंहुच सके.

उर्दू अख़बारों के निशाने पर भारत

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वहीं जंग की राय है कि विश्व शांति के लिए ज़रूरी है कि इस्लामोफ़ोबिया को ख़त्म किया जाए.

अख़बार लिखता है कि 9/11 के हमलों के बाद मुसलमानों को दहशतगर्दी से जोड़ा जाने लगा. माना कि इन हमलों को कुछ मुसलमानों ने अंजाम दिया था, लेकिन चंद लोगों की वजह से सबको बदनाम करना मुनासिब नहीं.

पाठ्यक्रम का भगवाकरण

रुख़ भारत का करें तो रेल बजट पर हमारा समाज का संपादकीय है- प्रभु भरोसे रेल.

अख़बार लिखता है कि उम्मीद थी कि नए बजट में ट्रेनों की संख्या बढ़ाई जाएगी, पटरियों का आधुनिकीकरण होगा, मुसाफ़िरों को राहत मिलेगी, कर्मचारियों के लिए ख़ुशख़बरी होगी और रेलवे की ख़स्ता हालत को दूर करने के लिए क़दम उठाए जाएंगे. पर प्रभु ने किसी पर भी कान नहीं धरा.

अख़बार के मुताबिक़ प्रभु ने काग़ज़ पर तो बहुत अच्छा बजट तैयार कर लिया, पर सवाल यह ह कि इसे ज़मीन पर कैसे उतारा जाएगा.

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हिंदोस्तान एक्सप्रेस का संपादकीय है- हरियाणा के पाठ्यक्रम में गीता के श्लोक.

अख़बार लिखता है कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद से शिक्षा के भगवाकरण की आशंका पैदा हो गई थी, लेकिन अब ये सिर्फ़ आशंका नहीं रही.

अख़बार के मुताबिक़ राज्य के शिक्षा मंत्री राम विलास शर्मा कह चुके हैं कि वो पाठ्यक्रम का भगवाकरण करेंगे और इसमें कुछ ग़लत भी नहीं है.

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