रोज़ी दिल्ली में फिर भी वोट नहीं!

- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
लगभग दो करोड़ की आबादी वाले दिल्ली में सात फ़रवरी को विधानसभा चुनाव होने हैं.
2013 के विधान सभा चुनावों में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिल सका था इसलिए हर पार्टी इस बार अपना पूरा दम-ख़म झोंक रही है.
दिल्ली के पुराने बाशिंदों के साथ-साथ राजनीतिक दलों का विशेष ध्यान उन प्रवासियों पर हैं जिनके लिए ये शहर अब घर बन चुका है.
इन प्रवासियों में हज़ारों ऐसे भी हैं जो अभी भी दिल्ली के मतदाता नहीं है, भले ही इनकी रोज़ी-रोटी का ज़रिया दिल्ली में ही है.
'काम है, घर नहीं'
27 वर्षीय सोनू कुमार मेरठ के रहने वाले हैं लेकिन पिछले आठ वर्षों से दिल्ली में काम करके अपनी आजीविका चला रहे हैं.
पेशे से बढ़ई, सोनू रोज़ाना लगभग 30 किलोमीटर का सफ़र तय करके पश्चिमी दिल्ली में काम पर आते हैं क्योंकि अब दिल्ली उनके रहने के लिए महंगी होती जा रही है.
उन्होंने बताया, "दिल्ली का वोटर नहीं हूँ लेकिन मन बहुत करता था चुनाव में भाग लेने का. छह वर्षों तक अशोक नगर इलाके में रहे लेकिन चुनाव पहचान पत्र तक नहीं बन सका. दलालों के चक्कर लगाने का समय नहीं था और ऑफिस जाओ तो कल-परसों कह कर टाल देते हैं".
सोनू ने थक कर दिल्ली से बाहर रहने का फ़ैसला लिया और अब नोएडा में जाकर रहने लगे हैं. हालांकि उनके अनुसार उनका पेट दिल्ली में काम करके ही पलता रहेगा.
'राजनीति में दखल, वोट नहीं'

पश्चिमी दिल्ली के बाद मैंने पूर्वी दिल्ली के कुछ इलाक़ों का दौरा किया और यहां भी सैंकड़ों की तादाद में ऐसे लोग मिले जो दिल्ली में रहते हैं लेकिन उनका वोट यहाँ नहीं है.
पूर्वी दिल्ली के अंतर्गत 10 विधान सभा क्षेत्रों में प्रवासियों की तादाद बहुत ज़्यादा है और कहा जाता है कि चुनावों में उनके वोट निर्णायक होते हैं.
सिवान, बिहार के रहने वाले कुलदीप कुमार श्रीवास्तव वर्ष 2002 से दिल्ली में हैं और वेब डिज़ाइनिंग का काम करते हैं.
कुलदीप कहते हैं कि वे आज भी सिवान के वोटर हैं और कभी दिल्ली में पहचान पत्र बनवाने की कोशिश ही नहीं की.
उन्होंने कहा, "मेरा बेटा कहता है वो दिल्ली का है और मैं भोजपुरिया हूँ. सही भी है. मैं आज भी सिवान जाकर वोट देता हूँ".
दिल्ली विधान सभा चुनावों पर कुलदीप की पैनी नज़र है और वह मानते हैं भ्रष्टाचार इस चुनाव का प्रमुख मुद्दा रहेगा.
वोट अहम

कुलदीप के ठीक विपरीत है कहानी है जसविंदर सिंह की.
वर्ष 1982 में पंजाब के होशियारपुर से दिल्ली में रोज़ी की तलाश में आए थे टैक्सी चालक जसविंदर और यहीं के हो कर रह गए.
आने के पूरे दस वर्ष बाद उन्होंने दिल्ली में अपना पहचान पत्र बनवाया क्योंकि तब तक यह फ़ैसला नहीं कर सके थे कि कमा-धमा कर पंजाब लौटना है या यहीं रहना है.
कुलदीप ने बताया, "अब तो हम यहीं के हो लिए साहब. यहीं के वोटर और यहीं के नागरिक क्योंकि वोट की बहुत अहमियत है. बेटी को स्कूल में तालीम दे रहे हैं और उसकी पढाई पूरी होने पर हम यहीं रहेंगे, उसके आस-पास".
जसविंदर के लिए महिलाओं की सुरक्षा दिल्ली में सबसे बड़ी चिंता का विषय है.
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