राष्ट्रीय राजनीति में भारी बदलाव की आहट

जम्मू-कश्मीर, चुनाव

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    • Author, प्रमोद जोशी
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

भारत प्रशासित जम्‍मू कश्‍मीर राज्य और झारखंड के विधानसभा चुनाव परिणामों ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रभाव क्षेत्र के विस्तार को स्थापित किया है.

दोनों राज्यों में उसे अब तक की सबसे बड़ी सफलता हासिल हुई है. जम्मू-कश्मीर में पार्टी पहली बार असाधारण रूप से महत्वपूर्ण स्थिति में पहुँच गई है.

इससे केवल राज्य की राजनीति ही प्रभावित नहीं होगी, बल्कि इसका व्यापक राष्ट्रीय असर होगा. सम्भवतः भाजपा की अनेक अतिवादी धारणाएं पृष्ठभूमि में चली जाएंगी.

उसे राष्ट्रीय राजनीति के बरक्स अपने भीतर लचीलापन पैदा करना होगा.

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भाजपा, समर्थक

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भाजपा का दावा है कि जम्मू-कश्मीर का मौजूदा चुनाव उसकी दीर्घकालीन राजनीति का एक चरण है. यानी वह राज्य में ज़्यादा बड़ी भूमिका निभाने का इरादा रखती है.

इसकी परीक्षा अगले एक-दो दिन में ही हो जाएगी. देखना यह होगा कि क्या पार्टी कश्मीर में सरकार बनाने की कोशिश करेगी.

दूसरी ओर झारखंड में भाजपा को पिछली बार की तुलना में सफलता ज़रूर मिली है, पर उसे गठबंधन का सहारा लेना होगा.

यानी राज्य को गठबंधन-राजनीति से पूरी तरह मुक्ति नहीं मिलेगी. इसका मतलब यह भी है कि पार्टी ने सही समय पर वक़्त की नब्ज़ को पढ़ा और आजसू (ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन) से गठबंधन किया.

अधूरी सफलता

नरेंद्र मोदी, झारखंड

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झारखंड में भाजपा को उतनी सीटें नहीं मिलीं जितनी लोकसभा चुनाव के आधार पर मिलनी चाहिए थीं.

लोकसभा चुनाव में पड़े वोटों का विश्लेषण करने से भाजपा की 56 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त थी. पर इतनी सीटों की उम्मीद किसी ने नहीं की थी.

लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मसले, मुद्दे और प्रत्याशी अलग तरह के होते हैं. अलबत्ता पार्टी स्पष्ट बहुमत की उम्मीद कर रही थी, जो नहीं मिला.

देश में सन 2000 में जो तीन नए राज्य बने उनमें झारखंड सबसे अस्थिर राज्य साबित हुआ. प्रदेश में पिछले 14 साल में नौ सरकारें बनीं और तीन बार राष्ट्रपति शासन लगा.

मतदाता को यह अस्थिरता पसंद नहीं आई. इस बार राज्य ने स्थिरता का वरण किया है, जिसमें मोदी की हवा का हाथ रहा.

जनाधार कायम

झारखंड, चुनाव, आदमी

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हेमंत सोरेन के खिलाफ एंटी इनकम्बैंसी का खतरा था, पर ऐसा नहीं हुआ. उनकी सीटें पिछली बार के मुकाबले कुछ बढ़ी हैं यानी पार्टी का जनाधार सुरक्षित है.

नुक़सान कांग्रेस और दूसरी पार्टियों को हुआ. खासतौर से बिहार में जनता दल-यू (जेडीयू), कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के गठबंधन ने जो उम्मीद जगाई थी, वह झारखंड में सफल नहीं हो पाया.

दूसरी ओर यह भी महत्वपूर्ण है कि राज्य में अब अपेक्षाकृत स्थिर सरकार बन सकेगी. केंद्र में भाजपा सरकार का रहना भी राज्य में गठबंधन बनाए रखने में मददगार होगा.

संभव है कि भाजपा नेतृत्व को लेकर कोई प्रयोग करे. संभव है कि इस बार किसी गैर-आदिवासी को राज्य का नेतृत्व करने का मौका मिले.

जम्मू-कश्मीर में बड़ी सफलता

मुफ़्ती मोहम्मद सईद

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जम्मू-कश्मीर में चुनाव की सबसे बड़ी सफलता उसकी पारदर्शिता में है. यहां के वोटर ने एक अरसे के बाद वोट की ताक़त को देखा है.

संभव है इससे राज्य की भावी राजनीति में बदलाव आए. राज्य में भाजपा का ‘मिशन 44+’ पूरा नहीं हुआ, पर पहली बार वो राज्य की राजनीति में निर्णायक भूमिका में आ गई है.

कहना मुश्किल है कि कौन सा गठबंधन सरकार बनाएगा. एक संभावना भाजपा के साथ गठबंधन बनने की भी है. यह संभावना ही कश्मीर के लिए नए किस्म का अहसास लेकर आई है.

1987 के बाद ऐसा पहली बार हुआ, जब राज्य की जनता ने इतने ज़्यादा उत्साह के साथ वोटिंग की है. 1987 के चुनाव में धांधली का आरोप लगा था और उसके बाद शुरू हुई चरमपंथी अराजकता के पीछे चुनाव धांधली को भी बड़ा कारण माना जाता है.

अमित शाह, भाजपा, श्रीनगर

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भौगोलिक और सामाजिक संरचना को देखें तो जम्मू-कश्मीर तीन बड़े इलाक़ों में बंटा है. इसमें लद्दाख की भूमिका ज़्यादा बड़ी नहीं है, पर जम्मू और घाटी की लगभग बराबर की ताक़त एकदम साफ़ है.

राज्य में ऐसी पार्टी की ज़रूरत है, जो दोनों इलाक़ों पर समान प्रभाव रखती हो. कांग्रेस एक हद तक यह भूमिका निभाती रही है.

कहना मुश्किल है कि कांग्रेस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) गठबंधन बनेगा या नहीं, पर कांग्रेस के नज़रिए से यह चुनाव संतोषजनक रहा है.

इस साल राष्ट्रीय राजनीति में उसकी भूमिका कम हुई है पर जम्मू-कश्मीर में वह अपनी पुरानी स्थिति के आसपास आ गई है.

जम्मू की भूमिका बढ़ी

भाजपा, कश्मीर, विधानसभा चुनाव

इस बार भाजपा की सफलता के कारण कहा जा सकता है कि राज्य के शासन में जम्मू क्षेत्र की, बल्कि प्रकारांतर से कहें तो भाजपा की भूमिका पहले से ज़्यादा बड़ी होगी.

पार्टी ने लोकसभा चुनाव में सफलता को कायम रखा है. लोकसभा चुनाव के आधार पर पार्टी को 24 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल थी. इस बार उसकी स्थिति कुछ बेहतर ही हुई है.

राज्य में हाल में आई बाढ़ के बाद पुनर्निर्माण के लिए जो साधन-स्रोत केंद्र से चाहिए, उसके लिए एक पुल की ज़रूरत होगी.

सरकार बनाने में यह बात अहम भूमिका निभाएगी. नेशनल कॉन्फ्रेस को एंटी इनकम्बैंसी का सामना करना पड़ा, पर उसकी जिस दुर्दशा का अंदेशा था, वैसा भी नहीं हुआ.

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