कश्मीर: सरपंचों की हत्या के पीछे कौन?

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- Author, हाज़िक़ क़ादिरी और क़ादरी इंज़माम
- पदनाम, कश्मीर से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
उत्तर कश्मीर के सोपोर में हाल में हुए विधानसभा चुनाव के तीन दिन बाद पांच अज्ञात बंदूक़धारियों ने गांव के हेगाम इलाक़े के एक गांव के सरपंच को अग़वा कर लिया.
अगली सुबह कश्मीर पुलिस को एक बाग़ से सरपंच की गोलियों से छलनी लाश मिली.
बीबीसी ने ऐसे कुछ परिवारों से बात की जिनके सदस्य सरपंच रहे हैं और अज्ञात बंदूक़धारियों ने उनकी हत्या कर दी.
पढ़िए विस्तार से
आठ अप्रैल 2013 की शाम ग़ुलाम मोहम्मद लोन दक्षिणी कश्मीर के कुलपोरा पुलवामा में अपने आधे बने घर में बेटे के साथ ईंटों पर पानी दे रहे थे.
अंधेरे में अचानक एक आदमी सामने आया और उसने सवाल किया, "क्या तुम सरपंच ग़ुलाम मोहम्मद लोन हो?" सरपंच के हां में जवाब देते ही उसने उनका सिर पकड़ा और माथे में गोली मार दी.
मौक़े पर ही उनकी मौत हो गई और वह शख़्स अंधेरे में ग़ायब हो गया. लोने के बेटे एजाज़ अहमद उस पूरी घटना के अकेले चश्मदीद हैं.
अज्ञात बंदूक़धारी
ये घटनाएं बड़ी रहस्यमय हैं जिनमें मुख्य रूप से सरपंच, पंच और उनके परिवारों को ही निशाना बनाया जाता है.
जम्मू कश्मीर के 22 ज़िलों में कुल 4128 पंचायत हैं और इनमें 33,000 पंचायत सदस्य हैं.
पंचायतों में 29000 पंच और 4145 सरपंच हैं.
पिछला चुनाव अप्रैल 2011 में हुआ था. राज्य में 1989 में हथियारबंद विरोध शुरू होने के बाद यह पहला पंचायत चुनाव था.

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इन चुनावों को लोकतंत्र के लिए एक नए युग की शुरुआत माना गया क्योंकि बड़ी संख्या में लोगों ने इसमें हिस्सा लिया.
पंचायत सदस्य स्थानीय मुद्दों और ज़मीनी स्तर पर लोगों की सेवा के लिए चुने गए.
हालांकि एक साल बाद ही पंचों और सरपंचों की अज्ञात बंदूक़धारियों के हाथों सुनियोजित तरीक़े से हत्या का सिलसिला शुरू हो गया.
इन बंदूक़धारियों की पहचान के साथ ही इनके मक़सद का भी पता नहीं.
ग़ुलाम मोहम्मद लोन की मौत के बाद इलाक़े के थाने में रिपोर्ट दर्ज की गई.
रिपोर्ट में पुलिस ने "अज्ञात बंदूक़धारी" के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया जिसकी पहचान अब तक नहीं पता चली है.
लोन की बीवी हाजरा बानो का कहना है कि पुलिस ने मामला दर्ज करने का बाद आगे कार्रवाई नहीं की.
घटना के बाद एक साल बीत चुके हैं लेकिन पुलिस के पास हत्यारे का कोई सुराग़ नहीं है.
उधर लोन परिवार भी मामले को आगे बढ़ाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा.

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हाजरा कहती हैं, "हम अब और मुसीबत नहीं बुलाना चाहते. मामले का आगे बढ़ना हत्यारों को भड़का सकता है और वे मेरे बेटे को नुक़सान पहुंचा सकते हैं. मैं नहीं चाहती कि ऐसा हो."
सरपंच की हत्या के लिए पुलिस चरमपंथियों और अलगवावादियों को ज़िम्मेदार ठहराती है जबकि अलगाववादी भी इसे 'बड़ी साज़िश' और 'ग़ैरइस्लामी' क़रार देकर इसकी निंदा करते हैं.
आरोप-प्रत्यारोप
पंचायत के चुनावों को पार्टी से ऊपर उठ कर लड़ा जाना था लेकिन ज़्यादातर सदस्य ख़ुद किसी न किसी पार्टी से जुड़े हैं.
इनमें नेशनल कांफ्रेंस, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी या कांग्रेस जैसी कश्मीर की मुख्य राजनीतिक पार्टियां शामिल हैं.
कई बार राजनीतिक दल एक दूसरे पर भी इन हत्याओँ के आरोप लगाते हैं.
इन हत्याओँ को कई बार चरमपंथियों की लोगों को डरा कर चुनाव से दूर करने के लिए की गई हरकत के रूप में भी देखा जाता है.
इसी साल आठ मार्च को मोहम्मद शाबान डार देर शाम की नमाज़ इशा के लिए अपने गांव डोगरीपुरा पुलवामा में पास की मस्जिद गए.
उनके बेटे ग़ुलाम मोहम्मद डार भी कुछ ही मिनटों के बाद मस्जिद जाते थे. उस शाम जब ग़ुलाम मोहम्मद मस्जिद गए तो उनके पिता कहीं नहीं दिखे.
काफ़ी देर ढूंढने के मस्जिद के परिसर में उनका शव मिला. उनके सिर में भी किसी अज्ञात बंदूक़धारी ने गोली मार दी थी.
50 साल के ग़ुलाम मोहम्मद डार कहते हैं, "मैं तब सरपंच था. मैंने सोचा कि मेरे पद के कारण ही मेरे पिता की हत्या हुई."
घटना के तुरंत बाद डार ने स्थानीय अख़बारों में अपने इस्तीफ़े का ऐलान कर दिया. वह ख़ुद को और अपने परिवार को किसी भी राजनीतिक दल से अलग रखना चाहते हैं.
हालांकि इस्तीफ़े से भी उनका फ़ायदा नहीं हुआ. मामला और ज़्यादा संदिग्ध हो गया जब डार के भाई ग़ुलाम मोहिउद्दीन को भी उसी गांव के उनके घर में चार अज्ञात बंदूक़धारियों ने मार डाला.
मोहिउद्दीन बढ़ई थे. डार इन परिवार में हुई दो हत्याओं के बाद घबरा गए.
उन्होंने कहा, "शुरुआती दिनों में पता होता था कि किसने किसे मारा है और क्यों लेकिन अब हर चीज़ गुप्त और रहस्यमय है."
पंचों में डर

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2011 में चुने जाने के बाद कम से कम 11 सरपंचों और पंचों की हत्या हो चुकी है. इन अज्ञात बंदूक़धारियों के हमलों में 100 से ज़्यादा लोग घायल भी हुए हैं.
जम्मू कश्मीर पंचायत कांफ्रेंस के चेयरमैन शफ़ीक़ मीर कहते हैं कि जब से सरपंचों पर हमले शुरू हुए हैं तब से पूरी पंचायत संस्था ही बेकार हो गई है.
1000 से ज़्यादा पंचायत सदस्यों ने सार्वजनिक रूप से इस्तीफ़ा देकर लोगों से माफ़ी मांगी है.
सरपंच के हत्यारों की पहचान के बारे में जम्मू कश्मीर पुलिस के कश्मीर डिवीज़न के आई जी अब्दुल ग़नी मीर को जानकारी नहीं है लेकिन वो पुलिस तंत्र के बेख़बर होने के दावों को ख़ारिज कर देते हैं.
वो कहते हैं कि पुलिस हर एक मामले की छानबीन कर रही है.
दक्षिण कश्मीर के डीआईजी आलोक कुमार ने इस बारे में बात करने से साफ़ इनकार कर दिया.
तीन सालों में सरकार इन हत्याओँ में एक भी मामले को नहीं सुलझा सकी है.
अज्ञात बंदूक़धारी अब भी पकड़ से बाहर हैं और पंचायत सदस्यों की ज़िंदगी के लिए ख़तरा बने हुए हैं.
क्या ये अज्ञात बंदूक़धारी कभी पहचाने जाएंगे? रहस्य अभी भी नहीं सुलझा है.
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