'दादा सुनाते थे परिंदों की मीठी कहानियाँ'

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, कश्मीर से, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
कश्मीर घाटी में सितंबर में आयी बाढ़ ने हर चीज़ के साथ, यहाँ की झीलों को भी प्रभावित किया. लेकिन राज्य में हर साल आने वाले प्रवासी पक्षियों का काफिला पहले ही की तरह पहुँच रहा है.
प्रवासी पक्षियों के आने से जैसे कश्मीर के इन झीलों की ज़िंदगी फिर से वापस आ गयी है. ये पक्षी हर साल सर्दियों के दो-तीन महीनों तक इन झीलों का अपना घर बनाते हैं.
लाखों आ चुके हैं

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कश्मीर के वन्य जीव विभाग (झीलों) के वार्डन इम्तियाज़ अहमद कहते हैं, "अक्तूबर से अब तक चार करोड़ 50 लाख प्रवासी पक्षी कश्मीर की झीलों में आ चुके हैं. आने वाले दिनों में ये तादाद और भी बढ़ सकती है."
कश्मीर की बारह बड़ी झीलों में अब तक रूस, साइबेरिया, मध्य एशिया और पश्चिमी यूरोप से प्रवासी पक्षी देखे जा चुके हैं.
क्या सितम्बर में आई बाढ़ ने कश्मीर की झीलों को नुकसान पहुंचाया और इसकी वजह से प्रवासी पक्षियों के आगमन पर कोई प्रभाव पड़ा है?
इसपर इम्तियाज़ अहमद का कहना था, "इस में कोई शक़ नहीं कि नुकसान हुआ है. लेकिन फिर भी प्रवासी पक्षियों का आना थोड़ा हैरान कर देने वाला मामला है."
पहले मैदानी इलाक़े में

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होकरसर झील प्रवासी पक्षियों के लिए कश्मीर की सबसे बड़ी झील है
प्रवासी पक्षी सितम्बर के महीने में पहले भारत के मैदानी इलाकों में पहुंच जाते हैं, बाद में उनका रुख कश्मीर की तरफ़ होता है.
इम्तियाज़ अहमद कहते हैं, "सितम्बर महीने के आख़िरी दिनों से ये प्रवासी पक्षी कश्मीर में दाखिल होने लगते हैं और 15 फ़रवरी से वो वापस अपने मूल निवास स्थावन को वापस जाना शुरू करते हैं."
सुरक्षा के लिए अलग टीम

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यहाँ आने वाले प्रवासी पक्षियों के ऊपर शिकार होने का भी ख़तरा रहता है. इससे निपटने के लिए वन्य विभाग ने एक अलग टीम बनाई है, फिर भी पक्षियों के शिकार के कुछ वाक़ए हो जाते हैं.
होकरसर झील में काम करने वाले बशीर अहमद कहते हैं, "कभी-कभी तो हम रात के दो बजे नाव मैं बैठ कर शिकारियों से इन परिन्दों को बचाते हैं."
मीलों का सफ़र

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पक्षियों को बचाने के लिए बशीर जैसे कई कर्मचारी सर्द रातों में क़रीब 100 किलोमीटर का सफ़र किश्तियों में तय करते हैं.
स्थानीय लोगों में प्रवासी पक्षियों को लेकर हमेशा ही एक उत्साह रहा है.
पहलगाम के 70 वर्षीया गुलाम मोहम्मद शाह आज भी प्रवासी पक्षियों को देखने के लिए ख़ासकर वक़्त निकालते हैं.

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शाह कहते हैं, "मैं अपने पिता के साथ बचपन में श्रीनगर की झीलों पर जाया करता था. उड़ते समय पक्षियों को देखने कुछ ऐसा होता है की इंसान उन्हें देखता ही रह जाए."
शाह के ज़हन में इन पक्षियों से जुड़ी कई कहानियाँ अब भी ताज़ा हैं. वो कहते हैं, "मेरे दादा शिकारी थे और वो हमें इन मेहमान परिंदों की मीठी कहानियाँ सुनाते थे."
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