एक ट्रांसजेंडर अफ़सर की दास्ताँ

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- Author, अमृता अल्पेश सोनी
- पदनाम, छत्तीसगढ़, नोडल अधिकारी (एचआईवी-एड्स)
छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य में एचआईवी और एड्स पीड़ितों के लिए ट्रांसजेंडर अमृता अल्पेश सोनी को नोडल अधिकारी बनाया है.
पुणे के सिंबॉयसिस से मानव संसाधन में एमबीए करने वाली अमृता सोनी एचआईवी और एड्स पीड़ितों के लिए आयोजित होने वाले चिकित्सा शिविरों का कामकाज देखेंगी.
इस पद पर अमृता की नियुक्ति इसलिए ख़ास है, क्योंकि अमृता ख़ुद एचआईवी पीड़ित हैं.
सुनिए अमृता की आपबीती उनकी ही ज़ुबानी
भारत के इतिहास में पहली बार किसी <link type="page"><caption> थर्ड जेंडर</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/04/140415_supreme_court_transgender_fma.shtml" platform="highweb"/></link> को नोडल अधिकारी बनाया गया है और आज मुझे अपने किन्नर होने पर गर्व है. मैं आज जो कुछ भी हूं, अपनी माँ और अपनी दोस्तों की वजह से हूं.
मैंने मॉडलिंग की, किन्नरों की तरह परंपरागत रूप से नाच-गाकर भीख माँगी, सेक्स वर्कर के तौर पर काम किया, लेकिन आख़िर में उस दलदल से निकल कर यहां पहुंची.
मेरे जीवन के कई बदरंग पन्ने हैं.

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सोलापुर में बचपन के दिन मुझे याद हैं. लेकिन मेरा बचपन, बचपन की तरह नहीं था. माता-पिता बच्चों की पसंद का ध्यान रखते हैं, उसके लालन-पालन में कोई कसर न रह जाए, इसकी कोशिश करते हैं. लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं था.
मेरी माँ बहुत प्यार करती थी, लेकिन पिता एक किन्नर के तौर पर मुझे पसंद नहीं करते थे. माँ के सिवा कोई भी यह समझने की कोशिश नहीं करता था कि इसमें मेरी कोई ग़लती नहीं है. माँ सारे ताने सहती, "तूने गुड़ पैदा किया है, तूने मामू पैदा किया है."
10वीं की पढ़ाई के बाद चाचा ने मुझे अपने साथ दिल्ली ले जाने की पेशकश की. तर्क ये दिया गया कि वहाँ जाकर कुछ सुधार जाएगा और कुछ इलाज भी करवाने की कोशिश की जाएगी, लेकिन चाचा ने मेरा यौन शोषण करना शुरू कर दिया. किसी तरह 12वीं की पढ़ाई पूरी हुई.
घर लौटी तो घर वालों को चाचा की करतूत बताई, लेकिन घर में कोई भी यह मानने के लिए तैयार नहीं था. दूसरे चाचाओं और पापा ने साफ़ कह दिया कि तुम हमारे लिए मर चुके हो. माँ के हिस्से भी अपनी मजबूरियां थीं. मैं उसी दिन घर से निकल गई.
ज़िंदगी वाया पुणे
मेरी आंखों के सामने वो पूरा दृश्य है, जब मैं सोलापुर से पुणे रेलवे स्टेशन में अपना बैग लेकर उतरी. मेरे सामने सबसे बड़ा सवाल था कि मैं कहां जाऊं, क्या करूं. पीछे सब कुछ छोड़ आई थी और आगे सब कुछ अंधेरी कोठरी जैसा था.
रुआंसी हो कर मैंने किन्नरों को तलाशना शुरू किया. लगा कि वही मुझे अपना लें तो कम से कम ज़िंदा रहने की कोई वजह तो रहेगी.

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पुणे में ही मेरी मुलाक़ात कुछ समलैंगिक लोगों से हुई. कशिश भालके जैसे लोग मिले जो आज ट्रांसजेंडर लोगों के लिए काम कर रहे हैं. मैं उनके ही साथ रहने लगी. औरतों वाले कपड़े पहनने लगी, मेकअप करने लगी.
घर वालों से कोई संपर्क नहीं बचा था, लेकिन माँ की एक दोस्त से संपर्क बना रहा.
कोई छह महीने गुज़रे होंगे. एक दिन उसी दोस्त का फ़ोन आया, "तू माँ को फ़ोन कर ले. वो बहुत तनाव में हैं."
माँ को फ़ोन लगाया तो वो रोने लगी, "तू कहां है? जैसे भी है, जिस हालत में भी है, घर आ जा." माँ की आवाज़ का दर्द मुझे याद है. मैंने बहुत दुख के साथ माँ को मना कर दिया, लेकिन जब माँ ने ज़ोर दिया तो एक दिन मैं घर पहुंची.
कॉलेज

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माँ हतप्रभ थी, "यह क्या बन गया है तू?"
मैंने माँ को समझाया कि अब मैं ऐसे ही रहूंगी. माँ ने कहा कि तेरी बहनों की शादी होनी है, तू इस तरह रहेगा तो यह सब मुश्किल हो जाएगा. तूझे जैसे रहना है रह, हमेशा ख़ुश रहना. कोशिश करना कि पढ़ाई पूरी हो जाए.
माँ से विदा लेकर मैं पुणे लौटी और सेक्स वर्कर के तौर पर काम करने लगी. ज़िंदगी ऐसी ही चल रही थी, लेकिन माँ की सीख याद थी.
एक दिन अपनी किन्नर गुरु को कहा कि मैं पढ़ना चाहती हूं तो वो हंसने लगी और बोली, "कोई हिजड़ा पढ़ कर करेगा क्या? क्या पढ़ने से यह समाज हमें स्वीकार कर लेगा?"
मैंने उनकी नहीं सुनी और ग्रेजुएशन के लिए एडमिशन टेस्ट दिया. चयन हुआ जामिया मिलिया इस्लामिया में. पहले दिन मैं साड़ी पहन कर कॉलेज गई तो अजीब लगा. अगले दिन से मैंने लड़कों वाले ड्रेस पहन कर जाना शुरू किया.
कॉल सेंटर और कॉलेज के दिन

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पढ़ाई के लिये पैसे की ज़रूरत थी और उस समय कॉल सेंटर का क्रेज़ था. मैं थी तो बारहवीं पास, लेकिन कान्वेंट की पढ़ाई के कारण अंग्रेज़ी अच्छी थी.
तुग़लक़ाबाद रोड में पीसीएल नामक एक कॉल सेंटर में किसी तरह काम मिला. मैंने अमरीकन अंदाज़ में अंग्रेज़ी बोलना सीखा.
ग्रेजुएशन की पढ़ाई चलती रही और कॉल सेंटर का काम. दिन में कॉलेज जाती और रात को कॉल सेंटर.
ट्रेनी एक्ज़क्यूटीव की नौकरी पाई थी और जब पढ़ाई ख़त्म करके महाराष्ट्र लौट रही थी, तो एक्सेंट ट्रेनर सर्टिफ़ाई हो चुकी थी.
लौट कर मुंबई में एक कॉल सेंटर में काम मिला, लेकिन यौन शोषण के कारण काम छोड़ना पड़ा. फिर मैंने कई जगह काम तलाशने की कोशिश की, लेकिन हर जगह मुझे यही कहा गया, "यहां हिजड़ों के लिए कोई काम नहीं है."
पुरानी दलदल की यादें मेरे सामने आ गईं.
मैंने ट्रेनों में भीख माँगना शुरू कर दिया, लेकिन यह काम भी नहीं चल पाया और एक दिन पुलिस ने पकड़ कर मरते दम तक पीटा.
मैं सोचती रही कि ये मैं क्या कर रही हूँ.
पढ़ाई

माँ को फ़ोन लगाया, "तू कहती थी न कि पढ़ाई कर, इज़्ज़त की रोटी कमा. क्या करूं?" माँ ने फिर नसीहत दी कि आगे पढ़ो, सब अच्छा होगा.
इस बीच अल्पेश नामक एक युवक से शादी हुई, लेकिन शादी चली नहीं और उसने मुझे छोड़ दिया.
मैंने फिर से कमर कसी. मॉडलिंग शुरू की, दूसरे काम भी देखे.
इस बीच परीक्षा दी और पुणे के सिंबॉयसिस में एडमिशन मिल गया, लेकिन साल के चार लाख रुपये की फ़ीस सुन के सन्न रह गई. लगा कि यह नहीं हो सकेगा.
एक ट्रांसजेंडर ने ही सुझाया, "तू डांस बार में काम करना शुरू कर दे."
ज़िंदगी के लिए इस वसीले से एक इम्तहान और सही. बार गर्ल के तौर पर काम करना शुरू किया और सेक्स वर्कर के तौर पर भी. पैसे मिलते रहे, पढ़ाई चलती रही. एक दिन विपणन और मानव संसाधन में मेरी एमबीए की पढ़ाई भी पूरी हो गई.
एचआईवी

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नौकरी का सवाल फिर सामने था, लेकिन इस बीच एक दिन जब बीमार पड़ी और चेकअप करवाया तो पता चला कि मैं एचआईवी से संक्रमित हो चुकी हूं. मेरी दुनिया बदल गई थी.
हताश और निराश हो कर मैं अपने किन्नर गुरु के पास गई. एक और ट्रांसजेंडर दोस्त महेश कुंदनकर से मिली. 2009 में मैत्री फ़ाउंडेशन की मीरा शान से मिली और अंततः मैंने फ़ाउंडेशन में ट्रांसजेंडर लोगों के लिए काम करना शुरू कर दिया. फिर मैं अभिनव अय्यर के संपर्क में आई.
फिर एक दूसरी संस्था में स्टेट कम्युनिटी एडवाइज़र के तौर पर मैंने ट्रांसजेंडर मैपिंग का काम शुरू किया. महिला सेक्स वर्कर, एचआईवी से पीड़ित बच्चे और ट्रांसजेंडर लोगों के बीच काम का सिलसिला जारी रहा.
स्वास्थ्य अधिकारी

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इस दौरान मेरी अपनी एक नई दुनिया बनी. कई लोग जीवन में मिले, जो रिश्तेदारों से कहीं बढ़ कर थे.
एक दूसरी संस्था ने छत्तीसगढ़ में बतौर स्टेट एडवोकेसी अफ़सर बनाकर मुझे भेजा, जहां मुझे छत्तीसगढ़ सरकार और हिंदूस्तान फैमली प्लानिंग प्रमोशन ट्रस्ट के साथ मिल कर पूरे राज्य में काम करने का अवसर मिला और अब मुझे यह नई ज़िम्मेदारी मिली है, जहां मैं समाज के सभी लोगों के स्वास्थ्य के अधिकार के लिए काम कर रही हूं.
छत्तीसगढ़ में अधिकांश जगहों पर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के बाद थर्ड जेंडर के लोग ही हैं, जो एचआईवी संक्रमित लोगों के लिए सीधे तौर पर काम कर रहे हैं.
हमें थर्ड जेंडर का दर्जा ज़रुर मिला है और समाज में हमारे प्रति बदलाव भी आया है, लेकिन यह बदलाव उतना नहीं है. आज भी अगर ऑटो, बस या ट्रेन में कहीं बैठ जाऊं तो पास में कोई नहीं बैठता.
हमारी दुनिया बदल रही है, इस दुनिया को भी हमारे लिए बदलने की ज़रूरत है.
(आलोक पुतुल से बातचीत के आधार पर)
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